Jayantinirnaya: Difference between revisions
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितो जयन्तीनिर्णयः समाप्तः॥ | |||
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Latest revision as of 13:31, 13 April 2026
जयन्तीनिर्णयः
रोहिण्यामर्धरात्रे तु यदा कालाष्टमी भवेत् ।जयन्ती नाम सा प्रोक्ता सर्वपापप्रणाशिनी॥ १॥
यस्यां जातो हरिः साक्षान्निशीथे भगवानजः ।तस्मात्तद्दिनमत्यन्तं पुण्यं पापहरं परम्॥ २॥
तस्मात् सर्वैरुपोष्या सा जयन्ती नाम वै सदा ।द्विजातिभिर्विशेषेण तद्भक्तैश्च विशेषतः॥ ३॥
यो भुङ्क्ते तद्दिने मोहात्पूयशोणितमत्ति सः ।तस्मादुपवसेत् पुण्यं तद्दिनं श्रद्धयान्वितः॥ ४॥
कृत्वा शौचं यथान्यायं स्नानं कुर्यादतन्द्रितः ।प्रभातकाले मेधावी योगायेति यथाविधि॥ ५॥
नित्याह्निकं प्रकुर्वीत भगवन्तमनुस्मरन् ।योगाय योगपतये योगेश्वराय योगसम्भवाय श्रीगोविन्दाय नमो नमः॥ ६॥
मध्याह्नकाले च पुमान् सायङ्काले त्वतन्द्रितः ।स्नायीत पूर्वमन्त्रेण वासुदेवमनुस्मरन्॥ ७॥
ततः पूजां प्रकुर्वीत विधिवत्सुसमाहितः ।यज्ञायेति च मन्त्रेण श्रद्धाभक्तियुतः पुमान्॥ ८॥
कृष्णं च बलभद्रं च वसुदेवं च देवकीम् ।नन्दगोपं यशोदां च सुभद्रां तत्र पूजयेत् ।
जातः कंसवधार्थाय भूभारोत्तारणाय च ।कौरवाणां विनाशाय दैत्यानां निधनाय च॥ १०॥
पाण्डवानां हितार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ।गृहणार्घ्यं मया दत्तं देवक्या सहितो हरे॥ ११॥
क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिनेत्रसमुद्भव ।गृहाणार्घ्यं मया दत्तं रोहिण्या सहितः शशिन्॥ १२॥
दत्वार्घ्यं मनुनानेन ह्युपस्थाय विधुं बुधः ।शशिने चन्द्रदेवाय सोमदेवाय चेन्दवे॥ १३॥
मृगिणे सितबिम्बाय लोकदीपाय दीपिने ।शीतदीधितिबिम्बाय तारकापतये नमः॥ १४॥
उपसंहृत्य तत्सर्वं ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।विश्वायेति च मन्त्रेण ततः स्वापं समाचरेत्॥ १५॥
ततो नित्याह्निकं कृत्वा शक्तितो दीयतां धनम् ।सर्वायेति च मन्त्रेण ततः पारणमाचरेत् ।
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितो जयन्तीनिर्णयः समाप्तः॥