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| | #REDIRECT [[Nyayavivaranam#BSNV_C03_S03]] |
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| | title = तृतीयः पादः
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| | text =
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| न च प्रतिशाखमुच्यमानानामर्थानां पृथकत्वात् तत्तच्छाखिभिरेव तत्र तत्रोक्तं ज्ञेयमिति नियमः । ‘नानावेदैरितिहासैः पुराणैः सुज्ञेय एको भगवान् युक्तिभिश्च’() इति श्रुतेः सुष्टु ज्ञेयत्वात् विष्णोः ॥1॥
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| === उपसंहाराधिकरणम् ===
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| |
| न चाशक्यतया कस्यापि सर्वगुणोपसंहारो(गुणोपसंहारो) नास्ति । ‘सर्वे गुणाः सर्वदैव ह्युपास्यास्तेनैव(तेन) विद्वान् विधिकृन्नान्यथा स्यात्’() इति श्रुतेर्विहितक्रियालोपप्रसङ्गात् ॥2॥
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| === प्राप्त्यधिकरणम् ===
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| |
| केषाञ्चित् सर्वगुणोपसंहारस्य कर्तव्यत्वे सर्वेषामपि तथा स्यात् अनेन नोपसंहर्तव्या अनेनोपसंहर्तव्या इत्यनिर्णीतेरिति न मन्तव्यम् । ‘यस्य यावद्गुणाः स्पष्टं प्रतिभासन्त्युपासते । युगपत् स्वभुजौ यद्वद् ध्यायेत् तावत एव सः । युगपद्ब्रह्मणः सर्वे भासन्ते हि गुणा हरेः । तदन्येषां यथायोग्यं स्वमाहात्म्यानुसारतः ॥’ इति श्रुतेर्युगपद्गुणप्रतीत्यादिमाहात्म्यान्निर्णयोपपत्तेः ॥3॥
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| === सर्वाभेदाधिकरणम् ===
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| न च फलानिर्णीतिः । माहात्म्येनैवान्यत् फलं महतामिति निर्णयोपपत्तेः ॥4॥
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| === आनन्दाधिकरणम् ===
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| |
| आनन्दादीनां केषाञ्चित् समुच्चये प्राप्ते सर्वगुणसमुच्चयः(सर्वेषां सर्वगुणसमुच्चयः) सर्वेषां स्यादिति न मन्तव्यम् । अल्पशक्तित्वात् तेषां पुंसाम् ॥5॥
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| === प्रियशिरस्त्वाधिकरणम् ===
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| |
| प्रियशिरस्त्वादीनामानन्दादिविशेषत्वेनैव दर्शनात् तेषामपि सर्वोपसंहार्यत्वमिति न मन्तव्यम् ।यथायोग्यान्(यथायोगाद्) गुणपूगानुपास्य फलं भवेन्मुक्तिगं नान्यथा स्यात् । ‘नित्यैकाग्र्यव्यङ्ग्यताहेतुतश्च(नित्यैकाग्र्यताहेतुतश्च) साक्षाद्दृशिर्नो तद्विशेषैः(तत्तद्विशेषैः) स्मृतैश्च ॥’ इति श्रुतेः स्वयोग्यगुणैरेव फलभावात् ॥6॥
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| === इतराधिकरणम् ===
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| | text =
| |
| तर्हि ब्रह्मणोऽन्येषां देवादीनामपि बहुगुणोपासनया कार्यं नास्ति, मध्ये नियमासिद्धेरिति न मन्तव्यम् । तेषां भाव्युत्कर्षं ज्ञात्वा तदभिज्ञस्य ब्रह्मण एव गुणनियमोपदेशोपपत्तेः ।‘यो यो भावो देवतानां विमुक्तौ तत्तत् प्राप्तौ सुगुणानीशितुश्च । ब्रह्मा दिशत्यथ तांस्ते विचिन्त्य तत्तद्भावं प्राप्नुवन्त्यात्मशक्त्या ॥’ इति श्रुतेः ॥7॥
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| === आध्यानाधिकरणम् ===
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| |
| न च नानास्थानेषूक्तगुणानामनुपासनार्थता(अनुपासनार्थत्वम्) । विप्रकीर्णगुणान्(विप्रकीर्णान् गुणान्) पिण्डीकृत्योपासितुस्तत्सदृशफलप्राप्तेः(तादृशफलप्राप्तेः) तथा ध्यानार्थमेव गुणानामुक्तिरित्युपपत्तिः ॥8॥
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| === आत्मगृहीत्यधिकरणम् ===
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| |
| न चाश्वापरोक्ष्यायानन्दादीनामपि लोपेनात्मेत्येतावता पूर्यते । (आत्मशब्दविशेषार्थ)आत्मशब्दार्थविशेषत्वादानन्दादीनाम् ॥9॥
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| === अनव्याधिकरणम् ===
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| न चात्मशब्दो विभ्रमकरः । गुणाधिकानामधिकारिणां भगवद्गुणानधिकान् प्रकाशयतीत्यवधारणोपपत्तेः(अवधारणत्वोपपत्तेः) ॥10॥
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| === कार्याधिकरणम् ===
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| |
| अलौकिकगुणानामप्रतीतेर्लौकिकगुणाध्याने तदपाकृतिरेव भवतीति न मन्तव्यम् । लौकिकविलक्षणा अत्युत्तमा इति ध्यानस्यैव प्राधान्यात् ॥11॥
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| === समानाधिकरणम् ===
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| ब्रह्मणो ब्रह्माण्याश्च(ब्रह्मणश्च ब्रह्माण्या) स्थानैक्यं गुणतारतम्यं च यथागुणोपासनं मुक्तावाधिक्यं न भवतीत्यत्र लिङ्गम् । समविषमोपासनायुक्तेरिति न मन्तव्यम् ।‘यथाशक्ति स्मृतान् धात्रा गुणान् विष्णोः सरस्वती । स्मरेत् त्रैविक्रमाद्यांस्तु नित्यविक्रान्तिपूर्वकैः । कदाचिल्लोपेयेद्देवी स्थानैक्यं न गुणैस्ततः । साम्यं तयोर्यथाविष्णोर्गुणोपासा फलं भवेत् ॥’ इत्यध्यात्मवचनाद्यथाशक्ति क्रिया देव्याः ॥12॥
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| === नवाधिकरणम् ===
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| |
| न चात्मशब्देनास्य पुरुषस्यैतावन्तो गुणा उच्यन्त इति व्यवस्थित्यभावः(व्यवस्थाभावः) । यस्य यावन्तोऽर्था युगपद् ध्यातुं शक्यन्ते तस्य तावन्त इति सन्धेः ॥13॥
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| === सम्भृत्यधिकरणम् ===
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| न च मुमुक्षव इत्यविशेषाद् भरणस्य द्युतेश्च सर्वेषामपेक्षितत्वाच्च(अपेक्षितत्वात्) सम्भृतिद्युव्याप्ती(व्याप्तौ) अपि सामान्ये ।
| |
| ‘सत्यो ज्ञानं(ज्ञानः) परमानन्दरूप आत्मेत्येवं नित्यदोपासनं स्यात् । नान्यत् किञ्चित् समुपासीत धीरः सर्वैर्गुणैर्देवगणा उपासते ॥ गुण्याकारस्मृतेरेव द्युतिमात्रं प्रतीयते । न व्याप्तिर्जगदस्मृत्या नानाशक्तिर्यतो मता ॥ देवानां युगपदज्ज्ञानं मानुषाणां(मनुष्याणां) तथा न तु । पर्यायेणाऽपि(पर्यायेणैव) सत्याः स्युर्नैवान्येषां कथञ्चन ॥’ इत्यादिप्रमाणबलात् ॥14॥
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| === पुरुषाधिकरणम् ===
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| |
| क्वचिद् बहुगुणाः क्वचिदल्पगुणाः श्रुतिष्वेवोच्यन्ते इत्युपसंहारस्याप्रयोजनतेति न वाच्यम् । ‘गुणा सर्वे ब्रह्मणैव(सर्वे गुणा ब्रह्मणैव) ह्युपास्या नान्यैर्देवैः किमु सर्वैर्मनुष्यैः ।’() इति श्रुतेः(इत्यादि श्रुतेः) । (सर्वगुणोपासन्यापि)सर्वगुणोपासकस्याप्यधिकारिणो भावादेकत्रापृथक्सर्वगुणानुक्तेः(सर्वगुणानुक्तेश्च) बलादुपसंहारानतेः ॥15॥
| |
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| === वेधाधिकरणम् ===
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| |
| न च मुक्तावुपासनभावे(उपासनाभावे) फलादिकमपि स्यादित्यतिप्रसङ्गः । उपासनायाः संस्काराख्यकारणस्य सत्त्वात् । ‘न हीयते यत्र गत्वा यत्र गत्वा न वर्धते’() इत्यवृद्धिप्रमाणभावाच्च ॥16॥
| |
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| | |
| === हान्यधिकरणम् ===
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| |
| न च कर्मकरणशक्तेरप्यदूरत्वात् तत्संश्रयनियमः । उपासनाख्यकार्ये(उपासनाख्ये कार्ये) नित्यकृतिसंस्कारो न तथा कर्मणीति कार्यवैशेष्यात् ॥17॥
| |
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| |
| | |
| === छन्दाधिकरणम् ===
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| |
| (न च योग्यताख्य.....)न चायोग्यताख्यविशिष्टकारणाज्ज्ञानिष्वपि केषाञ्चिन्मोक्षो न भवतीति नियमः । ज्ञानिनां मोक्षं ददात्येवेश्वरः(ईश्वरस्वभावात्) स्वभावात् । अयोग्यानां ज्ञानस्यैवानुपपत्तेः(ज्ञानस्यैवोत्पत्त्यनुपपत्तेः/ज्ञानस्यैवानुत्पत्त्युपपत्तेः) ॥18॥
| |
| }}
| |
| | |
| === अनियमाधिकरणम् ===
| |
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| |
| न च प्रयत्नानुसारिणो मुक्तावाधिकारिका आनन्दादयः(मुक्तावाधिकारिकानन्दादयः) । अधिकारानुसारित्वात् प्रयत्नस्य । कथञ्चिदधिकयत्ने(अधिके यत्ने) तत्साधनादिवस्तूनां दूषणप्राप्तेः । ‘स्वाधिकाराधिको यत्नः प्रायशो नोपपद्यते । कथञ्चिदधिके यत्ने दोषः कश्चित् समापतेत् ॥’() इति वचनाच्च ॥19॥
| |
| }}
| |
| | |
| === यावदधिकरणम् ===
| |
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| |
| न चैकस्मादेको विशिष्टो दृष्ट एवेति प्राणाद् विशिष्टजीवाभावे दृष्टवैरूप्यमिति दोषः । ‘यः सर्वमवजानीयादृते देवं नारायणं देवीं च परमां श्रियम् । स प्राणानवरुद्ध्येमं मन्त्रमावर्तयीत । आत्मा देवानां भुवनस्य गर्भो यथावशं चरति देव एषः । घोषा इदस्य शृण्विरे न रूपं तस्मै वाताय हविषा विधेम ॥’() इति । ‘स ह्येषां भूतानां वरिष्ठो न ह्येतस्मात् कश्चनोपरि विना देवं नारायणं देवीं च परमां श्रियम्’ इति प्रतिक्रियाविधानादिविरोधात् ॥20॥
| |
| }}
| |
| | |
| === इयदामननाधिकरणम् ===
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| | text =
| |
| ‘अस्ति भगवः प्राणाद्भूय’() इति प्रश्नाद्यभावात् प्राणस्यैवोन्नतिप्रतीतेर्न विष्णोरपि ततः परत्वमिति न मन्तव्यम् । ‘एष तु वा अतिवदति’() इति विशेषणात् प्रश्नप्रतिवचनप्रतिसन्धानोपपत्तेः ॥21॥
| |
| }}
| |
| | |
| === व्यतिहाराधिकरणम् ===
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| |
| न च सत्यादीनामभेदानुक्तेरन्यत्वम् । ‘सत्यं पूर्णं विज्ञानं पूर्णं कृतिः पूर्णा निष्ठा पूर्णा श्रद्धा(मतिः पूर्णा श्रद्धा पूर्णा) पूर्णा मति पूर्णा सुखं पूर्णं भूमा पूर्णोऽहं पूर्ण आत्मा पूर्णो नात्र किञ्चिदूनं पूर्णमेवाधस्तात् पूर्णमुपरिष्ठात् पूर्णं मध्यतः पूर्णं सर्वतः । तदेष श्लोको भवति ।’()‘पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥’() इति श्रुतेः सर्वेषामनूनत्वात् । ‘सत्याद्या अहमात्मान्ता यद्गुणाः समुदीरिताः । तस्मै नमो भगवते यस्मादेव विमुच्यते ॥’() इति वचनाच्च ॥22॥
| |
| }}
| |
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| === सत्याधिकरणम् ===
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| |
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| न च श्रियोऽप्रयत्नत्वादनुपासनं संसारो वा । नित्यं भगवदुपस्थितेरतिप्रियत्वात् संस्कारपाटवान्नित्योपासोपपत्तेश्च ॥23॥
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| === कामाधिकरणम् ===
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| न च बन्धदार्ढ्ये श्रवणादीनामफलता । अन्यथोपासां विनैव श्रवणादिज्ञानमात्रेण मुक्तिरिति दोषः ।‘श्रवणादित्रयोत्पन्नदृष्ट्यैव स्वेच्छया हरिः । प्रसन्नो मुक्तिदो नित्यमन्यथा न कथञ्चन ॥’() इतीश्वरेच्छानियतिश्रुतेः ॥24॥
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| === निर्धारणाधिकरणम् ===
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| |
| न च गुर्वधीनत्वे ज्ञानमोक्षयोर्ज्ञानिनोऽपि कदाचित् गुरुकोपाज्ज्ञानपराभावेन(पराभवेन)अमुक्तिप्रसङ्गान्न गुर्वधीनत्वमिति । ‘ज्ञानिनो गुरुशापेऽपि नामुक्तिः संसृतेः क्वचित् । आनन्दह्रासदोषेण सैव मुक्तिर्विदुष्यति ॥’() इति वचनान्मुक्तिदूषणेनैव गुरुशापादेः(कोपादेः) कृतार्थत्वात् । ज्ञानिनो ब्रह्मवस्तुवैभवेन मुक्तिः स्यादिति गुरोर्वरेण वा मुक्त्युपपत्तेः(मुक्त्यनुपपत्तेः) ॥25॥
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| }}
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| === प्रदानाधिकरणम् ===
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| |
| शिष्यस्यापि पुरुषत्वसाम्यात् धारणादेस्तत्प्रयत्नस्य न दौर्बल्यमिति न मन्तव्यम् । ‘गुरुप्रसादो बलवान्’() इत्यादिविशेषोक्तेः(विशेषोपपत्तेः) ॥26॥
| |
| }}
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| | |
| === लिङ्गभूयस्त्वाधिकरणम् ===
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| |
| न चोत्तमगुरुस्वीकारार्थत्वेन प्राप्तसन्त्यागनिमित्तदोषः । तत्र दोषे मानाभावात् ॥27॥
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| }}
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| | |
| === पूर्वविकल्पाधिकरणम् ===
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| |
| न च विद्या कर्म वा संसारनिवृत्तिकारणमिति कारणानिर्णयः । ‘नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’() इत्यवधारणात् विद्यावचनस्य प्राधान्यात् ॥28॥
| |
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| === विद्याधिकरणम् ===
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| |
| न च विद्यावचनस्य प्राधान्यं(विद्यावचनप्राधान्यं) भ्रमः । ‘प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थमहं स च मम प्रियः’() इति भगवतस्तस्मिन्नेव (अभ्यधिकप्रीतिवचनात्)अधिकप्रीतिवचनात् । ‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः’() इति तत्प्रीतेरेव मोक्षवचनाच्च ॥29॥
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| }}
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| | |
| === श्रुत्यधिकरणम् ===
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| |
| न च कस्यचिद्विशेषज्ञानोपपत्तेर्भक्त्यादिकं विना मुक्तिः । ‘भक्त्यैवैनं जानाति भक्त्यैवैनं पश्यति भक्त्यैव बन्धात् विमुच्यते भक्त्यैवानन्दीभवति’(), ‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः’(), ‘भिनत्ति कर्मसङ्घातं प्रसन्नो भगवान् हरिः’() इत्याद्यागमात् ॥30॥
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| | |
| === अनुबन्धाधिकरणम् ===
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| न च ‘दृष्ट्वैव तं मुच्यते नापरेण’(), ‘यावान् यश्चास्मि तत्त्वतः’(), ‘ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा’() इत्यादि सामान्यालापमात्रेण दर्शनस्याविशेषः । ‘यथायोग्यमेवैष आत्मानं दर्शयति यथाधिकारं देवेभ्योऽतो ब्रह्मैवैनमभिपश्यत्यथात्मैवात्मानमभिपश्यति, सुस्थिरो ह्येष नियमः’() इति दर्शनविशेषनियमस्य सुस्थिरत्ववचनात् । यावान्यश्चास्मीति ब्रह्मण एव ज्ञानोपपत्तेः । ‘यावान्’ इत्यत्रापि सामान्यविशेषज्ञानोपपत्तेश्च ॥31॥
| |
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| | |
| === प्रज्ञान्तराधिकरणम् ===
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| |
| न च भगवतः सर्वत्र गुणसाम्यात् यस्य कस्यापि रूपस्य दर्शनात् सर्वेषां मुक्तिः ।‘समोऽपि भगवान् स्वबिम्बदर्शन एवैनं मोचयति । यथा समेष्वपि कर्मसु स्वकृतमेवैनं भोजयति ॥’() इति श्रुत्युक्तस्वकृतप्राप्तिदृष्टान्तात् ॥32॥
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| === सामान्याधिकरणम् ===
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| |
| भक्तिरेवैनमिति भक्तेरेव पृथङ्मोचकत्वदर्शनान्नेशकृत्यमिति न मन्तव्यम् ।‘अनादितो गुणाः सन्तो भक्त्याद्या न ह्यमूमुचन् । जीवं तद्गुणसुव्यक्तिं कृत्वैनं मोचयेद्धरिः । कञ्चिन्न मोचयेद्वाऽसौ स्वातन्त्र्यं तस्य तेन हि(तेन तस्य हि) । भक्तिवाक्करणत्वेन सावकाशेशवागथ । भक्त्यैनं मोचयेद् विष्णुरिति मानत्वमेष्यति ॥’() इति ब्रह्मतर्कवचनादनादिगुणविस्तरे सत्यप्यव्यक्त्यादिना तदिच्छां विना मोक्षाप्राप्तेः ॥33॥
| |
| }}
| |
| | |
| === परेणाधिकरणम् ===
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| |
| न चांशिमार्गस्यांशेनागम्यत्वात् तयोर्भेदः । साधनोत्तमस्यादृष्टस्यांशिकृतस्यांशेन भुज्यमानत्वात् । अन्यथाऽदृष्टं विना शरीराद्यनुपपत्तेः(शरीर अनुपपत्तेः) ॥34॥
| |
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| |
| | |
| === एकाधिकरणम् ===
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| |
| न च गुणान्तरसन्धानस्य क्वचित्(क्वापि) दर्शनमात्रेण समाधिकाङ्गदेवतान्तरगुणा अप्यङ्गदेवतान्तर उपसंहर्तव्याः । नानागुणत्वेन तेषां श्रुतिषु दृष्टेः । अनिषिद्धगुणानां वाक्यान्वयन्यायेनोपसंहारान्न शाखास्वित्यादिविशेषः । उत्तमेष्वधमगुणापेक्षया मन्त्रादिवद्वेति ॥35॥
| |
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| |
| | |
| === अङ्गावबद्धाधिकरणम् ===
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| न च भूमगुणस्योपासकं प्रति विशेषाभावेऽपि तत्तदिष्टगुणानुसारेण फलोपपत्तिरित्यविशेषः । ‘भूमैव देवः परमो ह्युपास्यो नैवाभूमा फलमेषां विधत्ते’() इत्यादिशिष्टेः ॥36॥
| |
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| |
| | |
| === भूमाधिकरणम् ===
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| |
| न च भूमगुण उपासकानामेकप्रकारेणैव प्रतीयत इत्यङ्गीकार्यम् । विशेषस्य कल्पनोपपत्तेरिति न मन्तव्यम् । ‘यावानेवाधिकारेषु विशेषोऽनून एव हि ।ततो(अतो) भूमत्वदृष्टौ च ब्रह्मादीनां पृथक् पृथक् ॥’() इति विशेषस्यानूनत्ववचनात् ॥37॥
| |
| }}
| |
| | |
| === नानाधिकरणम् ===
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| |
| न च शुद्धमोक्षसाधनवैरूप्यान्मोक्षसाधनत्वेनोपदिष्टं विना (विष्णावेव)विष्णोरेवोपासनान्तरस्याकर्तव्यता । अविघ्नतासाधनत्वात् ॥38॥
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| |
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| === विकल्पाधिकरणम् ===
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| |
| न च काम्यसाधनानामपि गुणानामङ्गत्वादेवोपसंहर्तव्यतानियमः । अनुपसंहारे विरोधाभावात् । काम्यानामनियताङ्गत्वाच्च । ‘अर्थादिधर्मसिद्धौ हि न नियत्याऽङ्गमिष्यते’() इति ब्रह्मतर्के ॥39॥
| |
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| === कामाधिकरणम् ===
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| न च देवादीनामिति(देवानामिति) तत्रैव विशेषवचनाभावात् ‘ब्रह्मा शिरसि ललाटे रुद्रः’() इत्यादीनां नावश्योपास्यता । ‘देवादीनामेव ध्यायेदङ्गेषु अङ्गदेवताः परस्य विशिष्टा हि गुणा मुक्तौ देवानां(देवादीनां) भवन्ति ते हि तादृशास्ते हि हरेरनुरूपाः’() इति श्रुतेर्गुणवैशेष्यात् ॥40॥
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| === अङ्गाधिकरणम् ===
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| न च क्रियात्वादुपासनाया(उपसंहारस्य) अग्निष्टोमादिवत् प्रतिशाखं वक्तव्यता । ‘उपासना यजनं चेति साम्यं तत्तद्विशेषान् संहरेत् सर्वतश्च । तथाकर्तॄणां तत्फलानां विशेषाद् व्यर्था हि शाखा अन्यथैवं च सार्थाः ॥’() इत्युपासनाविशेषाणामधिकारिविशेषाणां(.....त्वधिकारिविशेषाणांं चागऽमेवगमात् ॥41॥
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| इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥
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| }}
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| [[Category:Nyayavivaranam]]
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