Tattvaviveka: Difference between revisions
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितः तत्त्वविवेकः ॥ | |||
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Latest revision as of 13:32, 13 April 2026
तत्त्वविवेकः
- तत्वविवेकविवरणम् — श्रीजयतीर्थः
स्वतन्त्रं परतन्त्रं च प्रमेयं द्विविधं मतम् ।स्वतन्त्रो भगवान् विष्णुः निर्दोषाखलिसद्गुणः ॥1॥
द्विविधं परतन्त्रं च भावोऽभाव इतीरितः ।पूर्वापरसदात्वेन त्रिविधोऽभाव इष्यते ॥2॥
भावाभावस्वरूपत्वान्नान्योन्याभावता पृथक् ।चेतनाचेतनश्चेति भावश्च द्विविधः स्मृतः ॥3॥
नित्यमुक्तश्च सृतियुक् परतन्त्रोऽपि चेतनः ।द्विधैव श्रीर्नित्यमुक्ता सृतियुक्च द्विधा मतः ॥4॥
मुक्तोऽमुक्त इति ह्यत्र ब्रह्मान्ता उत्तरोत्तरम् ।मुक्ताः शतगुणाः प्रोक्ताः रमा तेभ्योऽखिलैर्गुणैः ॥5॥
नित्यं बहुगुणोद्रिक्ता ततोऽनन्तगुणो हरिः ।अमुक्तास्त्रिविधास्तत्र नीचमध्योच्चभेदतः ॥6॥
मुक्तियोग्यास्तत्र चोच्चा नित्यावर्तास्तु मध्यमाः ।नीचा नित्यतमोयोग्या द्विधैवाचेतनं मतम् ॥7॥
नित्यानित्यत्वभेदेन देशः कालः श्रुतिस्तथा ।भूतेन्द्रियप्राणगुणसूक्ष्मरूपं च नित्यकम् ॥8॥
एषां विकारोऽनित्यः स्यान्नित्या एव हि चेतनाः ।गुणक्रियाजातिपूर्वा धर्मा सर्वेऽपि वस्तुनः ॥9॥
रूपमेव द्विधं तच्च यावद्वस्तु च खण्डितम् ।खण्डिते भेद ऐक्यं च यावद्वस्तु न भेदवत् ॥10॥
खण्डितं रूपमेवात्र विकारोऽपि विकारिणः ।कार्यकारणयोश्चैव तथैव गुणतद्वतोः ॥11॥
क्रियाक्रियावतोस्तद्वत् तथा जातिविशेषयोः ।विशिष्टशुद्धयोश्चैव तथैवांशांशिनोरपि ॥12॥
य एतत्परतन्त्रं तु सर्वमेव हरेः सदा ।वशमित्येव जानाति संसारात् मुच्यते हि सः ॥13॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितः तत्त्वविवेकः ॥