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Mahabharatatatparyanirnaya/C19/S1: Difference between revisions

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#REDIRECT [[Mahabharatatatparyanirnaya#MBTN_C19_S01]]
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| title        = सर्वशास्त्रतात्पर्यनिर्णयः
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| verse_line1  = औं ॥ एवं शुभोच्चगुणवत्सु जनार्दनेन युक्तेषु पाण्डुषु चरत्स्वधिकं शुभानि ।नास्तिक्यनीतिमखिलां(नास्तिक्यनीतिमतुलां) गुरुदेवतादिसत्स्वञ्जसैव जगृहुर्धृतराष्ट्रपुत्राः ॥ १॥
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| verse_line1  = नाम्ना कणिङ्क इति चासुरको द्विजोऽभूत्शिष्यः सुरेतरगुरोः शकुनेर्गुरुः सः ।नीतिं स कुत्सिततमां(सुकुत्सिततमाम्) धृतराष्ट्रपुत्रेषुअधाद् रहो वचनतः शकुनेः समस्ताम् ॥ २॥
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| verse_line1  = छद्मैव यत्र परमं न सुराश्च पूज्याःस्वार्थेन वञ्चनकृते जगतोऽखिलं च ।धर्मादिकार्यमपि यस्य महोपाधिः स्याचत् श्रेष्ठः स एव निखिलासुरदैत्यसङ्घात्(निखिलात् सुरदैत्यसङ्घात्) ॥ ३॥
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| verse_line1  = इत्यादि कुत्सिततमां(कल्पिततमाम्) जगृहुः स्म विद्याम्अज्ञात एव धृतराष्ट्रमुखैः समस्तैः ।तेषां स्वभावबलतो रुचिता च सैव विस्तारिता च निजबुद्धिबलादतोऽपि ॥ ४॥
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| verse_line1  = सम्पूर्णदुर्मतिरथो धृतराष्ट्रसूनुःतातप्यमानहृदयो निखिलान्यहानि ।दृष्ट्वा श्रियं परमिकां विजयं च पार्थेषुआहेदमेत्य पितरं सह सौबलेन ॥ ५॥
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| verse_line1  = ज्येष्ठस्य तेऽपि हि वयं हृदयप्रजाता नार्हत्वमेव गमिता भवतैव राज्ये ।भ्रातुः कनीयस उतापि हि दारजाताअन्यैश्च राज्यपदवीं भवतैव नीताः ॥ ६॥
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| verse_line1  = राज्यं महच्च समवाप्स्यति धर्मसूनुःत्वत्तोऽथवाऽनुजबलात्(अथ चानुजबलात्) प्रसभं वयं तु ।दासा भवेम निजतन्तुभिरेव साकंकुन्तीसुतस्य परतोऽपि तदन्वयस्य ॥ ७॥
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| verse_line1  = नाऽत्मार्थमस्ति मम दुःखमथातिशुद्धलोकप्रसिद्धयशसस्तव कीर्तिनाशः ।अस्मन्निमित्त इति दुःखमतो हि सर्वेऽपिइच्छाम मर्तुमथ नः कुरु चाप्यनुज्ञाम् ॥ ८॥
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| verse_line1  = एवं स्वपुत्रवचनं स निशम्य राजाप्रोवाच नानुगुणमेतदहो मनस्ते ।को नाम पाण्डुतनयेषु गुणोत्तमेषुप्रीतिं न याति निजवीर्यभवोच्चयेषु(निजवीर्यभवोच्छ्रयेषु) ॥ ९॥
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| verse_line1  = ते हि स्वबाहुबलतोऽखिलभूपभूतिंमय्याकृषन्ति नच वः प्रतिषेधकास्ते ।तस्माच्छमं व्रज शुभाय कुलस्य तातक्षेमाय नो भवति वो बलवद्विरोधः ॥ १०॥
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| verse_line1  = एवं ब्रुवत्यपि नृपे पुनराह पापआश्रित्य सौबलमतं यदि नैव पार्थान् ।अन्यत्र यापयसि(प्रापयसि) नागपुरात् परेतान्दृष्ट्वाऽखिलानपि हि नो मुदमेहि पार्थैः ॥ ११॥
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| verse_line1  = एवं निशम्य गदितं सुतहार्दपाशैः आकृष्यताऽशु स नृपोऽरिधरेच्छयैव ।प्रोवाच पुत्रमपि ते बलिनो न पार्थाःशक्याः पुरात् तनय यापयितुं कथञ्चित् ॥ १२॥
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| verse_line1  = इत्युक्त आह पितरं(नृपतिम्) शकुनिं निरीक्ष्य सृष्टो मया विधिरिहाद्य शृणुष्व तं च ।आसंस्त्रयोदश समा नगरं प्रविष्टे-ष्वेतेषु तावदयमेव विधिर्मयेष्टः ॥ १३॥
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| verse_line1  = द्रौणेर्हि नास्ति सदृशो बलवान् प्रतापीसोऽयं मया बहुविधैः परमैरुपायैः ।नीतो वशं वशगतोऽस्य च मातुलेनसाकं पिता तमनु चैष नदीप्रसूतः ॥ १४॥
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| verse_line1  = एवं हि सैनिकगणा अपि दानमानैःप्रायो वशं मम गता अपि चैष कर्णः ।अस्त्रे बलेऽप्यधिक एव सुरेन्द्रसूनोःजेष्ये च मन्त्रबलतस्त्वहमेव भीमम् ॥ १५॥
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| verse_line1  = त्रिंशच्छतं परमकाः सुरदुर्लभाश्चदुर्वाससो हि मनवोऽद्य मया गृहीताः ।अन्यत्र ते प्रविहिता नहि वीर्यवन्तःस्युर्भीम इत्यहममून् न नियोजयामि ॥ १६॥
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| verse_line1  = ते वीर्यदा विजयदा अपि वारिवह्निस्तम्भादिदाः सकलदेवनिकायरोधाः ।वृष्ट्याद्यभीप्सितसमस्तकरा अमूभिःजेष्यामि भीमममुमेकमयातयामैः ॥ १७॥
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| verse_line1  = सौहार्दमेषु यदिवाऽतितरां(यदि वा नितराम्) करोषितत्रापि नैव हि मया क्रियते विरोधः ।वत्स्यन्तु वारणवते भवतु स्म राष्ट्रंतेषां तदेव मम नागपुरं त्वदर्थे ॥ १८॥
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| verse_line1  = एवं स्वपुत्रपरिपालनतो यशस्तेभूयाद् विनश्यति परप्रसवातिपुष्टौ ।जाते बले तव विरोधकृतश्च ते स्युःस्वार्थं हि तावदनुयान्त्यपि केवलं त्वाम् ॥ १९॥
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| verse_line1  = क्षत्तैक एव सततं परिपोषकोऽलंतेषां मम द्विडथ मन्त्रबलादमुष्य ।पौराश्च जानपदकाः(जानपदिकाः) सततं द्विषन्तिमां तेष्वतीव दृढसौहृदचेतसश्च ॥ २०॥
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| verse_line1  = ते तेषु(एतेषु) दूरगमितेषु निराश्रयत्वात्मामेव दुर्बलतया परितः श्रयन्ते ।भीष्मादयश्च नहि तन्निकटे विरोधंकुर्युर्विनश्यति गतेषु हि सौहृदं तत् ॥ २१॥
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| verse_line1  = भेदः कुलस्य भविता कुलनाशहेतुअस्माभिरेषु सहितेषु पुरे वसत्सु ।तस्मादुपायबलतः प्रतियापनीयाःते वारणावतमितो विहितोऽप्युपायः ॥ २२॥
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| verse_line1  = विष्णुर्जयन्त इति शम्भुसहाय आस्तेदेवोत्सवश्च सुमहान् भविताऽत्र सुष्ठु ।भक्ताश्च ते हि नितरामरिशङ्खपाणौत्वच्चोदिताः समुपयान्ति तमुत्सवं द्राक् ॥ २३॥
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| verse_line1  = अज्ञाप्य मत्पुरुषतां पुरुषैर्मदीयैःमध्यस्थवद् बहुगुणा उदिताश्च तत्र ।तेषां पुरोऽत्र गमनाभिरुचिश्च जाताद्रष्टुं पुरं बहुगुणं ननु पाण्डवानाम् ॥ २४॥
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| verse_line1  = इत्युक्तवत्यथ सुते स तथेत्युवाचप्राप्तेषु पाण्डुतनयेषु तथैव चोचे ।ज्ञात्वैव तेऽपि नृपतेर्हृदयं समस्तंजग्मुः पितेति पृथया सह नीतिहेतोः ॥ २५॥
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| verse_line1  = भीमस्तदा ह(तदाऽऽह/तदैव) भविताऽत्र हि भैक्षचारइत्येव सम्यगनुविद्य निजं न कर्म ।त्याज्यं त्विति प्रतिजगाद निजाग्रजाययामो वयं नतु गृहात् स हि नः स्वधर्मः ॥ २६॥
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| verse_line1  = निष्कालयन्ति यदि नो निजधर्मसंस्थान्योत्स्यामहेऽत्र नहि दस्युवधोऽप्यधर्मः ।इत्यूचिवांसममुमाह च धर्मसूनुःकीर्तिर्विनश्यति हि नो गुरुभिर्विरोधे ॥ २७॥
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| verse_line1  = इत्युक्तवाक्यममुमग्रजमन्वगात् सभीमः प्रदर्श्य निजधर्ममथानुवृत्त्यै ।दोषो भवेदुभयतो यत एव तेनवाच्यः स्वधर्म उत न स्थितिरत्र कार्या ॥ २८॥
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| verse_line1  = कीर्त्यर्थमेव निजधर्मपरिप्रहाणेप्राप्तेऽग्रजस्य वचनात् प्रविहातुमेव(प्रतिहातुं, प्रतिहन्तुम्) ।भीमस्य दोषमुभयं प्रतिहन्तुमीशोज्येष्ठं चकार हरिरत्र सुतं वृषस्य ॥ २९॥
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| verse_line1  = हन्तव्यतामुपगतेषु सुयोधनादि-ष्वन्योवधान्नहि भवेन्निजधर्म एव ।पूर्वं वधे नहि समस्तश एव दोषाःतेषां प्रयान्ति विवृतिं च तदर्थतोऽपि ॥ ३०॥
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| verse_line1  = क्षत्ताऽथ चाऽह सुवचोऽन्त्यजभाषयैवधर्मात्मजं विषहुताशभयात् प्रतीताः ।आध्वं त्विति स्म स तथेति वचोऽप्युदीर्यप्रायाच्च वारणवतं पृथयाऽनुजैश्च ॥ ३१॥
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| verse_line1  = तान् हन्तुमेव च तदा धृतराष्ट्रसूनुःलाक्षागृहं सपदि काञ्चनरत्नगूढम् ।कृत्वाऽभ्ययातयदमुत्र हि(च) विष्णुपद्या(विष्णुपद्यां)स्वामात्यमेव च पुरोचननामधेयम् ॥ ३२॥
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| verse_line1  = पूर्वं प्रहस्त इति यस्त्वभवत् सुपापःसोऽभ्येत्य पाण्डुतनयानभवच्च मन्त्री ।दुर्योधनं प्रतिविहाय भवत्सकाशम्आयात इत्यवददेषु स कूटवाक्यम् ॥ ३३॥
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| verse_line1  = दिव्यं गृहं च भवतां हि मयोपनीतंप्रीत्यैव पापमनुयातुमहं न शक्तः ।युष्मासु धर्मधृतिमत्सु सदा निवत्स्यइत्यूचिवांसममुमाहुरहो सुभद्रम् ॥ ३४॥
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| verse_line1  = दृष्ट्वैव जातुषगृहं वसया समेतंतद्गन्धतो वृषसुतः पवमानजातम् ।तं चातिपापमवदत् सुमुखैष पापोहन्तुं न इच्छति सदा भव च प्रतीतः ॥ ३५॥
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| verse_line1  = क्षत्ताऽथ नीतिबलतोऽखिललोकवृत्तंजानन् स्वचारमुखतः खनकाय चोचे ।उक्त्वैव धर्मतनयाय मदीयवाक्यंपूर्वोक्तमाशु कुरु तत्र बिलं सुदूरम् ॥ ३६॥
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| verse_line1  = चक्रे स चैवमथ वर्त्म वृतिच्छलेनद्वारं च तस्य स पिधाय ययौ गृहं स्वम् ।भीमः पुरोचन उभावपि तौ वधायच्छिद्रार्थिनौ मिथ उतोषतुरब्दकार्द्धम् ॥ ३७॥
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| verse_line1  = तस्याग्रजा च सहिता सुतपञ्चकेनतत्राऽगमत् तदनु मारुतिरेष कालः ।इत्थं विचिन्त्य स निशाम्य च तान् प्रसुप्तान्भ्रातॄंश्च मातरमथाऽशु बिले न्यधात् प्राक् ॥ ३८॥
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| verse_line1  = तं भागिनेयसहितं भगिनीं च तस्यपापां ददाह सगृहां पवमानसूनुः ।साऽप्यागता हि गरलेन निहन्तुमेतान्भीमस्य पूर्वभुजितो न शशाक चैतत् ॥ ३९॥
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| verse_line1  = तप्तं तया ससुतया च तपो नितान्तंस्यां सूनुभिः सह बलाददितिस्तथाऽब्दात् ।तस्या अदाच्च गिरिशो यदि पुत्रकैस्त्वंयुक्ता न यासि मृतिमेष वरस्तवेति ॥ ४०॥
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| verse_line1  = जानन्निदं सकलमेव स(च) भीमसेनोहत्वा सुतैः सह कुबुद्धिमिमां हि तं च ।भ्रातॄंश्च मातरमुदूह्य ययौ बिलात् सनिर्गत्य भीतिवशतोऽबलतां प्रयातान् ॥ ४१॥
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| verse_line1  = ज्ञात्वा पुरोचनवधं यदि भीष्ममुख्यैःवैचित्रवीर्यतनया अभियोधयेयुः ।किं नो भवेदिति भयं सुमहद् विवेशभीमं त्वृते च तनयान् सकलान् पृथायाः ॥ ४२॥
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| verse_line1  = भीमोऽभयोऽपि गुरुभिः स्वमुखेन युद्धम्अप्रीयमाण उत धर्मजवाक्यहेतोः ।ऊह्यैव तानपि(तान् उरु) ययौ द्युनदीं च तीर्त्वाक्षत्त्राऽतिसृष्टमधिरुह्य(क्षत्ता निसृष्टमधिरुह्य) जलप्रयाणम् ॥ ४३॥
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| verse_line1  = विश्वासिता विदुरपूर्ववचोभिरेवदाशोदिताभिरधिरुह्य च भीमपृष्ठम् ।सर्वे ययुर्वनमथाभ्युदिते च सूर्येदृष्ट्वैव सप्त मृतकानरुदंश्च(मृतकान् रुरुदुश्च) पौराः ॥ ४४॥
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| verse_line1  = हा पाण्डवानदहदेष हि धार्तराष्ट्रोधर्मस्थितान् कुमतिरेव पुरोचनेन ।सोऽप्येष दग्ध इह दैववशात् सुपापःको नाम सत्सु विषमः प्रभवेत् सुखाय ॥ ४५॥
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| verse_line1  = भीमोऽप्युदूह्य वनमाप हिडिम्बकस्यभ्रातॄन् पृथां च तृषितैरभियाचितश्च ।पानीयमुत्तरपटेऽम्बुजपत्रनद्धंदूरादुदूह्य ददृशे स्वपतोऽथ तांश्च ॥ ४७॥
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| verse_line1  = रक्षार्थमेव परिजाग्रति भीमसेनेरक्षः स्वसारमभियापयते हिडिम्बीम् ।सा रूपमेत्य शुभमेव ददर्श भीमंसाक्षात् समस्तशुभलक्षणसारभूतम् ॥ ४८॥
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| verse_line1  = सा राक्षसीतनुमवाप सुरेन्द्रलोकश्रीरेव शक्रदयिता त्वपरैव शच्याः ।शापात् स्पृधा पतिमवाप्य च मारुतिं (मारुतं) साप्राप्तुं निजां तनुमयाचत भीमसेनम् ॥ ४९॥
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| verse_line1  = सा भारती वरमिमं प्रददावमुष्यैस्वावेशमात्मदयितस्य च सङ्गमेन ।शापाद् विमुक्तिमतितीव्रतपःप्रसन्नातेनाऽह(तेनाऽप) सा निजतनुं पवमानसूनोः ॥ ५१॥
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| verse_line1  = ज्ञानं च नैजमभिदर्शयितुं पुनश्चप्राहेश्वरोऽखिलजगद्गुरुरिन्दिरेशः ।व्यासस्वरूप इह चेत्य परश्व एवमां ते प्रदास्यति तदा प्रकरोषि मेऽर्थ्यम् ॥ ५२॥
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| verse_line1  = काले तदैव कुपितः प्रययौ हिडिम्बोभीमं निहन्तुमपि तां च निजस्वसारम् ।भक्षार्थमेव हि पुरा स तु तां न्ययुङ्क्तनेतुं च तानथ समासददाशु भीमम् ॥ ५३॥
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| verse_line1  = सा भीममेव शरणं प्रजगाम तां चभ्रातॄंश्च मातरमथावितुमभ्ययात् तम् ।भीमः सुदूरमपकृष्य सहोदराणांनिद्राप्रभङ्गभयतो युयुधेऽमुना च ॥ ५४॥
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| verse_line1  = तौ मुष्टिभिस्तरुभिरश्मभिरद्रिभिश्चयुद्ध्वा नितान्तरवतः प्रतिबोधितांस्तान् ।सञ्चक्रतुस्तदनु सोदरसम्भ्रमं तंदृष्ट्वैव मारुतिरहन्नुरसि स्म रक्षः ॥ ५५॥
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| verse_line1  = तद् भीमबाहुबलताडितमीशवाक्यात्सर्वैरजेयमपि भूमितले पपात ।वक्त्रस्रवद्बहुलशोणितमाप मृत्युंप्रायात् तमोऽन्धमपि नित्यमथ क्रमेण ॥ ५६॥
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| verse_line1  = हत्वैव शर्ववररक्षितराक्षसं तंसर्वैरवध्यमपि सोदरमातृयुक्तः ।भीमो ययौ तमनु सा प्रययौ हिडिम्बीकुन्ती युधिष्ठिरमथास्य कृते ययाचे ॥ ५७॥
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| verse_line1  = ताभ्यामनूक्तमपि यन्न करोति भीमःप्रादुर्बभूव निखिलोरुगुणाभिपूर्णः ।व्यासात्मको हरिरनन्तसुखाम्बुराशिः(अनन्तसुखाब्धिराशिः)विद्यामरीचिविततः सकलोत्तमोऽलम् ॥ ५८॥
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| verse_line1  = दृष्ट्वैव तं परममोदिन आशु पार्थामात्रा सहैव परिपूज्य गुरुं विरिञ्चेः ।सल्लालिताश्च (उल्लालिताश्च) हरिणा परमातिहार्दप्रोत्फुल्लपद्मनयनेन सदोपविष्टाः ॥ ५९॥
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| verse_line1  = तान् भक्तिनम्रशिरसः समुदीक्ष्य कृष्णोभीमं जगाद नत आशु हिडिम्बया च ।एतां गृहाण युवतीं सुरसद्मशोभांजाते सुते सहसुता प्रतियातु चैषा ॥ ६०॥
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| verse_line1  = एवं ब्रुवत्यगणितोरुगुणे रमेशओमित्युदीर्य कृतवांश्च तथैव भीमः ।स्कन्धेन चोह्य विबुधाचरितप्रदेशान्भीमं प्रयात्युदय एव रवेर्हिडिम्बी ॥ ६१॥
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| verse_line1  = सा नन्दनादिषु वनेषु विहृत्य तेनसायं प्रयाति पृथया सहितांश्च पार्थान् ।एवं ययावपि तयोरिह वत्सरार्द्धोजातश्च सूनुरतिवीर्यबलोपपन्नः ॥ ६२॥
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| verse_line1  = देवोऽपि राक्षसतनुर्निर्हृतिः पुरा यआवेशयुक् च गिरिशस्य घटोत्कचाख्यः ।पूर्वं घटोपमममुष्य शिरो बभूवकेशा निमेषत उदासुरतो हि नाम ॥ ६३॥
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| verse_line1  = जाते सुते समयतो भगवत्कृतात् सभीमो जगाद ससुतां गमनाय तां च ।स्मृत्याऽभियान उभयोरपि सा प्रतिज्ञांतेषां विधाय च ययौ सुरलोकमेव ॥ ६४॥
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| verse_line1  = व्यासोऽपि पाण्डुतनयैः सहितो बकस्यरौद्राद् वराज्जयवधापगतस्य नित्यम् ।यातो वधाय परमागणितोरुधामापूर्णाक्षयोरुसुख आशु तदैकचक्राम् ॥ ६५॥
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| verse_line1  = तान् ब्राह्मणस्य च गृहे प्रणिधाय कृष्णःशिष्या ममैत इति विप्रकुमाररूपान् ।आयामि काल इति ताननुशास्य चायात्ते तत्र वासमथ चक्रुरनूच्य वेदान् ॥ ६६॥
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| verse_line1  = भिक्षामटत्सु सततं प्रतिहुङ्कृतेनभीमे विशां सदन एव गृहप्रमाणम् ।भाण्डं कुलालविहितं प्रतिगृह्य गच्छ-त्याशङ्कयाऽवगमनस्य तमाह धार्मः ॥ ६७॥
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| verse_line1  = स्थूलं हि सद्म पृथिवीसहितं त्वरक्षउद्धृत्य वह्निमुखतस्तदु(तदुतैकदोष्णा) चैकदोष्णा ।भाण्डं तदर्थमुरु कुम्भकरेण दत्तंभिक्षां च तेन चरसि प्रतिहुङ्कृतेन ॥ ६८॥
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| verse_line1  = धर्मस्य ते सुनियतेर्बलश्च बोधोभूयात् सुयोधनजनस्य ततो भयं मे ।मात्रा सहैव वस फल्गुनपूर्वकैस्त्वम्आनीतमेव परिभुङ्क्ष्व नतु व्रजेथाः ॥ ६९॥
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| verse_line1  = इत्युक्त आशु स चकार तथैव भीमःतेऽपि स्वधर्मपरिरक्षणहेतुमौनाः ।भिक्षां चरन्त्यथ चतुर्ष्वपि तेषु याते-ष्वेकत्र मातृसहितः स कदाचिदास्ते ॥ ७०॥
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| verse_line1  = तत्काल एव रुदितं निजवासहेतोःविप्रस्य दारसहितस्य निशम्य भीमः ।स्त्रीबालसंयुतगृहे शिशुलालनादौ (शिशुपालनादौ) लज्जेदिति स्म जननीमवदन्नचागात् ॥ ७१॥
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| verse_line1  = जानीहि विप्ररुदितं कुत इत्यतश्चयोग्यं विधास्य इति सा प्रययौ च शीघ्रम् ।सा संवृतैव सकलं वचनं गृहेऽस्यशुश्राव विप्रवर आह तदा प्रियां सः ॥ ७२॥
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| verse_line1  = दातव्य एव हि करोऽद्य च रक्षसस्यसाक्षाद् बकस्य गिरिसन्निभभक्ष्यभोज्यः(गिरिसन्निभभक्षभोज्यः) ।पुंसाऽनसा च सहितानडुहा पुमांस्तुनैवास्ति नोऽप्रददतां(नो प्रददतां) च समस्तनाशः ॥ ७३॥
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| verse_line1  = अन्यत्र याम इति पूर्वमुदाहृतं मे नैतत् प्रिये तव मनोगतमास तेन ।यास्यामि राक्षसमुखं स्वयमेव मर्तुंभार्यैनमाह न भवानहमत्र यामि ॥ ७४॥
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| verse_line1  = अर्थे तवाद्य तनुसन्त्यजनादहं स्यां लोके सतीप्रचरिते(सती प्रचलिते) तदृते त्वधश्च ।कन्याऽऽह चैनमहमेव(चैनमहमेवि) न कन्ययाऽर्थ इत्युक्त आह धिगिति स्म स विप्रवर्यः ॥ ७५॥
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| verse_line1  = कन्योदिता बत कुलद्वयतारिणीति जाया सखेति वचनं श्रुतिगं सुतश्च ।आत्मैव तेन नतु जीवनहेतुतोऽहंधीपूर्वकं न्रशनके(नृशनके) प्रतिपादयामि ॥ ७६॥
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| verse_line1  = एवं रुदत्सु सहितेषु कुमारकोऽस्यप्राह स्वहस्तगतृणं प्रतिदर्श्य चैषाम् ।एतेन राक्षसमहं निहनिष्य एवे-त्युक्ते सुवाक्यमनु सा प्रविवेश कुन्ती ॥ ७७॥
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| verse_line1  = पृष्टस्तयाऽऽह स तु विप्रवरो बकस्यवीर्यं बलं च दितिजारिभिरप्यसह्यम् ।संवत्सरत्रययुते दशके करं चप्रातिस्विकं दशमुखस्य च मातुलस्य ॥ ७८॥
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| verse_line1  = श्रुत्वा तमुग्रबलमत्युरुवीर्यमेवरामायणे रघुवरोरुशरातिभीतम् ।विष्टं बिलेष्वथ नृपान् वशमाशु कृत्वाभीत्यैव तैस्तदनु दत्तकरं ननन्द ॥ ७९॥
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| verse_line1  = एवं बलाढ्यममुमाशु निहत्य भीमःकीर्तिं च धर्ममधिकं प्रतियास्यतीह ।सर्वे वयं च तमनु प्रगृहीतधर्मा(प्र गृहीतधर्मा)यास्याम इत्यवददाशु धरासुरं तम् ॥ ८०॥
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| verse_line1  = सन्ति स्म विप्रवर पञ्च सुता ममाद्यतेष्वेक एव नरवैरिमुखाय यातु ।इत्युक्त आह स न ते सुतवध्ययाऽहंपापो भवानि(भवामि)तव हन्त मनोऽतिधीरम् ॥ ८१॥
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| verse_line1  = उक्तैवमाह च पृथा तनये मदीयेविद्याऽस्ति दिक्पतिभिरप्यविषह्यरूपा ।उक्तोऽपि नो गुरुभिरेष नियुङ्क्त एतांवध्यस्तथाऽपि न सुरासुरपालकैश्च ॥ ८२॥
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| verse_line1  = उक्त्वैवमेत्य निखिलं च जगाद भीमउद्धर्ष आस स निशम्य महास्वधर्मम् ।प्राप्तं विलोक्य तमतीव विघूर्णनेत्रंदृष्ट्वा जगाद यमसूनुरुपेत्य चान्यैः ॥ ८३॥
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| verse_line1  = मातः किमेष मुदितोऽतितरामिति स्म(मुदितो नितराम्)तस्मै च सा निखिलमाह स चाब्रवीत् ताम् ।कष्टं त्वया कृतमहो बलमेव यस्यसर्वे श्रिता वयममुं च निहंसि (विहंसि) भीमम् ॥ ८४॥
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| verse_line1  = यद्बाहुवीर्यपरमाश्रयतो हि राज्यम्इच्छाम एव निखिलारिवधं स्वधर्मम् ।सोऽयं त्वयाऽद्य निशिचारिमुखाय(निशिचारमुखाय)मातःप्रस्थाप्यते वद ममाऽशु कयैव बुद्ध्या ॥ ८५॥
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| verse_line1  = एष स्वयं हि मरुदेव नरात्मकोऽभूत्को नाम हन्तुमिममाप्तबलो जगत्सु ।इत्येवमस्त्विति स तामवदत् परेद्युःभीमो जगाम शकटेन कृतोरुभोगः ॥ ८७॥
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| verse_line1  = गत्वा त्वरन् बकवनाय सकाशमाशुभीमः सपायससुभक्ष्यपयोघटाद्यैः ।युक्तं च शैलनिभमुत्तममन्नराशिंस्पर्शात् पुरैव नरभक्षितुरत्तुमैच्छत् ॥ ८८॥
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| verse_line1  = तेनैव चान्नसमितौ परिभुज्यमानउत्पाट्य वृक्षममुमाद्रवदाशु रक्षः ।वामेन मारुतिरपोह्य तदा प्रहारान्हस्तेन भोज्यमखिलं सहभक्ष्यमादत् ॥ ८९॥
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| verse_line1  = पीत्वा पयो त्वरित एनमवेक्षमाण(अवेक्ष्यमाण)आचम्य तेन युयुधे गुरुवृक्षशैलैः ।तेनाऽहतोऽथ बहुभिर्गिरिभिर्बलेनजग्राह चैनमथ भूमितले पिपेष ॥ ९०॥
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| verse_line1  = द्वार्येव तत् प्रतिनिधाय पुनः स भीमःस्नात्वा जगाम निजसोदरपार्श्वमेव ।श्रुत्वाऽस्य कर्म परमं तुतुषुः समेतामात्रा च ते तदनुभीतियुताः पुरस्थाः(भीतियुताश्च जाताः) ॥ ९३॥
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| verse_line1  = उत्पत्तिपूर्वककथां द्रुपदात्मजायाव्यासो ह्यनूच्य जगतां गुरुरीश्वरेशः(गुरुरीश्वरश्च) ।यातेत्यचोदयदथाप्यपरे द्विजाग्र्याःतान् ब्राह्मणा इति भुजिर्भवतेति चोचुः(भवतीति चोचुः) ॥ ९६॥
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| verse_line1  = पूर्वं हि पार्षत इमान् जतुगेहदग्धान्श्रुत्वाऽतिदुःखितमनाः पुनरेव(पुनरेष) मन्त्रः ।याजोपयाजमुखनिस्सृत एवमेषनासत्यतार्ह इति जीवनमेषु मेने ॥ ९७॥
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| verse_line1  = स प्राप्य(सम्प्राप्य) हस्तिनपुरं धृतराष्ट्रपुत्रान्संवञ्चयंस्तदनुसारिकथाश्च कृत्वा(श्रुत्वा) ।भीष्मादिभिः परिगतो(परिगताप्रियवत्,परिवृतोऽप्रियवत्)ऽप्रियवज्जगाम द्वारावतीमुदितपूर्णसुनित्यसौख्यः ॥ १००॥
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| verse_line1  = इत्युक्त आशु कुमतिः स तु(स हि) पूर्वदेहेदैत्यो यतस्तदकरोदथ सत्यभामा ।आनन्दसंविदपि लोकविडम्बनायतद्देहमस्य तिलजे पतिमभ्युपागात् ॥ १०३॥
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| verse_line1  = श्रुत्वा तदीयवचनं भगवान् पुरीं स्वाम्आयात एव तु निशम्य महोत्सवं तम् ।पाञ्चालराजपुरुषोदितमाशु वृष्णि-वर्यैरगान्मुसलिना सह तत्पुरीं च ॥ १०४॥
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| verse_line1  = भीमोऽपि रुद्रवररक्षितराक्षसं तंहत्वा तृणोपमतया हरिभक्ति(क्त)वन्द्यः ।उष्याथ तत्र कतिचिद्दिनमच्युतस्यव्यासात्मनो वचनतः प्रययौ निजैश्च ॥ १०५॥
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| verse_line1  = मङ्गल्यमेतदतुलं प्रतियात शीघ्रंपाञ्चालकान् परमभोजनमत्र सिद्ध्येत् ।विप्रैरितस्तत इतीरितवाक्यमेतेशृण्वन्त एव परिचक्रमुरुत्तराशाम् ॥ १०६॥
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| verse_line1  = षण्णां च मध्यगमुदीर्णभुजं विशाल-वक्षस्थलं बहुलपौरुषलक्षणं च ।दृष्ट्वैव मारुतिमसावुपलप्स्यतीहकृष्णामिति स्म च वचः प्रवदन्ति विप्राः ॥ १०७॥
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| verse_line1  = रात्रौ दिवा च सततं पथि गच्छमानाःप्रापुः कदाचिदथ विष्णुपदीं निशायाम् ।सर्वस्य रक्षितुमगादिह पृष्ठतस्तुभीमोऽग्र एव शतमन्युसुतोऽन्तरेऽन्ये ॥ १०८॥
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| verse_line1  = प्राप्ते तदोल्मुकधरेऽर्जुन एव गङ्गांगन्धर्वराज इह चित्ररथोऽर्द्धरात्रे ।दृष्ट्वैव विप्ररहितानुदकान्तरस्थःक्षत्रात्मजा इति ह धर्षयितुं स चाऽगात् ॥ १०९॥
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| verse_line1  = हन्ताऽस्मि वो ह्युपगतानुदकान्तमस्यानद्याश्च मर्त्यचरणाय निषिद्धकाले ।इत्थं वदन्तममुमाह सुरेन्द्रसूनुःगन्धर्व नास्त्रविदुषां भयमस्ति तेऽद्य ॥ ११०॥
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| verse_line1  = सर्वं हि फेनवदिदं बहुलं बलं तेनार्थप्रदं भवति चास्त्रविदि प्रयुक्तम् ।इत्युक्तवन्तममुमुत्तमयानसंस्थोबाणान् क्षिपन्नभिससार सुरेशभृत्यः ॥ १११॥
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| verse_line1  = आग्नेयमस्त्रमभिमन्त्र्य तदोल्मुके सचिक्षेप शक्रतनयोऽस्य रथश्च दग्धः ।तं चाग्निना परिगृहीतमभिप्रगृह्यकेशेषु सञ्चकर्षाऽशु सुरेन्द्रसूनुः ॥ ११२॥
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| verse_line1  = पार्थेन सन्धर्षितः शरणं जगामधर्मात्मजं तमपि सोऽथ निजास्त्रमुग्रम् ।सञ्जह्र एव तत आस च नामतोऽसौअङ्गारवर्ण इति वर्णविपर्ययेण ॥ ११३॥
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| verse_line1  = गन्धर्व उल्बणसुरक्ततनुः स भूत्वास्वर्णावदात उत पूर्वमुपेत्य सख्यम् ।पार्थेन दुर्लभमहास्त्रमिदं ययाचेजानन्नपि स्म नहि तादृशमेष वेद ॥ ११४॥
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| verse_line1  = विद्या सुशिक्षिततमा हि सुरेशसूनौतामस्य चावददसावपि कालतोऽस्मै ।गन्धर्वगामवददन्वगदृश्यविद्यांपश्चादिति स्म पुरुहूतसुतस्य वाक्यात् ॥ ११५॥
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| verse_line1  = आधिक्यतः स्वगतसंविद एव साम्येनैवेच्छति स्म निमयं स धनञ्जयोऽत्र ।धर्मार्थमेव स तु तां परिदाय तस्मैकालेन संविदममुष्य च धर्मतोऽयात् ॥ ११६॥
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| verse_line1  = पार्थेन सोऽपि बहुलाश्च कथाः कथित्वाधौम्यस्य सङ्ग्रहणमाह पुरोहितत्वे ।दास्यामि दिव्यतुरगानिति सोऽर्जुनायवाचं निगद्य दिवमारुहदप्यगुस्ते ॥ ११७॥
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| verse_line1  = ते धौम्यमाप्य च पुरोधसमुत्तमज्ञंविप्रात्मजोपमतया विविशुः पुरं च ।पाञ्चालकस्य निखिलां ददृशुश्च तत्रमूर्धाभिषिक्तसमितिं समलङ्कृतां च ॥ ११८॥
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| verse_line1  = राजन्यमण्डलमुदीक्ष्य सुपूर्णमत्रकृष्णां प्रगृह्य सहजः प्रगृहीतमालाम् ।तेषां च मध्यमगमत् कुलवीर्यसम्पद्युक्तां विभूतिमथ चाऽह समस्तराज्ञाम् ॥ ११९॥
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| verse_line1  = तांश्च प्रदर्श्य सकलान्(निखिलान्) स हुताशनांशःचापं च तत् प्रतिनिधाय सपञ्चबाणम् ।आहाभिभाष्य सकलान् नृपतीनथोच्चैःदीप्यद्धुताशनवपुर्घनतुल्यघोषः ॥ १२०॥
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| verse_line1  = एतेन कार्मुकवरेण तरूपरिस्थंमत्स्यावभासमुदके प्रतिवीक्ष्य येन ।एतैः शरैः प्रतिहतो भवतीह मत्स्यःकृष्णाऽनुयास्यति तमद्य नरेन्द्रवीराः ॥ १२१॥
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| verse_line1  = इत्यस्य वाक्यमनु सर्वनरेन्द्रपुत्राउत्तस्थुरुद्धतमदाश्चलकुण्डलास्याः ।अस्त्रं बलं च बहु नैजमभीक्षमाणाःस्पर्धन्त एव च मिथः समलङ्कृताङ्गाः ॥ १२२॥
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| verse_line1  = केचिन्निरीक्ष्य धनुरेत्य न मे सुशक्यम्इत्येव चापययुरन्य उत प्रचाल्य ।तत्राऽससाद शिशुपाल उरुप्रतापःसङ्गृह्य तत् समधिरोपणयत्न(समनुरोपणयत्न) आसीत् ॥ १२३॥
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| verse_line1  = माषान्तराय स चकर्ष यदैव कोट्याउन्नम्य तत् प्रतिजघान तमेव चाऽशु ।अन्यत्र फल्गुनत एतदशक्यमेवे-त्यञ्जो गिरीशवरतः स ययौ च भग्नः ॥ १२४॥
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| verse_line1  = मद्रेश एत्य चकृषे स्थविरोऽपि वीर्यात्चेदीशतोऽप्यधिकमेव स मुद्गमात्रे ।शिष्टे(शिष्ये)ऽमुना प्रतिहतः स ययावशक्यंमत्वाऽऽत्मनस्तदनु भूपतयो विषण्णाः ॥ १२५॥
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| verse_line1  = सन्नेषु भूपतिषु मागध आससादसोऽवज्ञयैव बलवीर्यमदेन दृप्तः ।चापं चकर्ष चलपादतलो बलेनशिष्टे स सर्षपमितेऽभिहतोऽमुनैव ॥ १२६॥
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| verse_line1  = जानुन्यमुष्य धरणीं ययतुस्तदैवदर्पेण चास्थिरपदस्थितिमात्रहेतोः (चास्थिरपदः स्थितिमात्रहेतोः) ।रौद्राद् वरात् स जडतां गमितोऽथ राजाराज्ञां मुखान्यभिवीक्ष्य ययौ स्वराष्ट्रम् ॥ १२७॥
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| verse_line1  = प्रायो गतास्तमनु(गतास्तदनु) भूपतयोऽथ कर्णोदुर्योधनार्थमनुगृह्य धनुश्चकर्ष ।रामादुपात्तशुभशिक्षितमात्रतोऽसौरोमावशिष्टमकरोद् धनुषोऽन्तमाशु ॥ १२८॥
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| verse_line1  = तस्मिंश्च तेन विहते(निहते) प्रतिसन्निवृत्तेभीमार्जुनौ द्विजसदस्युपसन्निविष्टौ ।उत्तस्थतू रविशशिप्रतिमानरूपौविप्रेषु तत्र च भिया विनिवारयत्सु ॥ १२९॥
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| verse_line1  = विप्राश्च केचिदतियुक्तमिमौ हि वीरौदेवोपमाविति वचो जगदुस्ततस्तौ ।दृष्ट्वैव कृष्णमुखपङ्कजमाशु चापसान्निध्यमाययतुरुत्तमवीर्यसारौ ॥ १३०॥
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| verse_line1  = तत्रार्जुनः पवनजात् प्रियतोऽप्यनुज्ञाम्(अभ्यनुज्ञाम्)आदाय केशवमजं मनसा प्रणम्य ।कृत्वा गुणान्वितमदो(मथो) धनुरश्रमेणयन्त्रान्तरेण स शरैरधुनोच्च लक्षम् ॥ १३१॥
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| verse_line1  = कृष्णा तदाऽस्य विदधे नवकञ्जमालांमध्ये च तां प्रतिविधाय(प्रतिनिधाय) नरेन्द्रपुत्रौ ।भीमार्जुनौ ययतुरच्युतमाभिनम्यक्षुब्धं तदा नृपवराब्धिरिमावधावत् ॥ १३२॥
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| verse_line1  = द्रष्टुं हि केवलगतिर्नतु कन्यकायाअर्थे न चापमिह वृष्णिवराः स्पृशन्तु ।इत्याज्ञयैव वरचक्रधरस्य लिप्साम्अन्यत्र(अप्यत्र) चक्रुरिह नैव यदुप्रवीराः ॥ १३३॥
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| verse_line1  = भीमस्तु राजसमितिं प्रतिसम्प्रयातांदृष्ट्वैव योजनदशोच्छ्रयमाशु वृक्षम् ।आरुज्य(आगृह्य) सर्वनृपतीनभितोऽप्यतिष्ठद्दृष्ट्वा पलायनपराश्च बभूवुरेते ॥ १३४॥
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| verse_line1  = भीमोऽयमेष पुरुहूतसुतोऽन्य एते पार्था इति स्म हलिने हरिरभ्यवोचत् ।दृष्ट्वैव सोऽपि मुदमाप शिनेश्च पौत्रःखड्गं प्रगृह्य हर्षात् परिपुप्लुवेऽत्र ॥ १३५॥
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| verse_line1  = प्रीतेषु सर्वयदुषु प्रपलायितेषुदुर्योधनादिनृपतिष्वखिलेषु भीमात् ।कर्णोऽभ्ययाद्धरिहयात्मजमाशु मद्र-राजो जगाम पवनात्मजमेव वीरः ॥ १३६॥
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| verse_line1  = विप्रेषु दण्डपटदर्भमहाजिनानिकोपात् क्षिपत्सु न विनाशनमत्र भूयात् ।क्षत्रस्य वैरत इति द्रुपदे च कृष्णंविप्रांश्च याचति स मारुतिरार शल्यम् ॥ १३७॥
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| verse_line1  = वृक्षं त्वसौ प्रतिनिधाय च मद्रराजंदोर्भ्यां प्रगृह्य जवतो गगने निधाय ।बन्धुत्वतो भुवि शनैरदधात् स तस्यविज्ञाय वीर्यमगमन्निजराजधानीम् ॥ १३८॥
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| verse_line1  = पार्थोऽपि तेन धनुषा युयुधे स्म कर्णंसोऽप्यस्त्रबाहुबलमाविरमुत्र चक्रे ।तौ धन्विनामनुपमौ चिरमस्यतां चसूर्यात्मजोऽत्र वचनं व्यथितो बभाषे ॥ १३९॥
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| verse_line1  = त्वं फल्गुनो हरिहयो द्विजसत्तमो(सत्तपो) वामूर्तं(मर्त्यः) न मे प्रमुखतः स्थितिमन्य ईष्टे ।यो वाऽस्मि कोऽपि यदि ते क्षममद्य बाणान्मुञ्चान्यथैहि(यथेहि) रणतस्त्विति पार्थ आह ॥ १४०॥
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| verse_line1  = कृष्णस्तदाऽह नृपतिं प्रति देहि कन्यांसर्वेभ्य एव वृषवायुपुरन्दरा हि ।नासत्यदस्रसहिता इम एव इन्द्राःपूर्वे च सम्प्रतितनश्च(सम्प्रतितनाश्च) हरेर्हि पश्चात् ॥ १५४॥
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| verse_line1  = एषां श्रियश्च निखिला अपिचैकदेहाःपुत्री तवैव न ततोऽत्र विरुद्धता हि ।इत्युक्तवत्यपि यदा द्रुपदश्चकारसंवादिनीं न धियमेनमथाऽह कृष्णः ॥ १५५॥
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| verse_line1  = दिव्यं हि दर्शनमिदं तव दत्तमद्यपश्याऽशु पाण्डुतनयान् दिवि संस्थितांस्त्वम् ।एतां च ते दुहितरं सह तैः पृथक्स्थांतल्लक्षणैः सह ततः कुरु ते यथेष्टम् ॥ १५६॥
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| verse_line1  = इत्युक्तवाक्यमनु तान् स ददर्श राजाकृष्णप्रसादबलतो दिवि तादृशांश्च ।एतान् निशाम्य चरणौ जगदीशितुश्चभीतो जगाम शरणं तदनादरेण ॥ १५७॥
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| verse_line1  = दत्वाऽभयं स भगवान् द्रुपदस्य कार्येतेनोमिति स्म कथिते स्वयमेव सर्वाम् ।वैवाहिकीं कृतिमथ(विधिमथ) व्यदधाच्च धौम्य-युक्तः क्रमेण जगृहुर्निखिलाश्च पाणिम् ॥ १५८॥
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| verse_line1  = पाञ्चालकेषु च महोत्सव आस राजातुष्टोऽभवत् सह सुतैः स्वजनैश्च सर्वैः(सुतैश्च निजैश्च सर्वैः) ।पौरैश्च जानपदिकैश्च यथैव रामेदत्वा सुतां जनक आप मुदं ततोऽनु ॥ १५९॥
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| verse_line1  = उद्बाह्य तत्र निवसत्सु च पाण्डवेषुश्रुत्वैव रामसहितः सह यादवैश्च ।आदाय पारिबर्हं बहुलं स कृष्णआयान्मुदैव पृथया सहितांश्च पार्थान् ॥ १६०॥
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| verse_line1  = दृष्ट्वैव तं मुमुदुराशु कुरुप्रवीराआश्लिष्य कृष्णमथ नेमुरसौ च कृष्णाम् ।दृष्ट्वा प्रदाय गृहयोग्यसमस्तभाण्डंसौवर्णमेभ्य उरु भूषणमच्युतोऽदात् ॥ १६१॥
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| verse_line1  = देवाङ्गयोग्यशुभकुण्डलहारमौलि-केयूरवस्त्रसहितान्युरुभूषणानि ।षण्णां पृथक्पृथगदात् पृथगेव योग्या-न्यन्यद् ददावथ पितृष्वसुरात्मयोग्यम् ॥ १६२॥
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| verse_line1  = रत्नानि गोगजतुरङ्गरथान् सुवर्ण-भारान् बहूनपि ददावथ चाऽशिषोऽग्र्याः ।व्यासोऽप्यदादिह परत्र च(परत्र स) पार्षतोऽपिभूषारथाश्वगजरत्नसुकाञ्चनानि ॥ १६३॥
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| verse_line1  = दासीश्च दाससहिताः शुभरूपवेषाःसहस्रशो ददतुरत्र हरिर्नृपश्च ।तासां विचित्रवसनान्युरुरत्नमालाःप्रत्येकशो ददतुरप्युरुभूषणानाम् ॥ १६४॥
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| verse_line1  = मासान् बहूनिह विहृत्य सहैव पार्थैःकृष्णो ययौ यदुपुरीं सहितोऽग्रजेन ।अन्तर्हिते भगवति प्रततोरुशक्तौव्यासे च वत्सरमिहोषुरिमे तु पार्थाः ॥ १६५॥
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| verse_line1  = वैचित्रवीर्यतनयाः सह सौबलेनकर्णेन सिन्धुपतिना रथहस्तियौधैः ।भूरिश्रवः प्रभृतिभिश्च सहैव हन्तुंपाञ्चालराजमगुरेत्य पुरीं पुनस्ते ॥ १६६॥
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| verse_line1  = तैरर्दिते स्वपुर आशु स सोमकानांराजा सुतैः सह ससैनिक उद्गतोऽभूत् ।तेषां च तस्य च बभूव महान् विमर्दःपुत्रौ च तस्य निहतौ विधुताश्च सेनाः ॥ १६७॥
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| verse_line1  = चित्रे हते समर आशु सचित्रकेतौधावत्सु सैनिकवरेषु च पार्षतस्य ।पार्था रथैरभिययुर्धृतचापबाणावैचित्रवीर्यतनयान् रविसूनुयुक्तान् ॥ १६८॥
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| verse_line1  = तैस्तेषु पञ्चसु समं प्रतियोधयत्सुभूरिश्रवाः सरविजो विरथं चकार ।शक्रात्मजं तदनु पर्वतसन्निकाशंदोर्भ्यां तु मारुतिरुरुं तरुमुद्बबर्ह ॥ १६९॥
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| verse_line1  = आयान्तमीक्ष्य तरुहस्तमिमं समीर-सूनुं सुयोधनमुखा निखिलाः सकर्णाः ।भूरिश्रवाः शकुनिभूरिजयद्रथाश्चसर्वेऽपि दुद्रुवुरथो विविशुः पुरं स्वम् ॥ १७०॥
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| verse_line1  = ज्ञात्वा समस्तमपि तद् विदुरोऽग्रजं स्वंवर्द्धन्त एव तनया भवतो नरेन्द्र ।इत्याह सोऽपि मुदितः स्वसुतेन कृष्णाप्राप्तेति भूषणवराण्यदिशच्च वासः ॥ १७१॥
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| verse_line1  = पार्था इति स्म विदुरोऽवददाशु सोऽपिस्वाकारगूहनपरो यदि तर्ह्यतीव ।भद्रं मृता नहि पृथासहिताः स्म पार्थाःतेषां प्रवृत्तिमपि मे वद सर्वशस्त्वम् ॥ १७२॥
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| verse_line1  = इत्युक्त आह विदुरः स हिडिम्बवध्या-पूर्वां प्रवृत्तिमखिलामपि लक्ष्यवेधम्(लक्षवेधम्) ।उद्बाहमप्यथ नदीजमुखाश्च सर्वेतुष्टा बभूवुरपि वत्सरमूषुरेवम् ॥ १७३॥
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| verse_line1  = श्रुत्वाऽथ कृष्णमुपयातमुरु प्रदायरत्नं च पाण्डुतनयेषु गतं पुनश्च ।तातप्यमानहृदयास्तु सुयोधनाद्यामन्त्रं प्रचक्रुरथ कर्णमुखा युयुश्च ॥ १७४॥
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| verse_line1  = युद्धाय तेषु पुनरेव रथैः प्रयाते-ष्वाहाग्रजं स विदुरोऽपि नदीजमुख्यान् ।एते हि पापतमचेतस एत्य पार्थान्युद्धाय मृत्युमुपयान्ति न संशयोऽत्र ॥ १७५॥
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| verse_line1  = भीमार्जुनौ विषहितुं नहि कश्चनास्तिसामर्थ्ययुक् सुरवरेष्वपि वर्द्धितास्ते ।ज्ञात्वैव वत्सरत एव महानधर्मःतेषामुपेक्षणकृतस्तदलं नियुङ्क्ष्व ॥ १७६॥
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| verse_line1  = आनीतये च विनियुज्य सुसान्त्वपूर्वम्आनीय योजय नृपेषु(नृपैषु) तथाऽर्द्धराज्यम् ।एवं कृते(कृतं) तव भवेत् कुलवृद्धये हिधर्माय चोभयविनाशकरोऽन्यथा स्याः ॥ १७७॥
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| verse_line1  = इत्युक्तवत्यनु तथेत्यवदन्नदीजोद्रोणः कृपश्च विदुरं स नृपोऽप्युवाच ।याह्यानयेति स च वेगवता रथेनतत्रागमत् तदनु तैरभिपूजितश्च ॥ १७८॥
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| verse_line1  = तत्काल एव वसुदेवसुतश्च कृष्णोव्यासश्च तानुपसमेत्य दुरन्तशक्ती ।आदाय कुन्तिसहितान् विदुरेण युक्तौनागाह्वयं पुरमितां सह भार्ययैव ॥ १७९॥
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| verse_line1  = तेष्वागतेषु सुमहानभवत् प्रहर्षःपौरस्य जानपदिकस्य जनस्य चोच्चैः ।भीष्मादिकाश्च मुदिताः प्रतिपूज्य गेहम्आवेशयन् सह नृपेण महोत्सवेन ॥ १८०॥
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| verse_line1  = कृष्णामपूजयदतीव च सौबली सादुर्योधनस्य दयितासहिताऽत्र तेऽपि ।ऊषुस्ततश्च निजपुत्रकदुर्विनीत्याकृष्णानिमित्तमुरुभीतित आह भीमात् ॥ १८१॥
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| verse_line1  = कुन्ति प्रयाहि सहिता स्नुषया गृहं स्वंभीमाद् बिभेमि निजपुत्रकदुर्विनीत्या ।कृष्णा त्रिलोकवनिताधिकरूपसारायस्मादिति स्म ससुता प्रययौ गृहं सा ॥ १८२॥
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| verse_line1  = ऊषुस्तथैव परिवत्सरपञ्चकं तेपाण्डोर्गृहे सुसुखिनोऽखिलभोगयुक्ताः ।कृष्णा च तेषु पृथगेव चतुःस्वरूपारेमे तथैकतनुरप्यभिमानिभेदात् ॥ १८३॥
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| verse_line1  = कन्यैव साऽभवदतः प्रतिवासरं चजन्माभवद्ध्यभिमतेः पृथगेव नाशात् ।प्रायो हि नाभिमतिनाशमवाप वाणीतस्मान्मरुच्च सकलेष्वभिविष्ट(सकलेष्वनुविष्ट) आसीत् ॥ १८४॥
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| verse_line1  = धर्मात्मजादिषु मरुत् प्रतिविष्ट एषांबुद्धिं विमोह्य(विपोह्य) रमते सततं तया यत् ।शुद्धैव सा हि तत एव दिनेदिने चसम्मोहतो मरणवद् भवतीह कन्या ॥ १८५॥
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| verse_line1  = नो सुप्तिवत्(सुप्तवत्) त्विदमतोऽन्यवशत्वतो हिदेहस्य संस्मृतित एव हरेर्न मोहः ।नाऽवेशवच्च तत एव मृतेः स्वरूपम्एतत् त्वतः प्रतिदिनं जननाद्धि कन्या ॥ १८६॥
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| verse_line1  = एवं स वायुरनुविष्टयुधिष्ठिरादि-भीमात्मनैव रमते सततं तयैकः ।अन्यादृशा(अन्यादृशी) हि सुरभुक्तिरतोऽन्यरूपामानुष्यभुक्तिरिति नात्र विचार्यमस्ति ॥ १८७॥
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| verse_line1  = वासिष्ठयादववृषावपि केशवौ तौतत्रोषतुः परमसौहृदतो हि तेषु ।ताभ्यामनन्तगुणपूर्णसुखात्मकाभ्यांपार्थाश्च ते मुमुदिरे युतसत्कथाभिः(अयुतसत्कथाभिः) ॥ १८८॥
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| verse_line1  = पूर्वं हि तेषु वनगेषु बभूव काशि-राज्ञः सुताकृत उरुक्षितिपालयोगः ।तत्र स्वयम्बरगतां धृतराष्ट्रपुत्रःकन्यां बलाज्जगृह आत्मबलातिदृप्तः ॥ १८९॥
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| verse_line1  = पूर्वं हि राजगणने मगधाधिराजःसङ्ख्यात इत्यतिरुषा प्रगृहीतकन्ये ।दुर्योधने नृपतयो युयुधुः स्म तेनभग्नाश्च कर्णसहितेन सहानुजेन ॥ १९०॥
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| verse_line1  = भग्नेषु तेषु पुनरात्तशरासनेषुकर्णो जगाद धृतराष्ट्रसुतं प्रयाहि ।युक्तः सहोदरजनैर्गुरुभीष्ममुख्यैःयुक्तस्य ते न पुरमेत्य हि घर्षणेशाः ॥ १९१॥
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| verse_line1  = दुर्योधनेऽनुजजनैः सह तैर्गृहीतेभीष्माम्बिकेयविदुराग्रजवाक्यनुन्नः ।भीमो विजित्य नृपतीन् सजरासुतांस्तान्हत्वा सुवज्रममुचद् धृतराष्ट्रपुत्रान् ॥ २०६॥
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| verse_line1  = तेऽपि स्म कर्णसहिता मृतकप्रतीकानागाह्वयं पुरमथाऽययुरप्यमीषाम् ।दृष्ट्वा विरोधमवदन्नृपतिश्च धर्म-पुत्रं पुरन्दरकृतस्थलमाशु याहि ॥ २०७॥
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| verse_line1  = तत्रार्द्धराज्यमनुभुङ्क्ष्व सहानुजैस्त्वंकोशार्द्धमेव च गृहाण पुरा हि शक्रः ।तत्राभिषिक्त उत कञ्जभवादिदेवैःतत्रस्थ एव स चकार चिरं च राज्यम् ॥ २०८॥
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| verse_line1  = त्वं वीर शक्रसम एव ततस्तवैवयोग्यं पुरं तदत आश्वभिषेचयामि ।इत्युक्त आह स युधिष्ठिर ओमिति स्मचक्रेऽभिषेकमपि तस्य स आम्बिकेयः ॥ २०९॥
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| verse_line1  = तस्याभिषेकमकरोत् प्रथमं हि कृष्णोवासिष्ठनन्दन उरुर्भव चक्रवर्ती ।यष्टाऽश्वमेधनिखिलात्मकराजसूय-पूर्वैर्मखैः सततमेव च धर्मशीलः ॥ २१०॥
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| verse_line1  = इत्येव पार्षतसुतासहितेऽभिषिक्तेकृष्णोऽपि वृष्णिवृषभः स तथाऽभ्यषिञ्चत् ।एवं च मारुतिशिरस्यभिषेकमेतौसञ्चक्रतुः स्म युवराजपदे सभार्यम् ॥ २११॥
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| verse_line1  = भीमे च पार्षतसुतासहितेऽभिषिक्तेताभ्यामनन्तसुखशक्तिचिदात्मकाभ्याम् ।अन्यैश्च विप्रवृषभैः सुकृतेऽभिषेके(सुकृताभिषेके)धर्मात्मजानु मुमुदुर्निखिलाश्च सन्तः ॥ २१२॥
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| verse_line1  = तस्मिन् महोत्सववरे दिनसप्तकानु-वृत्ते वसिष्ठवृषभेण च वृष्णिपेन ।कृष्णेन ते युयुरमा पृथया तया चपाञ्चालराजसुतया स्थलमिन्द्रवासम् ॥ २१३॥
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| verse_line1  = कोशस्य चार्द्धसहितास्तु यदैव पार्थागच्छन्ति ताननुययुर्निखिलाश्च पौराः ।ऊचुश्च हा बत सुयोधन एष पापोदूरे चकार ननु पाण्डुसुतान् गुणाढ्यान् ॥ २१४॥
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| verse_line1  = भीमप्रतापमवलम्ब्य कलिङ्गबन्धान्मुक्तः सुतामपि हि तस्य पुरं निनाय ।द्वेष्ट्येवमप्यतिबलान् हि सदैव पार्थान्यामो वयं गुणिभिरद्य सहैव पार्थैः ॥ २१५॥
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| verse_line1  = आज्ञापयत्यपि स भेरिरवेण पार्थान्नैवानुगच्छत यदि व्रजथानु वोऽद्य ।वित्तं हरिष्य इह सर्वमपीति तच्चपापः करोतु न वयं विजहाम पार्थान् ॥ २१६॥
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| verse_line1  = सद्भिर्हि सङ्गतिरिहैव सुखस्य हेतुः(सुखैकहेतुः)मोक्षैकहेतुरथ(मोक्षैकहेतुरुत) तद्विपरीतमन्यत् ।तस्माद् व्रजेम सह पाण्डुसुतैर्हि शक्र-प्रस्थं त्विति स्म धृतचेतस आह धार्मः(धर्मः) ॥ २१७॥
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| verse_line1  = प्रीतिर्यदि स्म भवतां मयि सानुजेऽस्तितिष्ठध्वमत्र पितुरेव हि शासने मे ।कीर्तिर्हि वोऽनुगमनात् पितुरत्ययेननश्येन्न इत्यनुसरध्वमिहाऽम्बिकेयम् ॥ २१८॥
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| verse_line1  = इत्येव तैः पुरजना निखिलैर्निषिद्धाःकृच्छ्रेण तस्थुरपि तान् मनसाऽन्वगच्छन् ।प्राप्याथ शक्रपुरमस्मरतां च कृष्णौदेवेशवर्धकिमथाऽगमदत्र सोऽपि ॥ २१९॥
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| verse_line1  = वासिष्ठपेन यदुपेन च पाण्डवानांरत्नोत्करं कुरु पुरं पुरुहूतपुर्याः ।सादृश्यतस्त्विति नियुक्त उभौ प्रणम्यसर्वेश्वरौ स कृतवांश्च पुरं तथैव ॥ २२०॥
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| verse_line1  = देशं च नातिजनसंवृतमन्यदेश-संस्थैर्जनैरभिपुपूरिर आशु पार्थाः ।तेषां गुणैर्हरिपदानतिहेतुतश्चराष्ट्रान्तरा इह शुभा वसतीः स्म चक्रुः ॥ २२१॥
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| verse_line1  = प्रस्थाप्य दूरमनुजस्य सुतान् स राजाचक्रेऽभिषेकमपि तत्र सुयोधनस्य ।दुःशासनं च युवराजमसौ विधायमेने कृतार्थमिव च स्वमशान्तकामः ॥ २२२॥
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| verse_line1  = पार्थाश्च ते मुमुदुरत्र वसिष्ठवृष्णि-वर्योदितानखिलतत्त्वविनिर्णयांस्तु ।शृण्वन्त एव हि सदा पृथिवीं च धर्माद्भुञ्जन्त आश्रितरमापतिपादयुग्माः ॥ २२३॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये पाण्डवराज्यलाभो नाम एकोनविंशोऽध्यायः}
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[[Category:Mahabharatatatparyanirnaya]]

Latest revision as of 06:47, 13 April 2026