Jump to content

Mahabharatatatparyanirnaya/C5/S1: Difference between revisions

From Grantha
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
 
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Tag: New redirect
 
(One intermediate revision by the same user not shown)
Line 1: Line 1:
__TOC__
#REDIRECT [[Mahabharatatatparyanirnaya#MBTN_C05_S01]]
<div class="gr-page-nav">[[Mahabharatatatparyanirnaya|श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णयः]] · [[Mahabharatatatparyanirnaya/Toc|अनुक्रमणिका]]</div>
{{Adhyaya
| document_id  = MBTN
| chapter_num  = 5
| title        = सर्वशास्त्रतात्पर्यनिर्णयः
}}{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V01
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = औं ॥ इत्थं विश्वेश्वरेऽस्मिन्नखिलजगदवस्थाप्य सीतासहाये भूमिष्ठे सर्वलोकास्तुतुषुरनुदिनं वृद्धभक्त्यानितान्तम् ।राजा राज्याभिषेके प्रकृतिजनवचो मानयन्नात्मनोऽर्थ्यं दध्रे तन्मन्थरायाः श्रुतिपथमगमद् भूमिगाया अलक्ष्म्याः ॥ १॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V02
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = पूर्वं क्षीराब्धिजाता कथमपि तपसैवाप्सरस्त्वं प्रयाता तां नेतुं तत्तमोऽन्धं कमलजनिरुवाचाऽऽशु रामाभिषेकम् ।भूत्वा दासी विलुम्प स्वगतिमपि ततः कर्मणा प्राप्स्यसे त्वं सेत्युक्ता मन्थराऽऽसीत् तदनु कृतवत्येव चैतत् कुकर्म ॥ २॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V03
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = तद्वाक्यात् कैकयी सा पतिगवरबलादाजहारैव राज्यं रामस्तद्गौरवेण त्रिदशमुनिकृतेऽरण्यमेवाऽविवेश ।सीतायुक्तोऽनुजेन प्रतिदिनसुविवृद्धोरुभक्त्या समेतः संस्थाप्याशेषजन्तून् स्वविरहजशुचा त्यक्तसर्वेषणार्थान् ॥ ३॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V04
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = वृक्षान् पक्षीभकीटान् पितरमथ सखीन् मातृपूर्वान् विसृज्य प्रोत्थां गङ्गांस्वपादाद्धर इव गुहेनार्चितः सोऽथ तीर्त्वा ।देवार्च्यस्यापि पुत्रादृषिगणसहितात् प्राप्य पूजां प्रयातः शैलेशं चित्रकूटं कतिपयदिवसान्यत्र मोदन्नुवास ॥ ४॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V05
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = एतस्मिन्नेव काले दशरथनृपतिः स्वर्गतोऽभूद्वियोगाद् रामस्यैवाथ पुत्रौ विधिसुतसहितैर्मन्त्रिभिः केकयेभ्यः ।आनीतौ तस्य कृत्वा श्रुतिगणविहितप्रेतकार्याणि सद्यः शोचन्तौ राममार्गं पुरजनसहितौ जग्मतुर्मातृभिश्च ॥ ५॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V06
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = धिक्कुर्वन्तौ नितान्तं सकलदुरितगां मन्थरां कैकयीं च प्राप्तौ रामस्य पादौ मुनिगणसहितौ तत्र चोवाच नत्वा ।रामं राजीवनेत्रं भरत इह पुनः प्रीतयेऽस्माकमीश प्राप्याऽऽशु स्वामयोध्यामवरजसहितः पालयेमां धरित्रीम् ॥ ६॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V07
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = इत्युक्तः कर्तुमीशः सकलसुरगणाप्यायनं रामदेवः सत्यां कर्तुं च वाणीमवददतितरां नेति सद्भक्तिनम्रम् ।भूयोभूयोऽर्थयन्तं द्विगुणितशरदां सप्तके त्वभ्यतीते कर्तैतत्ते वचोऽहं सुदृढमृतमिदं मे वचो नात्र शङ्का ॥ ७॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V08
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = श्रुत्वैतद्रामवाक्यं हुतभुजि पतने स प्रतिज्ञां च कृत्वा रामोक्तस्यान्यथात्वे न तु परमभिवेक्ष्येऽहमित्येव तावत् ।कृत्वाऽन्यां स प्रतिज्ञामवसदथ बहिर्ग्रामके नन्दिनाम्नि श्रीशस्यैवास्य कृत्वा शिरसि परमकं पौरटं पादपीठम् ॥ ८॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V09
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = समस्तपौरानुगतेऽनुजे गते स चित्रकूटे भगवानुवास ह ।अथाऽजगामेन्द्रसुतोऽपि वायसो महासुरेणाऽत्मगतेन चोदितः ॥ ९॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V10
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = स चासुरावेशवशाद्रमास्तने यदा व्यधात्तुण्डमथाभिवीक्षितः ।जनार्दनेनाऽऽशु तृणे प्रयोजिते चचार तेन ज्वलताऽनुयातः ॥ १०॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V11
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = स्वयम्भुशर्वेन्द्रमुखान्सुरेश्वरान् जिजीविषुस्ताञ्छरणं गतोऽपि ।बहिष्कृतस्तैर्हरिभक्तिभावतो ह्यलङ्घ्यशक्त्या परमस्य चाक्षमैः ॥ ११॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V12
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = पुनः प्रयातः शरणं रघूत्तमं विसर्जितस्तेन निहत्य चासुरम् ।तदक्षिगं साक्षिकमप्यवध्यं प्रसादतश्चन्द्रविभूषणस्य ॥ १२॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V13
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = स वायसानामसुरोऽखिलानां वरादुमेशस्य बभूव चाक्षिगः ।निपातितोऽसौ सह वायसाक्षिभिस्तृणेन रामस्य बभूव भस्मसात् ॥ १३॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V14
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = ददुर्हि तस्मै विवरं बलार्थिनो यद्वायसास्तेन तदक्षिपातनम् ।कृतं रमेशेन तदेकनेत्रा बभूवुरन्येऽपि तु वायसास्तदा ॥ १४॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V15
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = भविष्यतामप्यथ यावदेव द्विनेत्रता काककुलोद्भवानाम् ।तावत्तदक्ष्यस्य कुरङ्गनाम्नः शिवेन दत्तं दितिजस्य चाक्षयम् ॥ १५॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V16
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = अतः पुनर्भावममुष्य हिन्वन् भविष्यतश्चैकदृशश्चकार ।स वायसान् राघव आदिपूरुषस्ततो ययौ शक्रसुतस्तदाज्ञया ॥ १६॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V17
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = रामोऽथ दण्डकवनं मुनिवर्यनीतो लोकाननेकश उदारबलैर्निरस्तान् ।श्रुत्वा खरप्रभृतिभिर्वरतो हरस्य सर्वैरवध्यतनुभिः प्रययौ सभार्यः ॥ १७॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V18
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = आसीच्च तत्र शरभङ्ग इति स्म जीर्णो लोकं हरेर्जिगमिषुर्मुनिरुग्रतेजाः ।तेनाऽदरोपहृतसार्ध्यसपर्यया स प्रीतो ददौ निजपदं परमं रमेशः ॥ १८॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V19
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = धर्मो यतोऽस्य वनगस्य नितान्तशक्तिह्रासे स्वधर्मकरणस्य हुताशनादौ ।देहात्ययः स तत एव तनुं निजाग्नौ सन्त्यज्य रामपुरतः प्रययौ परेशम् ॥ १९॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V20
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = रामोऽपि तत्र ददृशे धनदस्य शापाद् गन्धर्वमुर्वशिरतेरथ यातुधानीम् ।प्राप्तं दशां सपदि तुम्बुरुनामधेयं नाम्ना विराधमपि शर्ववरादवध्यम् ॥ २०॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V21
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = भङ्क्त्वाऽस्य बाहुयुगलं बिलगं चकार सम्मानयन् वचनमम्बुजजन्मनोऽसौ ।प्रादाच्च तस्य सुगतिं निजगायकस्य भक्षार्थमंसकमितोऽपि सहानुजेन ॥ २१॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V22
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = प्रीतिं विधित्सुरगमद्भवनं निजस्य कुम्भोद्भवस्य परमादरतोऽमुना च ।सम्पूजितो धनुरनेन गृहीतमिन्द्राच्छार्ङ्गं तदादिपुरुषो निजमाजहार ॥ २२॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V23
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = आत्मार्थमेव हि पुरा हरिणा प्रदत्तमिन्द्रे तदिन्द्र उत रामकरार्थमेव ।प्रादादगस्त्यमुनये तदवाप्य रामो रक्षन् ऋषीनवसदेव स दण्डकेषु ॥ २३॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V24
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = काले तदैव खरदूषणयोर्बलेन रक्षःस्वसा पतिनिमार्गणतत्पराऽऽसीत् ।व्यापादिते निजपतौ हि दशाननेन प्रामादिकेन विधिनाऽभिससार रामम् ॥ २४॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V25
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = साऽनुज्ञयैव रजनीचरभर्तुरुग्रा भ्रातृद्वयेन सहिता वनमावसन्ती ।रामं समेत्य भव मे पतिरित्यवोचद्भानुं यथा तम उपेत्य सुयोगकामम् ॥ २५॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V26
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = तां तत्र हास्यकथया जनकासुताग्रे गच्छानुजं म इह मेति वचः स उक्त्वा ।तेनैव दुष्टचरितां हि विकर्णनासां चक्रे समस्तरजनीचरनाशहेतोः ॥ २६॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V27
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = तत्प्रेरितान् सपदि भीमबलान् प्रयातांस्तस्याः खरत्रिशिरदूषणमुख्यबन्धून् ।जघ्ने चतुर्दशसहस्रमवारणीयकोदण्डपाणिरखिलस्य सुखं विधातुम् ॥ २७॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V28
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = दत्तेऽभये रघुवरेण महामुनीनां दत्ते भये च रजनीचरमण्डलस्य ।रक्षःपतिः स्वसृमुखादविकम्पनाच्च श्रुत्वा बलं रघुपतेः परमाप चिन्ताम् ॥ २८॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V29
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = श्रुत्वाऽऽशु कार्यमवमृश्य जगाम तीरे क्षेत्रं नदीनदपतेः श्रवणं धरित्र्याः ।मारीचमत्र तपसि प्रतिवर्तमानं भीतं शराद्रघुपतेर्नितरां ददर्श ॥ २९॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V30
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = तेनार्थितः सपदि राघववञ्चनार्थे मारीच आह शरवेगममुष्य जानन् ।शक्यो न ते रघुवरेण हि विग्रहोऽत्र जानामि संस्पर्शमस्य शरस्य पूर्वम् ॥ ३०॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V31
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = इत्युक्तवन्तमथ रावण आह खड्गं निष्कृष्य हन्मि यदि मे न करोषि वाक्यम् ।तच्छुश्रुवान् भययुतोऽथ निसर्गतश्च पापो जगाम रघुवर्यसकाशमाशु ॥ ३१॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V32
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = सम्प्राप्य हैममृगतां बहुरत्नचित्रः सीतासमीप उरुधा विचचार शीघ्रम् ।निर्दोषनित्यवरसंविदपि स्म देवी रक्षोवधाय जनमोहकृते तथाऽऽह ॥ ३२॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V33
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = देवेममाशु परिगृह्य च देहि मे त्वं क्रीडामृगं त्विति तयोदित एव रामः ।अन्वक् ससार ह शरासनबाणपाणिर्मायामृगं निशिचरं निजघान जानन् ॥ ३३॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V34
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = तेनाऽहतः शरवरेण भृशं ममार विक्रुश्य लक्ष्मणमुरुव्यथया स पापः ।श्रुत्वैव लक्ष्मणमचूचुददुग्रवाक्यैः सोऽप्याप रामपथमेव सचापबाणः ॥ ३४॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V35
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = यां यां परेश उरुधैव करोति लीलां तां तां करोत्यनु तथैव रमापि देवी ।नैतावताऽस्य परमस्य तथा रमाया दोषोऽणुरप्यनुविचिन्त्य उरुप्रभू यत् ॥ ३५॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V36
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = क्‍वाज्ञानमापदपि मन्दकटाक्षमात्रात् सर्गस्थितिप्रलयसंसृतिमोक्षहेतोः ।देव्या हरेः किमु विडम्बनमात्रमेतद् विक्रीडतोः सुरनरादिदेव तस्मात् ॥ ३६॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V37
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = देव्याः समीपमथ रावण आससाद साऽदृश्यतामगमदप्यविषह्यशक्तिः ।सृष्ट्वाऽऽत्मनः प्रतिकृतिं प्रययौ च शीघ्रं कैलासमर्चितपदा न्यवसच्छिवाभ्याम् ॥ ३७॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V38
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = तस्यास्तु तां प्रतिकृतिं प्रविवेश शक्रो देव्याश्च सन्निधियुतां व्यवहारसिद्ध्यै ।आदाय तामथ ययौ रजनीचरेन्द्रो हत्वा जटायुषमुरुश्रमतो निरुद्धः ॥ ३८॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V39
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = मार्गे व्रजन्तमभियाय ततो हनूमान् संवारितो रविसुतेन च जानमानः ।दैवं तु कार्यमथ कीर्तिमभीप्समानो रामस्य नैनमहनद्वचनाद्धरेश्व ॥ ३९॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V40
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = प्राप्यैव राक्षस उताऽऽत्मपुरीं स तत्र सीताकृतिं प्रतिनिधाय ररक्ष चाथ ।रामोऽपि तत्तु विनिहत्य सुदुष्टरक्षः प्राप्याऽश्रमं स्वदयितां नहि पश्यतीव ॥ ४०॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V41
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = अन्वेषमाण इव तं च ददर्श गृध्रं सीतां रिरक्षिषुमथो रिपुणा विशस्तम् ।मन्दात्मचेष्टममुनोक्तमरेश्च कर्म श्रुत्वा मृतं तमदहत् स्वगतिं तथाऽदात् ॥ ४१॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V42
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = अन्यत्र चैव विचरन् सहितोऽनुजेन प्राप्तः करौ स सहसाऽथ कबन्धनाम्नः ।धातुर्वरादखिलजायिन उज्झितस्य मृत्योश्च वज्रपतनादतिकुञ्चितस्य ॥ ४२॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V43
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = छित्वाऽस्य बाहुयुगलं सहितोऽनुजेन तं पूर्ववत् प्रतिविधाय सुरेन्द्रभृत्यम् ।नाम्ना दनुं त्रिजटयैव पुराऽभिजातं गन्धर्वमाशु च ततोऽपि तदर्चितोऽगात् ॥ ४३॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V44
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = दृष्ट्वा तमेव शबरी परमं हरिं च ज्ञात्वा विवेश दहनं पुरतोऽस्य तस्यै ।प्रादात् स्वलोकमिममेव हि सा प्रतीक्ष्य पूर्वं मतङ्गवचनेन वनेऽत्र साऽभूत् ॥ ४४॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V45
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = शापाद् वराप्सरसमेव हि तां विमुच्य शच्या कृतात् पतिपुरस्त्वतिदर्पहेतोः ।गत्वा ददर्श पवनात्मजमृश्यमूके स ह्येक एनमवगच्छति सम्यगीशम् ॥ ४५॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V46
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = देहेऽपि यत्र पवनोऽत्र हरिर्यतोऽसौ तत्रैव वायुरिति वेदवचः प्रसिद्धम् ।‘कस्मिन् न्वहं’ त्विति तथैव हि सोऽवतारे तस्मात् स मारुतिकृते रविजं ररक्ष ॥ ४६॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V47
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = एवं स कृष्णतनुरर्जुनमप्यरक्षद् भीमार्थमेव तदरिं रविजं निहत्य ।पूर्वं हि मारुतिमवाप रवेः सुतोऽयं तेनास्य वालिनमहन् रघुपः प्रतीपम् ॥ ४७॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V48
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = एवं सुराश्च पवनस्य वशे यतोऽतः सुग्रीवमत्र तु परत्र च शक्रसूनुम् ।सर्वे श्रिता हनुमतस्तदनुग्रहाय तत्रागमद् रघुपतिः सह लक्ष्मणेन ॥ ४८॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V49
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = ‘यत्पादपङ्कजरजः शिरसा विभर्ति श्रीरब्जजश्च गिरिशः सह लोकपालैः’ ।सर्वेश्वरस्य परमस्य हि सर्वशक्तेः किं तस्य शत्रुहनने कपयः सहायाः ॥ ४९॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V50
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = समागते तु राघवे प्लवङ्गमाः ससूर्यजाः ।विपुप्लुवुर्भयार्दिता न्यवारयच्च मारुतिः (भा\.पु\. १०\.५८\.३८)॥ ५०॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = MBTN_C05_S01_V51
| document_id  = MBTN
| chapter_id    = MBTN_C05
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = संस्थाप्याऽशु हरीन्द्रान् जानन् विष्णोर्गुणाननन्तान् सः ।साक्षाद् ब्रह्मपिताऽसावित्येतेनास्य पादयोः पेते ॥ ५१॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = MBTN_C05_S01
| id      = MBTN_C05_S01_author-note
| text    =
{इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये रामचरिते हनूमद्दर्शनं नाम पञ्चमोऽध्यायः}
}}
 
 
[[Category:Mahabharatatatparyanirnaya]]

Latest revision as of 06:47, 13 April 2026