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| == सप्तमोऽध्यायः ==
| | #REDIRECT [[Bhagavadgitatatparya#BGT_C07]] |
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| | chapter_num = 7
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| | title = सप्तमोऽध्यायः
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| साधनं प्राधान्येनोक्तमतीतैरध्यायैः । उत्तरैस्तु षड्भिर्भगवन्माहात्म्यं प्राधान्येनाह-
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| भगवन्महिमा विशेषत उच्यते ।
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| | verse_line1 = मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
| |
| | verse_line2 = असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥१ ॥
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| | verse_line1 = ज्ञानं तेहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
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| | verse_line2 = यज्ज्ञात्वा नेह भूयोन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥२ ॥
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| }}
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| | verse_line1 = मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
| |
| | verse_line2 = यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥३ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitatatparya
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| }}
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| | text =
| |
| 'अनन्तानां तु जीवानां यतन्ते केचिदेव तु ।मुक्त्यै तेषु च मुच्यन्ते केचिन्मुक्तेषु च स्फुटम् ।केचनैव हरिं सम्यग् ब्रह्मरुद्रादयो विदुः ।अन्येषां यावता मुक्तिस्तावत् ज्ञानं हरौ परम्'' ॥ इति पाद्मे ।
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| 'मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः ।सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामते'' ॥ इति भागवते ।
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| 'सर्वे मुक्ता हरौ भक्तास्तेषु ब्रह्मैव मुख्यतः ।विष्णोः परमभक्तस्तु तस्मात् जीवघनो मतः'' ॥ इति सत्तत्त्वे ॥३ ॥
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| | verse_line1 = भूमिरापोनलो वायुः खं मनो बुदि्धरेव च ।
| |
| | verse_line2 = अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥४ ॥
| |
| }}
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| | verse_line1 = अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विदि्ध मे पराम् ।
| |
| | verse_line2 = जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥५ ॥
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| }}
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| | verse_line1 = एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
| |
| | verse_line2 = अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥६ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitatatparya
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| }}
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| | text =
| |
| 'अचेतना चेतनेति द्विविधा प्रकृतिर्मता ।
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| त्रिगुणाचेतना तत्र चेतना श्रीर्हरिप्रिया ।
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| ते उभे विष्णुवशगे जगतः कारणे मते ।
| |
| पिता विष्णुः स जगतो माता श्रीर्या त्वचेतना ।
| |
| उपादानं तु जगतः सैव विष्णुबलेरिता'' ॥ इति ॥ ४-६ ॥
| |
| }}
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| | verse_line1 = मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
| |
| | verse_line2 = मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥७ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitatatparya
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| }}
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| | text =
| |
| मत्तोन्यत् परतरं नास्ति । परतरस्त्वहमेवेत्यर्थः । अन्यथान्यदिति व्यर्थम् ।
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| 'अवरा दुःखसम्बन्धाज्जीवा एव प्रकीर्तिताः ।
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| नित्यनिर्दुःखरूपत्वात् परा श्रीरेकलैव तु ।
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| दुःखासम्पीडितत्वात्तु मध्यमो वायुरुच्यते ।
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| अनन्याधीनरूपत्वादसमाधिकसौख्यतः ।
| |
| तत्तन्त्रत्वाच्च सर्वस्य स विष्णुः परतमो मतः ।
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| अभावादन्तरान्यस्य त्विहैकार्थौ तरप्तमौ ।
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| यस्याः सम्बन्धयोग्यत्वाज्जीवा अप्यवरा मताः ।
| |
| तस्या जडायाः प्रकृतेरवरत्वे क्व संशयः ।
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| अथावरतरा ये तु विमुखाश्चेतना हरेः ।
| |
| नित्यदुःखैकयोग्यत्वान्न ह्येतत् स्यादचेतने ।
| |
| अतः परत(रं)मं विष्णुं यो वेत्ति स विमुच्यते ।
| |
| मुक्तस्तु स्यात् पराभासः सुनित्यसुखभोजनात् ।
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| तत्रापि तारतम्यं स्यात् तेषु ब्रह्माधिको मतः ।
| |
| विष्णोराधिक्यसंवित्तिः सर्वस्माज्ज्ञानमुच्यते ।
| |
| एवं विविच्य तज्ज्ञानं विज्ञानमिति कीर्तितम् ।
| |
| एतच्च तारतम्येन वर्तते केशवादिषु ।
| |
| मुख्यविज्ञान्यतो विष्णुः किञ्चिद्विज्ञानिनोपरे ॥७ ॥
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| | verse_line1 = रसोहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
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| | verse_line2 = प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥८ ॥
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| | verse_line1 = पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
| |
| | verse_line2 = जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥९ ॥
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| | verse_line1 = बीजं मां सर्वभूतानां विदि्ध पार्थ सनातनम् ।
| |
| | verse_line2 = बुदि्धर्बुदि्धमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥१० ॥
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| | verse_line1 = बलं बलवतां (चाहं) अस्मि कामरागविवर्जितम् ।
| |
| | verse_line2 = धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोस्मि भरतर्षभ॥११ ॥
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| | text =
| |
| सोप्सु स्थित्वा रसयति रसनामा ततः स्मृऽतः ।
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| सूर्यचन्द्रादिषु स्थित्वा प्रभानामा प्रभासनात् ।
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| वेदस्थः प्रणवाख्योसावात्मानं यत् प्रणौत्यतः ।
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| खे स्थितः शब्दनामासौ यच्छब्दयति केशवः ॥८ ॥ पुण्यापुण्यं गन्धयति स्वयं पुण्यो धरास्थितः ।
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| तेजयत्यग्निसंस्थः (स) सन् भूतस्थो जीवनप्रदः ।
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| तपस्विसंस्थस्तपति ... ... ॥९ ॥ ... व्यञ्जनाद् बीजसञ्ज्ञितः ।
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| बोधनाद् बुदि्धनामासौ बुदि्धमत्सु व्यवस्थितः ॥१० ॥ नित्यपूर्णबलत्वात्तु बलकामविवर्जितः ।
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| अरा(जस)गजबलश्चैव स्थानेभ्योन्येष्वयोजनात् ।
| |
| एतादृशबलात्मासौ बलिनां बलदः स्वयम् ।
| |
| बेति पूर्णत्ववाची स्यात् तद्रतेर्बलमुच्यते ।
| |
| प्रायो हि कामिता अर्था धर्मं हन्युर्हरिः पुनः ।
| |
| न धर्महानिकृत् किन्तु कामितो धर्मवृदि्धकृत् ।
| |
| धर्माविरुद्धकामोतो विष्णुर्भूतेषु संस्थितः ।
| |
| एवं स सर्वतश्चान्यः स्वतन्त्रश्चैव सर्वगः ।
| |
| व्यवस्थयैव सर्वेषां सर्वदा सर्वदः प्रभुः ॥११ ॥
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| | verse_line1 = ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।
| |
| | verse_line2 = मत्त एवेति तान्विदि्ध न त्वहं तेषु ते मयि॥१२ ॥
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| |
| ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।
| |
| तत एव नचान्यस्मात् तदायत्तमिदं न सः ॥ अन्यायत्तः ... ॥ १२ ॥
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| | verse_line1 = त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
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| | verse_line2 = मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥१३ ॥
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| | verse_line1 = दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
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| | verse_line2 = मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥१४ ॥
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| | verse_line1 = न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
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| | verse_line2 = माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥१५ ॥
| |
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| | verse_line1 = चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोर्जुन ।
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| | verse_line2 = आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥१६ ॥
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| | verse_line1 = तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
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| | verse_line2 = प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥१७ ॥
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| | verse_line1 = उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
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| | verse_line2 = आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥१८ ॥
| |
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| | verse_line1 = बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानावान्मां प्रपद्यते ।
| |
| | verse_line2 = वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥१९ ॥
| |
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| | text =
| |
| ... अचेतनया तन्मेयत्वात्तु मायया ।
| |
| लक्ष्म्या वशगया लोको विष्णुनैव विमोहितः ।
| |
| ये तु विष्णुं प्रपद्यन्ते ते मायां (तु) तां तरन्ति हि ।
| |
| लक्ष्मीः सा जडमायाया देवता ते उभे अपि ।
| |
| विष्णोर्वशे ततोनन्यभक्त्या तं शरणं व्रजेत् ।
| |
| यादृशी तत्र भक्तिः स्यात् तादृश्यन्यत्र नैव चेत् ।
| |
| अनन्यभक्तिः सा ज्ञेया विष्णावेव तु सा भवेत् ।
| |
| अन्येषु वैष्णवत्वेन लक्ष्मीब्रह्महरादिषु ।
| |
| कुर्याद् भक्तिं नान्यथा तु तद्वशा एव ते यतः ।
| |
| एवं जानंस्तमाप्नोति नान्यथा तु कथञ्चन ।
| |
| पूर्णं वस्तु यतो ह्येको वासुदेवो नचापरः ।
| |
| एवंविद् दुर्लभो लोके यत् सर्वे मिश्रयाजिनः ॥ १३-१९ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेन्यदेवताः ।
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| | verse_line2 = तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥२० ॥
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| | verse_line1 = यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
| |
| | verse_line2 = तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥२१ ॥
| |
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| | verse_line1 = स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
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| | verse_line2 = लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥२२ ॥
| |
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| | verse_line1 = अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
| |
| | verse_line2 = देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥२३ ॥
| |
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| }}
| |
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| | text =
| |
| ... ... यत् सर्वे मिश्रयाजिनः ॥ 'विष्णुं तत् परमज्ञात्वा रमाब्रह्महरादिकान् ।
| |
| यजन्नपि तमो घोरं नित्युदुःखं प्रयाति हि ।
| |
| अज्ञानां तु कुले जातो यावद् विष्णोः समर्चनम् ।
| |
| विष्णुतत्त्वं च जानीयात् तावत् सेवा पृथक् कृता ।
| |
| विद्याद्यैहिकभोगाय यदि बुद्ध्वा पुनर्न तु ।
| |
| परिवारतामृते कुर्यादन्यदेवार्चनं क्वचित् ।
| |
| अजानता कृतं त्यक्तं न दोषाय भविष्यति ।
| |
| जन्मादिप्रदमेव स्यादत्यागे पुनरेव तु ।
| |
| क्षिप्रं च ज्ञापयत्येव भगवान् स्वयमेव तु ।
| |
| यदि जन्मान्तरे स्वीयो निमित्तीकृत्य कञ्चन'' ॥ इत्यादि च ।
| |
| 'मत्त एवेति तान् विदि्ध'' इत्युपसंहाराच्च तत्तत्कारणत्वात् तत्तन्नामेत्यवसीयते । ''मयि सर्वमिदं प्रोतम्" इति भेदेनैवोपक्रमाच्च । आप्नोति विष्णुमित्येवात्मशब्दो ज्ञानिनि । 'यच्चाप्नोति यदादत्ते'' इत्यादेः । 'आस्थितः स हि'' 'मां प्रपद्यते'' इत्यादिवाक्यशेषाच्च । बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् भवति । ततो मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति पूर्णमिति जानन् । 'प्रपद्यन्तेन्यदेवताः'' इत्यादिवाक्यशेषे भेददर्शनाच्च । 'देवान् देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि'' इति च ॥ २०-२२ ॥ 'ज्ञात्वा परत्वं विष्णोस्तु पृथग् देवान् यजन्नरः ।
| |
| याति देवांस्तदज्ञात्वा तम एव प्रपद्यते ।
| |
| तथापि यावदन्यैस्तु साम्यं हीनत्वमेकताम् ।
| |
| न निश्चिन्वन्ति जायन्ते संसारे ते पुनः पुनः'' ॥ इति च ॥२३ ॥
| |
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| |
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| | verse_line1 = अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
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| | verse_line2 = परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥२४ ॥
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| 'अव्यक्तः परमात्मासौ व्यक्तो जीव उदाहृतः ।
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| मन्यते यस्तयोरैक्यं स तु यात्यधरं तमः'' ॥ इति च ॥२४ ॥
| |
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| | verse_line1 = वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
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| |
| 'यथात्मानं हरिर्वेत्ति तथान्ये नैव तं विदुः ।
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| जानन्ति किञ्चित् क्रमशो रमाद्यास्तत्प्रसादतः'' ॥ इति च ॥२६ ॥
| |
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| द्वन्द्वमोहो मिथ्याज्ञानम् ।'तमस्तु शार्वरं विद्यान्मोहश्चैव विपर्ययः'' । इति भारते ।जीवेश्वरादिकं द्वन्द्वम् । तद्विषयो मोहो द्वन्द्वमोहः । सम्मोहः तदाग्रहः'तदाग्रहो महामोहस्तामिस्रः क्रोध उच्यते'' । इत्युक्तत्वात् ।सर्गे सर्गकाल एव ।'जीवधर्मानीश्वरे तु यो जीवेष्वैश्वरानपि ।विद्याज्जीवेश्वरैक्यं वा द्वन्द्वमोही स उच्यते'' ॥ इत्याग्नेये ॥२७ ॥
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| | verse_line1 = येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
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| | verse_line1 = जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
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| | verse_line2 = ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥२९ ॥
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| | verse_line1 = साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
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| | verse_line2 = प्रयाणकालेपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥३० ॥
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| ॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोध्यायः ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये सप्तमोध्यायः ॥
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| 'तद् ब्रह्म'' इत्युक्तेन्यत्वाशङ्कां निवारयति साधिभूताधिदैवं मामिति ।
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| ॥३० ॥
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