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| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C11_S18]] |
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| | title = अष्टादशोऽध्यायः
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| | verse_line1 = विप्रस्य वै संन्यसतो देवा दारादिरूपिणः ।
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| | verse_line2 = विघ्नं कुर्वन्त्ययं ह्यस्मानाक्रम्य समियात् परम् ॥ १४ ॥
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| 'असम्पूज्य न्यसिष्णूंस्तु देवा वै पातयन्त्यधः ।
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| सुसम्पूज्य न्यसिष्णूंस्तु देवा एवानुजानते ।
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| अथवा तद्यशोवृध्द्यै विघ्नन्तीव पुनःपुनः ।
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| तात्पर्याद्विघि्नतो देवैर्नोत्थातुं शक्नुयात्क्वचित्''॥ इति देवहार्दे ॥१४॥
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| | verse_line1 = यदेतदात्मनि जगन्मनोवाक्प्राणसम्भृतम् ।
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| | verse_line2 = सर्वं मायेति तर्केण स्वस्थस्त्यक्त्वा न तत् स्मरेत् ॥ २७ ॥
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| 'त्रिगुणा प्रकृतिर्माया तज्जत्वाद्विश्वमीदृशम् ।
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| अनाद्यनन्तकालेषु मायेत्याहुर्विपश्चितः ॥
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| अचेतनत्वान्नैवैतत्प्रयोजकतया स्मरेत् ।
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| चेतनत्वं स्वतन्त्रत्वं स चैको विष्णुरेव तु ॥
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| आयस्तु फलमुद्दिष्टं प्रोक्तं मायेति निष्फलम् ।
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| फलाल्पत्वात्तु मायैषा सम्प्रोक्ता त्रिगुणादिका ॥
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| महाफलप्रदत्वात्तु विष्णुराय इतीरितः''॥ इति निवृत्ते ॥ २७ ॥
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| | verse_line1 = वेदवादरतो न स्यान्न पाषण्डी न हैतुकी ।
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| | verse_line2 = शुष्कवादविवादेन कञ्चित्पक्षं न संश्रयेत् ॥ ३० ॥
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| | text =
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| 'वेदेन सह वादो यो वेदवाद इतीरितः ।
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| तर्केण वेदस्यान्यार्थकल्पनं तं विदो विदुः ॥
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| तन्न कुर्यात्कदाचिच्च तत्कुर्वन्वेदहा भवेत्''॥ इति च ।
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| 'योगसाङ्ख्यकणादाक्षपादा वै हेतुवादिनः ।
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| पश्वीशशाक्तबुद्धाद्या पाषण्डा इति कीर्तिता''॥ इति च ॥ ३० ॥
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| | verse_line1 = एक एव परो ह्यात्मा भूतेष्वात्मन्यवस्थितः ।
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| | verse_line2 = खं यद्वदुदपात्रेषु भूतान्येकात्मकानि च ॥ ३३ ॥
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| | text =
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| 'भूतानामेक एवात्ताऽथैको भूतेषु सन्ततः ।
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| एको भूतानि चादत्ते तस्मादेकात्मकानि तु''॥ इति भद्रमाने ॥
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| 'घटादिषु महाकाशो निर्विशेषश्च सन्ततः ।
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| घटावयवरूपस्तु तथैवान्यो घटानुगः ॥
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| घटनाशेऽप्यनाशः सन्मध्यमाकाश इष्यते ।
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| एकदेशाभिमानित्वादित्याकाशास्त्रयः स्मृताः ॥
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| महाकाशो विघ्नराजो विघ्नास्तत्र तु मध्यमाः ।
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| क्षुद्रविघ्नास्तदितर एवमात्मा त्रिधा स्मृतः ॥
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| महाखवत्परस्त्वात्मा जीवा मध्यखवत्स्मृताः ।
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| घटानुगखवत्प्रोक्ता असुरा नित्यदुःखिनः ॥
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| महाकाशवशाः सर्वे आकाशा इतरे स्मृताः ।
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| परमात्मवशे तद्वज्जीवाः सर्वेऽपि संस्थिताः ॥
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| एवं विष्ण्वात्मकमिदं जगत्पश्येद्यतिः सदा''॥ इति विनिर्णये ॥३३॥
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| | verse_line1 = शौचमाचमनं स्नानं न तु चोदनया चरेत् ।
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| | verse_line2 = अन्यांश्च नियमान् ज्ञानी यथाऽहं लीलयेश्वरः ॥ ३७ ॥
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| | verse_line1 = नहि तस्य विकल्पाख्या क्रिया मद्वीक्षया हता ।
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| | verse_line2 = आदेहान्तात् क्वचित् ख्यातिस्ततः सम्पद्यते मया ॥३८॥
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| | text =
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| 'स्वभावतो धर्मपरो न विधेश्चकितश्चरेत् ।
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| अल्पं फलं च चकिते स्वभावे फलमुत्तमम्''॥ इति च ॥
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| वि कल्पनं विकल्पः ।
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| 'निषिद्धं मनसा कल्प्य भीतो विहितमाचरेत् ।
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| अज्ञो ज्ञस्य तु सङ्कल्पः स्वभावाद्विहितानुगः ॥
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| शरीरधर्मिणः क्वापि निषिद्धेऽपि मनो व््राजेत् ।
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| तथापि तस्य नानर्थो मोक्षे नैवान्यथा व््राजेत्''॥ इति धर्मतत्त्वे ॥ ३७,३८ ॥
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| | verse_line1 = तावत् परिचरेद् भक्तः श्रद्धावाननसूयकः ।
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| | verse_line2 = यावद् ब््राह्म विजानीयान्मामेव गुरुमादृतः ॥ ४० ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे अष्टादशोऽध्यायः ॥
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| | text =
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| 'शुश्रूषेत्सहितस्तावद्यावज्ज्ञानोदयो गुरुम् ।
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| ततः परं च शुश्रूषेद्यथा तस्य प््रिायं भवेत्''॥ इति च ॥ ४० ॥
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| }}
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| [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | |