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| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C11_S23]] |
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| | title = त्रयोविंशोऽध्यायः
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| == त्रयोविंशोऽध्यायः ==
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| | verse_line1 = मनोवशेऽन्ये हि भवन्ति देवा मनश्च नान्यस्य वशं समेति । भीमो हि देवः सहसः सहीया- न्नात्याविशत् तत् स हि देवदेवः ॥ ४८ ॥
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| | verse_line1 = तं दुर्जयं शुत्रुमसह्यवेगमरुन्तुदं तन्न विजित्य केचित् ।
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| | verse_line2 = कुर्वन्त्यसद्विग्रहमत्र मर्त्यैर्मित्रैरुदासीनरिपुं विमूढाः ॥ ४९ ॥
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| सात्विकमनोविवक्षया देवशब्दः । तामसमनोविवक्षया शत्रुशब्दः ।'एकस्थानाधिपत्ये तु भिन्नानामपि युज्यते ।अभेदेन परामर्शः सादृश्येनापि वस्तुनोः''॥ इति प्रयोगे ॥'ऋते द्वे ब्रह्मणी कस्य मनो याति वशं क्वचित् ।श्रियं सरस्वतीं वापि याति वा तत्प्रसादतः''॥ इति पाद्मे ॥उदासीनानां रिपुम् । सम्यग्ज्ञानवतां न रिपुत्वं शक्यत इत्यर्थः ॥ ४८,४९ ॥
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| | verse_line1 = देहं मनोमात्रमिदं गृहीत्वा ममाहमित्यन्धधियो मनुष्याः ।
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| | verse_line2 = एषोऽहमन्योऽयमिति भ्रमेण दुरन्तपारे तमसि भ्रमन्ति ॥५०॥
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| अभिमानमात्रेणैव जीवस्य देहेन सम्बन्ध इति मनोमात्रम् । मनसा निर्माणमिति । अहमन्य इत्यपि देहमात्रे मन्यन्ते ।'देहमात्रं स्वमात्मानं यः परं चाभिपश्यति ।अन्धे तमसि मग्नस्य नोत्तारस्तस्य कुत्रचित्''॥ इति च ॥ ५० ॥
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| | verse_line1 = जनोऽस्य हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनश्चात्र हि भौमयोस्तत् । जिह्वां क्वचित् सन्दशति स्वदद्भि- स्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत् ॥ ५१ ॥
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| 'जनशब्दः स्वतो जीवे क्वचिद्देहे च वर्तते''। इति प्रयोगे ॥ ५१ ॥
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| | verse_line1 = दुःखस्य हेतुर्यदि देवताऽस्तु किमात्मनस्तत्र विकारयोस्तत् । यदङ्गमङ्गेन विहन्यते क्वचित् क्रुध्येत कस्मै पुरुषः स्वदेहे ॥ ५२ ॥
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| अयोग्यक्रोधादेर्मन एव कारणम् ।'अविकाराश्च ते देवा विकारा इति शब्दिताः ।अभिमानाद्विकारस्य स्वतः शक्ता अपि ध्रुवम्''॥ इति च ॥ ५२ ॥
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| | verse_line1 = आत्मा यदि स्यात् सुखदुःखहेतुः किमन्यतस्तत्र निजः स्वभावः । न ह्यात्मनोऽन्यद् यदि तन्मृषा स्यात् क्रुध्येत कस्मै न सुखं न दुःखम् ॥ ५३ ॥
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| नह्यात्मनः स्वभावादन्यद्भवति । यदि दृश्यते तथाऽपि मृषा स्यात् । सुखरूपं दुःखं न भवति । अतो मन एव तथा दर्शयति ।'जीवस्य सुखरूपस्य न दुःखं क्वचिदिष्यते ।अतो मनोऽभिमानेन दुःखी भवति नान्यथा''॥ इति भारते ॥५३॥
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| | verse_line1 = ग्रहा निमित्तं सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनोऽजस्य जनस्य ते वै । ग्रहैर्ग्रहस्यैव भवन्ति पीडाः क्रुध्येत कस्मै पुरुषस्ततोऽन्यः ॥ ५४ ॥
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| गृह्यमाणत्वाद् ग्रहो देहः ॥ ५४ ॥
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| | verse_line1 = कर्मास्तु हेतुः सुखदुःखयोर्वै किमात्मनस्तद् हि जडेऽजडत्वे । देहे स्ववित् पुरुषोऽयं सुपर्णः क्रुध्येत कस्मै न हि कर्म मूलम् ॥ ५५ ॥
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| अजडत्वे आत्मनः ॥ ५५ ॥
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| | verse_line1 = कालोऽस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनस्तत्र तदात्मनोऽसौ । नाग्नेर्हि तापो न हिमस्य तत् स्यात् क्रुध्येत कस्मै न परस्य बोद्धुः ॥ ५६ ॥
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| तदात्मनः कालाधीनस्य ।'स्वातन्त्र्यमात्मशब्दोक्तं स्वरूपमपि कुत्रचित्''॥ इति विवेके ॥यथाऽग्नेर्हिमस्य च नैव दुःखं तापादिनिमित्तं जडत्वात् । एवं जडत्वाद्देह-स्यापि कालादिसम्बन्धे विद्यमानेऽपि न दुःखं युक्तम् ।'सदा कालादिसम्बन्धाद्दुःखं देहस्य युज्यते ।तथाऽपि नैव दुःखी स जडत्वान्नियमेन तु ॥आत्मनः सुखरूपत्वान्न दुःखं युज्यते क्वचित् ।तस्मान्मनोभ्रमेणैव दुःखी जीवो न चान्यथा ॥सर्वेषां मनसो नेता मनोरूपस्त्रिलोचनः ।तद्वशाः सर्वदेवाश्च तेनैव सुखदुःखिनः ॥नियन्ता तस्य च प्राणस्ततोऽपि बलवत्तरः ।तन्नियन्ता हरिः साक्षात् परमानन्दलक्षणः''॥ इति तात्पर्ये ॥ ५६ ॥
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| | verse_line1 = न केनचित् क्वापि कथञ्चनास्य द्वन्द्वोपरागः परतः परस्य । यथाऽऽत्मनः संसृतिरूपिणः स्यात् एवं प्रबुद्धो न बिभेति भूतैः ॥ ५७ ॥
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| {{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥}}
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| | text =
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| आत्मनः मनसः ॥ भौमयोर्विकारयोः पीड्यपीडकयोः उभयमनसोः सतोर्दुःखं भवति । ग्रहस्य ग्रहणरूपस्य मनसः सत एव । जडे मनसि सत्येव । तदात्मनो मनसः सतः । संसृतिरूपिणः आत्मनो जीवस्य यथा तथा न हि परस्य । अमनस्त्वात् । अतो मनोऽन्वय-व्यतिरेक इति भावः ॥ ५७ ॥
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| [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | |