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| | #REDIRECT [[Mahabharatatatparyanirnaya#MBTN_C06_S01]] |
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| | title = सर्वशास्त्रतात्पर्यनिर्णयः
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| | verse_line1 = औं ॥ उत्थाप्य चैनमरविन्ददलायताक्षश्चक्राङ्कितेन वरदेन कराम्बुजेन ।कृत्वा च संविदमनेन नुतोऽस्य चांसं प्रीत्याऽऽरुरोह स हसन् सह लक्ष्मणेन ॥ १॥
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| | verse_line1 = आरोप्य चांसयुगळं भगवन्तमेनं तस्यानुजं च हनुमान् प्रययौ कपीन्द्रम् ।सख्यं चकार हुतभुक्प्रमुखे च तस्य रामेण शाश्वतनिजार्तिहरेण शीघ्रम् ॥ २॥
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| | verse_line1 = श्रुत्वाऽस्य दुःखमथ देववरः प्रतिज्ञां चक्रे स वालिनिधनाय हरीश्वरोऽपि ।सीतानुमार्गणकृतेऽथ स वालिनैव क्षिप्तां हि दुन्दुभितनुं समदर्शयच्च ॥ ३॥
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| | verse_line1 = वीक्ष्यैव तां निपतितामथ रामदेवः सोऽङ्गुष्ठमात्रचलनादतिलीलयैव ।सम्प्रास्य योजनशतेऽथ तयैव चोर्वीं सर्वान् विदार्य दितिजानहनद्रसास्थान् ॥ ४॥
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| | verse_line1 = शर्वप्रसादजबलाद्दितिजानवध्यान् सर्वान् निहत्य कुणपेन पुनश्च सख्या ।भीतेन वालिबलतः कथितः स्म सप्तसालान् प्रदर्श्य दितिजान् सुदृढांश्च वज्रात् ॥ ५॥
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| | verse_line1 = एकैकमेषु स विकम्पयितुं समर्थः पत्राणि लोप्तुमपि तूत्सहते न शक्तः ।विष्वक्स्थितान् यदि भवान् प्रतिभेत्स्यतीमानेकेषुणा तर्हि वालिवधे समर्थः ॥ ६॥
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| | verse_line1 = जेतुं चतुर्गुणबलो हि पुमान् प्रभुः स्याद्धन्तुं शताधिकबलोऽतिबलं सुशक्तः ।तस्मादिमान् हरिहयात्मजबाह्वलोप्यपत्रान् विभिद्य मम संशयमाशु भिन्धि ॥ ७॥
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| | verse_line1 = श्रुत्वाऽस्य वाक्यमवमृश्य दितेः सुतांस्तान् धातुर्वरादखिलपुम्भिरभेद्यरूपान् ।ब्रह्मत्वमाप्तुमचलं तपसि प्रवृत्तानेकेषुणा सपदि तान् प्रबिभेद रामः ॥ ८॥
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| | verse_line1 = सन्धाय कार्मुकवरे निशिते तु बाणेऽथाऽकृष्य दक्षिणभुजेन तदा प्रमुक्ते ।रामेण सत्वरमनन्तबलेन सर्वे चूर्णीकृताः सपदि ते तरवो रवेण ॥ ९॥
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| | verse_line1 = भित्त्वा च तान् सगिरिकुं भगवत्प्रमुक्तः पातालसप्तकमथात्र च ये त्ववध्याः ।नाम्नाऽसुराः कुमुदिनोऽब्जजवाक्यरक्षाः सर्वांश्च तानदहदाशु शरः स एकः ॥ १०॥
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| | verse_line1 = नैतद्विचित्रममितोरुबलस्य विष्णोर्यत्प्रेरणात् सपवनस्य भवेत् प्रवृत्तिः ।लोकस्य सप्रकृतिकस्य सरुद्रकालकर्मादिकस्य तदपीदमनन्यसाध्यम् ॥ ११॥
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| | verse_line1 = दृष्ट्वा बलं भगवतोऽथ हरीश्वरोऽसावग्रे निधाय तमयात् पुरमग्रजस्य ।आश्रुत्य रावमनुजस्य बिलात् स चाऽगादभ्येनमाशु दयिताप्रतिवारितोऽपि ॥ १२॥
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| | verse_line1 = तन्मुष्टिभिः प्रतिहतः प्रययावशक्तः सुग्रीव आशु रघुपोऽपि हि धर्ममीक्षन् ।नैनं जघान विदिताखिललोकचेष्टोऽप्येनं स आह युधि वां न मया विविक्तौ ॥ १३॥
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| | verse_line1 = सौभ्रात्रमेष यदि वाञ्छति वालिनैव नाहं निरागसमथाग्रजनिं हनिष्ये ।दीर्घः सहोदरगतो न भवेद्धि कोपो दीर्घोऽपि कारणमृते विनिवर्तते च ॥ १४॥
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| | verse_line1 = कोपः सहोदरजने पुनरन्तकाले प्रायो निवृत्तिमुपगच्छति तापकश्च ।एकस्य भङ्ग इति नैव झटित्यपास्तदोषो निहन्तुमिह योग्य इति स्म मेने ॥ १५॥
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| | verse_line1 = तस्मान्न बन्धुजनगे जनिते विरोधे कार्यो वधस्तदनुबन्धिभिराश्वितीह ।धर्मं प्रदर्शयितुमेव रवेः सुतस्य भावी न ताप इति विच्च न तं जघान ॥ १६॥
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| | verse_line1 = यः प्रेरकः सकलशेमुषिसन्ततेश्च तस्याज्ञता कुत इहेशवरस्य विष्णोः ।तेनोदितोऽथ सुदृढं पुनरागतेन वज्रोपमं शरममूमुचदिन्द्रसूनौ ॥ १७॥
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| | verse_line1 = रामाज्ञयैव लतया रविजे विभक्ते वायोः सुतेन रघुपेण शरे च मुक्ते ।श्रुत्वाऽस्य शब्दमतुलं हृदि तेन विद्ध इन्द्रात्मजो गिरिरिवापतदाशु सन्नः ॥ १८॥
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| | verse_line1 = भक्तो ममैष यदि मामभिपश्यतीह पादौ ध्रुवं मम समेष्यति निर्विचारः ।योग्यो वधो नहि जनस्य पदानतस्य राज्यार्थिना रविसुतेन वधोऽर्थितश्च ॥ १९॥
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| | verse_line1 = कार्यं ह्यभीष्टमपि तत् प्रणतस्य पूर्वं शस्तो वधो न पदयोः प्रणतस्य चैव ।तस्माददृश्यतनुरेव निहन्मि शक्रपुत्रं त्वितिस्म तमदृष्टतया जघान ॥ २०॥
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| | verse_line1 = यः प्रेरकः सकललोकबलस्य नित्यं पूर्णाव्ययोच्चबलवीर्यतनुः स्वतन्त्रः ।किं तस्य दृष्टिपथगस्य च वानरोऽयं कर्तैशचापमपि येन पुरा प्रभग्नम् ॥ २१॥
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| | verse_line1 = सन्नेऽथ वालिनि जगाम च तस्य पार्श्वं प्राहैनमार्द्रवचसा यदि वाञ्छसि त्वम् ।उज्जीवयिष्य इति नैच्छदसौ त्वदग्रे को नाम नेच्छति मृतिं पुरुषोत्तमेति ॥ २२॥
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| | verse_line1 = कार्याणि तस्य चरमाणि विधाय पुत्रं त्वग्रे निधाय रविजः कपिराज्य आसीत् ।रामोऽपि तद्गिरिवरे चतुरोऽथ मासान् दृष्ट्वा घनागममुवास सलक्ष्मणोऽसौ ॥ २३॥
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| | verse_line1 = अथातिसक्ते क्षितिपे कपीनां प्रविस्मृते रामकृतोपकारे ।प्रसह्य तं बुद्धिमतां वरिष्ठो रामाङ्घ्रिभक्तो हनुमानुवाच ॥ २४॥
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| | verse_line1 = न विस्मृतिस्ते रघुवर्यकार्ये कार्या कथञ्चित् स हि नोऽभिपूज्यः ।न चेत् स्वयं कर्तुमभीष्टमद्य ते ध्रुवं बलेनापि हि कारयामि ॥ २५॥
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| | verse_line1 = स एवमुक्त्वा हरिराजसन्निधौ द्वीपेषु सप्तस्वपि वानरान् प्रति ।सम्मेलनायाऽशुगतीन् स्म वानरान् प्रस्थापयामास समस्तशः प्रभुः ॥ २६॥
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| | verse_line1 = हरीश्वराज्ञाप्रणिधानपूर्वकं हनूमता ते प्रहिता हि वानराः ।समस्तशैलद्रुमषण्डसंस्थितान् हरीन् समादाय तदाऽभिजग्मुः ॥ २७॥
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| | verse_line1 = तदैव रामोऽपि हि भोगसक्तं प्रमत्तमालक्ष्य कपीश्वरं प्रभुः ।जगाद सौमित्रिमिदं वचो मे प्लवङ्गमेशाय वदाऽशु याहि ॥ २८॥
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| | verse_line1 = यदि प्रमत्तोऽसि मदीयकार्ये नयाम्यहं त्वेन्द्रसुतस्य मार्गम् ।प्रायः स्वकार्ये प्रतिपादिते हि मदोद्धता न प्रतिकर्तुमीशते ॥ २९॥
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| | verse_line1 = इतीड्यरामेण समीरिते तदा ययौ सबाणः सधनुः स लक्ष्मणः ।दृष्ट्वैव तं तेन सहैव तापनिर्भयाद्ययौ रामपदान्तिकं त्वरन् ॥ ३०॥
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| | verse_line1 = हनूमतः साधुवचोभिराशु प्रसन्नचेतस्यधिपे कपीनाम् ।समागते सर्वहरिप्रवीरैः सहैव तं वीक्ष्य ननन्द राघवः ॥ ३१॥
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| | verse_line1 = समस्तदिक्षु प्रतियापिता हि ते हरीश्वराज्ञामुपधार्य मासतः ।समाययुस्तेऽङ्गदजाम्बवन्मुखाः सुतेन वायोः सहिता न चाययुः ॥ ३५॥
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| | verse_line1 = समस्तदुर्गप्रवरं दुरासदं विमार्गतां विन्ध्यगिरिं महात्मनाम् ।गतः स कालो हरिराडुदीरितः समासदंश्चाथ बिलं महाद्भुतम् ॥ ३६॥
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| | verse_line1 = दुरासदोऽसावतिचण्डशासनो हनिष्यति त्वामपि किं मदादिकान् ।अगम्यमेतद् बिलमाप्य तत् सुखं वसाम सर्वे किमसाविहाऽऽचरेत् ॥ ३८॥
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| | verse_line1 = इतीरितं तत् पवनात्मजस्य श्रुत्वाऽतिभीता धृतमूकभावाः ।सर्वेऽनुजग्मुस्तमथाद्रिमुख्यं महेन्द्रमासेदुरगाधबोधाः ॥ ४६॥
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| | verse_line1 = निरीक्ष्य ते सागरमप्रधृष्यमपारमेयं सहसा विषण्णाः ।दृढं निराशाश्च मतिं हि दध्रुः प्रायोपवेशाय तथा च चक्रुः ॥ ४७॥
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| | verse_line1 = प्रायोपविष्टाश्च कथा वदन्तो रामस्य संसारविमुक्तिदातुः ।जटायुषः पातनमूचिरे तत्सम्पातिनाम्नः श्रवणं जगाम ॥ ४८॥
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| | verse_line1 = तस्याग्रजोऽसावरुणस्य सूनुः सूर्यस्य बिम्बं सह तेन यातः ।जवं परीक्षन्नथ तं सुतप्तं गुप्त्वा पतत्रक्षयमाप्य चापतत् ॥ ४९॥
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| | verse_line1 = अपूरिते तैः सकलैः शतस्य गमागमे शत्रुबलं च वीक्ष्य ।सुदुर्गमत्वं च निशाचरेशपुर्याः स धातुः सुत आबभाषे ॥ ५६॥
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| | verse_line1 = अयं हि गृध्रः शतयोजनं गिरिं त्रिकूटमाहेत उतात्र विघ्नाः ।भवेयुरन्येऽपि ततो हनूमानेकः समर्थो न परोऽस्ति कश्चित् ॥ ५७॥
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| | verse_line1 = उक्त्वा स इत्थं पुनराह सूनुं प्राणस्य निःसीमबलं प्रशंसयन् ।त्वमेक एवात्र परं समर्थः कुरुष्व चैतत् परिपाहि वानरान् ॥ ५८॥
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| | verse_line1 = इतीरितोऽसौ हनुमान् निजेप्सितं तेषामशक्तिं प्रकटां विधाय ।अवर्धताऽऽशु प्रविचिन्त्य रामं सुपूर्णशक्तिं चरितोस्तदाज्ञाम् ॥ ५९॥
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| {इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये श्रीरामचरिते समुद्रतरणनिश्चयो नाम षष्ठोऽध्यायः}
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