|
|
| Line 1: |
Line 1: |
| == मायावादखण्डनम् ==
| | #REDIRECT [[Mayavadakhandanam#MVK_C01]] |
| {{Adhyaya
| |
| | document_id = MVK
| |
| | chapter_num = 1
| |
| | title = मायावादखण्डनम्
| |
| }}
| |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = MVK_C01_V01
| |
| | document_id = MVK
| |
| | chapter_id = MVK_C01
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = नरसिंहोखिलाज्ञानमतध्वान्तदिवाकरः ।
| |
| | verse_line2 = जयत्यमितसज्ज्ञानसुखशक्तिपयोनिधिः ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = MVK_C01
| |
| | id = MVK_C01_B01
| |
| | text =
| |
| ‘विमतम् अनारम्भणीयम् अन्यथाप्रतिपादकत्वात्, यदित्थं तत्तथा, यथा सम्प्रतिपन्नम्’ । न हि ब्रह्मात्मैक्यस्य याथार्थ्यं तत्पक्षे । अद्वैतहानेः स्वरूपातिरेके । अनतिरेके स्वप्रकाशत्वादात्मनः सिद्धसाधनता । निर्विशेषत्वादात्मनो नानधिगतो विशेषः । सिद्धत्वाद् स्वरूपस्य विशेषाभावाच्च नाज्ञानं कस्यचिदावरकम् । ‘अनधिगतार्थगन्तृ प्रमाणम्’ इति च तन्मतम् । अज्ञानासम्भवादेव तन्मतम् अखिलमपाकृतम् । मिथ्यात्वे चैक्यस्यातत्त्वावेदकत्वमागमस्य स्यात् । सत्यता च भेदस्य । एवमेव प्रयोजनमपि निरस्तम् । स्वरूपत्वात् मोक्षस्य पूर्वमेव सिद्धत्वात् । अज्ञानासम्भवेन चतुर्थप्रकाराभावात् पञ्चमप्रकारताऽपि निरस्ता । विषयप्रयोजनाभावादेव अधिकारी च । तदभावादेव सम्बन्धोऽपि ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = MVK_C01
| |
| | id = MVK_C01_B02
| |
| | text =
| |
| ‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥(भ.गी.१५.१६)
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = MVK_C01
| |
| | id = MVK_C01_B03
| |
| | text =
| |
| उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥(भ.गी.१५.१७)
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = MVK_C01
| |
| | id = MVK_C01_B04
| |
| | text =
| |
| यस्माद् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥(भ.गी.१५.१८)
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = MVK_C01
| |
| | id = MVK_C01_B05
| |
| | text =
| |
| यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥(भ.गी.१५.१९)
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = MVK_C01
| |
| | id = MVK_C01_B06
| |
| | text =
| |
| इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ । एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ॥(भ.गी.१५.२०)
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = MVK_C01
| |
| | id = MVK_C01_B07
| |
| | text =
| |
| ‘इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिः बुद्धेरात्मा महान् परः ॥’(कठ.१.३.१०)
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = MVK_C01
| |
| | id = MVK_C01_B08
| |
| | text =
| |
| ‘महतः परमव्यक्तम् अव्यक्तात् पुरुषः परः । पुरुषान्न परं किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः ॥’(कठ.१.३.१०)
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = MVK_C01
| |
| | id = MVK_C01_B09
| |
| | text =
| |
| ‘भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा च दर्शयति’(ब्र.सू.३.३.५९) । इति विष्णोः पुरुषोत्तमत्वमेव सर्वशास्त्रार्थत्वेन भगवता श्रुत्या चाभिहितम् ।
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = MVK_C01
| |
| | id = MVK_C01_B10
| |
| | text =
| |
| इति सर्वज्ञमुनिना मायावादतमोऽखलिम् । निरस्तं तत्त्ववादेन सतां संशयनुत्तये ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = MVK_C01
| |
| | id = MVK_C01_B11
| |
| | text =
| |
| नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति । एतेन सत्यवाक्येन सर्वार्थान् साधयाम्यहम् ॥(म.भा.१.१.३४)
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = MVK_C01
| |
| | id = MVK_C01_author-note
| |
| | text =
| |
| इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं मायावादखण्डनम् ॥
| |
| }}
| |
| | |
| [[Category:Mayavadakhandanam]] | |