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| | #REDIRECT [[Bhagavadgitatatparya#BGT_C04]] |
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| | title = चतुर्थोऽध्यायः
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| बुद्धेः परस्य माहात्म्यं कर्मभेदो ज्ञानमाहात्म्यं चोच्यतेस्मिन्नध्याये ।
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| | verse_line1 = इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
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| | verse_line2 = विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेब्रवीत्॥१ ॥
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| श्रीभगवानुवाच
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| | verse_line1 = एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
| |
| | verse_line2 = स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥२ ॥
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| | verse_line1 = स एवायं मया तेद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
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| | verse_line2 = भक्तोसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥३ ॥
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| उक्तयोर्ज्ञानकर्मणोरुभयोर्विशेषविस्तरात्मकोयमध्यायः ।'ब्रह्मरुद्रेन्द्रसूर्याणां यद्दत्तं विष्णुना पुरा ।पञ्चरात्रात्मकं ज्ञानं व्यासोदात्पाण्डवेषु तत् ।तेषामेवावतारेषु सेनामध्येर्जुनाय च ।प्रादाद्गीतेति निर्दिष्टं सङ्क्षेपेणायुयुत्सवे ।यथा कुर्वन्ति कर्माणि यथा जानन्ति देवताः ।सर्वे कार्तयुगाश्चैव नृपाश्च मनुपूर्वकाः ।ज्ञातव्यं चैव कर्तव्यं यथा सर्वैर्मुमुक्षुभिः ।त्रैतादित्रिषु जातैश्च गीतायां तदुदाहृतम् ।पाण्डवाद्याः क्षेमकान्ताः करिष्यन्ति च जानते ।तथैव तेन गीताया नास्ति शास्त्रं समं क्वचित् ।वेदार्थपूर्वकं ज्ञेयं पञ्चरात्रं यतोखिलम् ।तत्सङ्क्षेपश्च गीतेयं तस्मान्नास्याः समं क्वचित्'' ॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ १-३ ॥
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| | verse_line1 = अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
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| | verse_line2 = कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥४ ॥
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| अर्जुन उवाच
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| | verse_line1 = बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
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| | verse_line2 = तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥५ ॥
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| | commentary1 = bhagavadgitatatparya
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| }}
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| श्रीभगवानुवाच
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| | text =
| |
| 'जानन्तोपि विशेषार्थज्ञानाय स्थापनाय वा ।
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| पृच्छन्ति साधवो यस्मात्तेन पृच्छसि पार्थिव ॥'' इत्याग्नेयवचनान्नार्जुनो भगवन्तं न जानाति ॥ ४-५ ॥
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| | verse_line1 = अजोपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन् ।
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| | verse_line2 = प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥६ ॥
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| | verse_line1 = यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
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| | verse_line2 = अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥७ ॥
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| | text =
| |
| आत्ममायया आत्मेच्छया । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय स्वभावम् । 'देवस्यैष स्वभावोयम्'' इत्यादिश्रुतेश्च । अत एव स्वशब्देन विशेषणं 'प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य'' इत्यादिषु । 'मयाध्यक्षेण प्रकृतिः'' इत्यादिषु तु न स्वशब्दः । 'प्रकृतिं विदि्ध मे पराम्'' इत्यादिषु सम्बन्धित्वेन प्रतीतेरन्या । अत्र तु स्वशब्दः स्वरूपवाची । स्वभाव इत्यत्रापि स्वाख्यो भावः स्वभावः । भावशब्दस्तु सम्बन्ध्याशङ्कानिवृत्तये । स्वस्वभाव इति तु स्वस्वरूपमितिवदुपचारत्वाशङ्कां निवर्तयति ।'स्रष्टृत्वादिस्वभावत्वात्स्वेच्छया विष्णुरव्ययः ।सृष्ट्यादिकं करोत्यद्धा स्वयं च बहुधा भवेत्'' ॥> इति नारायणश्रुतिः॥ ६,७ ॥
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| | verse_line1 = परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
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| | verse_line2 = धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥८ ॥
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| | verse_line1 = जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
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| | verse_line2 = त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोर्जुन॥९ ॥
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| | text =
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| 'येषां गुणानां ज्ञानेन मुक्तिरुक्ता पृथक्पृथक् ।
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| वेदेषु चेतिहासेषु सा तु तेषां समुच्चयात् ।
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| एवमेव शमादीनां नान्यथा तु कथञ्चन'' ॥ इति ब्रह्मवैवर्तवचनाज्जन्म कर्म चेत्यादिषु न तावन्मात्रेण मोक्षः ॥९ ॥
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| | verse_line1 = वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
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| | verse_line2 = बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥१० ॥
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| | text =
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| 'मयं प्रधानमुद्दिष्टं प्राधान्यं यैर्हरेर्मतम् ।
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| भगवन्मयास्ते विज्ञेयास्ते मुच्यन्ते न चापरे'' ॥ इति च ।
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| मयि भावो मद्भावः ॥१० ॥
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| | verse_line1 = ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
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| | verse_line2 = मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥११ ॥
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| | verse_line1 = काङ्क्षन्तः कर्मणां सिदि्धं यजन्त इह देवताः ।
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| | verse_line2 = क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिदि्धर्भवति कर्मजा॥१२ ॥
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| | text =
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| तथैव भजामि । तदनुसारिफलदानरूपेण । अन्यदेवतायाजिनामपि मत्समर्पणेन वैष्णवमार्गानुवर्तनेनैव सम्यक् फलं भवति ॥
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| अन्यदैवतपूजापि यस्मिन्नन्ते समर्पिता स्वर्गादिफलहेतुः स्यात् नान्यथा तं भजेद्धरिम् ॥ इत्याग्नेये ॥ ११-१२ ॥
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| | verse_line1 = चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
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| | verse_line2 = तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥१३ ॥
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| 'सत्वसत्वाधिकरजोरजोभिस्तमसा तथा ।वर्णा विभक्ताश्चत्वारः सात्विका एव वैष्णवा'' इति च ।कर्मविभागं शमो दम इत्यादिना वक्ष्यति ।'वैष्णवाः सात्विका एव तामसा एव चापरे ।दौर्लभ्यसुलभत्वेन तेषां वर्णादिभिन्नता'' ॥ इति च ।'स्वाभाविको ब्राह्मणादिः शमाद्यैरेव भिद्यते ।योनिभेदकृतो भेदो ज्ञेय औपाधिकस्त्वयम् ।विष्णुभक्तिश्चानुगता सर्ववर्णेषु विश्पतिम् ।आरभ्य हीयतेथापि भेदः स्वाभाविकस्ततः'' ॥ इति नारदीये ।'कर्तापि भगवान्विष्णुरकर्तेति च कथ्यते ।तस्य कर्ता यतो नान्यः स्वतन्त्रत्वात्परात्मनः'' ॥ इति च ।अपिशब्दो गुणसमुच्चयार्थः । कर्ता मे नास्तीत्यपि विद्धीति ॥१३ ॥
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| | verse_line1 = न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
| |
| | verse_line2 = इति मां योभिजानाति कर्मभिर्न स बद्ध्यते॥१४ ॥
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| जीवाभेदनिवृत्त्यर्थं मामिति विशेषणम् ॥ १४ ॥
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| | verse_line1 = एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
| |
| | verse_line2 = कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥१५ ॥
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| | verse_line1 = किं कर्म किमकर्मेति कवयोप्यत्र मोहिताः ।
| |
| | verse_line2 = तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेशुभात्॥१६ ॥
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| | verse_line1 = कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
| |
| | verse_line2 = अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥१७ ॥
| |
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| कर्मापि नो मत्त इति बोद्धव्यमित्यादि ॥ १७ ॥
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| | verse_line1 = कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
| |
| | verse_line2 = स बुदि्धमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥१८ ॥
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| }}
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| |
| कर्मणि जीवे अस्वातन्त्र्यादकर्म कर्मविधिफलयोरभावात् । अकर्मणि विष्णौ । स्वातन्त्र्यात्सर्वकर्तृत्वम् ।करोस्मिन् मीयत इति कर्म जीव उदाहृतः ।विधिशब्देनामितत्वात् अकर्म भगवान् हरिः ॥ इति नारदीये ।कर इति सकारान्तः अदृष्टवाची । क्रियावाची वा । तदधीनत्वात् । प्रसिद्धश्च जीवे कर्मशब्दः पञ्चरात्रे । कृत्स्नफलवत्वात् कृत्स्नकर्मकृत् ।॥१८ ॥
| |
| }}
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| | verse_line1 = यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।
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| | verse_line2 = ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः॥१९ ॥
| |
| }}
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| | verse_line1 = त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तोनिराश्रयः ।
| |
| | verse_line2 = कर्मण्यभिप्रवृत्तोपि नैव किञ्चित्करोति सः॥२० ॥
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| }}
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| अनिराश्रयो भगवदाश्रयत्वात् । मुक्तस्य स्वातन्त्र्याभिमानात् ॥२०॥
| |
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| | verse_line1 = निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
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| | verse_line2 = शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥२१ ॥
| |
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| |
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| | verse_line1 = यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
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| | verse_line2 = समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबद्ध्यते॥२२ ॥
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| |
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| | verse_line1 = गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
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| | verse_line2 = यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥२३ ॥
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| | verse_line1 = ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
| |
| | verse_line2 = ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥२४ ॥
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| }}
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| | text =
| |
| कथमभिमानत्यागः ? ब्रह्मार्पणमित्यादि । ब्रह्मण्यर्पणं ब्रह्मार्पणम् । ब्रह्मणो हविः । ब्रह्मणोग्नौ । ब्रह्मणः कर्मसमाधिना सह । समाधिरपि तदधीना इत्यर्थः ।'एकः स्वतन्त्रो भगवान् तदीयं त्वन्यदुच्यते'' । इति भारते ॥२४ ॥
| |
| }}
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| | verse_line1 = दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
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| | verse_line2 = ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥२५ ॥
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| | verse_line1 = श्रोत्रादीनींद्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
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| | verse_line2 = शब्दादीन्विषयानन्य इंद्रियाग्निषु जुह्वति॥२६ ॥
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| }}
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| | text =
| |
| दैवं विष्णुमेव यज्ञ इत्युपासते । स्वभोग्यत्वात्स्वयमेव यज्ञः । ब्रह्मा-ख्याग्नौ क्रियायज्ञं तेनैव यज्ञाख्येन विष्णुना समर्पयन्ति । तत्पूजात्वेन श्रोत्रादिसंयमं कुर्वन्ति । तत्पूजात्वेन विषयान् भुञ्जते ॥ २५, २६ ॥
| |
| }}
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| | verse_line1 = सर्वाणींद्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
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| | verse_line2 = आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥२७ ॥
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| }}
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| | text =
| |
| तत्पूजात्वेनेंद्रियादिसंयमं कुर्वन्ति । यज्ञेनैवेति सर्वत्राप्यन्वीयते ।'तेनैव तं पूजयेद्वा विहितैर्वान्यसाधनैः ।स एव विष्णोर्यज्ञः स्यान्मानसो वा स बाह्यकः'' ॥ इति ब्रह्मवैवर्ते॥ २७ ॥
| |
| }}
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| | verse_line1 = द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
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| | verse_line1 = अपाने जुह्वनि प्राणं प्राणेपानं तथापरे ।
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| | verse_line1 = अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति ।
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| | verse_line1 = यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
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| | verse_line1 = एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
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| श्रोत्रादीनित्यादिष्विज्यानुक्तेरिज्योन्य इति शङ्कां निवारयति । वितता ब्रह्मणो मुख इति । 'सर्वयज्ञैः परं ब्रह्म याज्यं विष्ण्वाख्यमव्ययम्'' । इति च ॥ ३२ ॥
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| | verse_line1 = श्रेयान् द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
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| सर्वं कर्माखिलम् आसमन्तादल्पं ज्ञाने परिसमाप्यते । ज्ञाने जाते पूर्यते ।
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| 'समाप्तविद्यान् धनुषि श्रेष्ठान् यान् सप्त मन्यसे ।'' इतिवत्समाप्तिशब्दोत्र पूर्तिवाची । ज्ञानासिनात्मनः ।
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| 'छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ'' इत्यादि पुनर्योगकथनात् ॥३३ ॥
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| | verse_line1 = तद्विदि्ध प्रणिपातेन परिप्रश्रेन सेवया ।
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| | verse_line1 = यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
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| 'ज्ञानं तेहं सविज्ञानम्'' इति वक्ष्यमाणत्वात्स्वयमेवोपदेक्ष्यति ॥ ३४ ॥
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| आत्मनि व्याप्ते मयि । अथो तस्माद्य्वाप्तत्वादेव ॥ ३५ ॥
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| करणभूतज्ञानं स्तौति पुनः श्लोकत्रयेण-
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| | verse_line1 = अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
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| | verse_line1 = न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
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| | verse_line1 = अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
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| ॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानयोगो नाम चतुर्थोध्यायः ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये चतुर्थोध्यायः ॥
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| आत्मवन्तं परमात्मभक्तम् ॥ ४१ ॥
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| [[Category:Bhagavadgitatatparya]]
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