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| == चतुर्थः पादः ==
| | #REDIRECT [[Nyayavivaranam#BSNV_C01_S04]] |
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| अवरत्वादिधर्मनियन्तृत्वम्, तत्तादात्म्यवत्वं चेति द्विविधं ह्यवरत्वादि(अवरत्वादि) । ‘निरनिष्टो निरवद्यः‘() इत्यादिश्रुतेः तत्तद्दोषतादात्म्यात्यस्पृष्टिनियमात् विष्णोः, ‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति’() इति श्रुतिबलाच्च (नियन्तृत्वमेव)नियन्तृत्वमवरत्वादिकमित्यापतति । श्रुतिद्वयस्यापि निरवकाशत्वात् । मृत्युशब्दादिषु प्रसिद्धेश्च । प्रसिद्धत्वाच्च(प्रसिद्धत्वात्) कर्तृव्युत्पत्तेः । ‘तमेव मृत्युममृतं’(), ‘तात दैवं सर्वात्मनावैहि परं परायणम्’() इत्यादेश्च । उपचारकल्पनायाश्च क्लिष्टत्वात्(कष्टत्वात्) । प्रमाणाभावाच्च । नाव्यक्तादिशब्दानां परमात्मविषयत्वङ्गीकारे सर्वमानविरोधः ॥1॥
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| रूढिः, (रूढो रूढयोगो महारूढो महायोगो महारूढयोगो - पा) योगः, रूढियोगः, महायोगो, रूढी, रूढियोगो, महायोगो, महारूढियोगो, रूढोपचारो, रूढलक्षणोपचारो, लक्षणेति शब्दवृत्तिभेदात्(भेदः) रूढिपूर्वकत्वेन महायोगवृत्या परमेश्वरे अखिलशब्दव्युत्पत्युपपत्तिः(अनुपपत्तेः) ॥2॥
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| === नसङ्ख्योपसङ्ग्रहाधिकरणम् ===
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| बहुरूपत्वाद् अधिकरणाधेयत्वादिकं(बहुरूपात्वाधिकरणत्वाधेयत्वादि) तस्यैव युज्यते ॥3॥
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| === आकाशाधिकरणम् ===
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| व्यक्त्यपेक्षया कार्यत्वं(कारणत्वम्) च ॥4॥
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| इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे प्रथमाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥
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| [[Category:Nyayavivaranam]] | |