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| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C11_S12]] |
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| | title = द्वादशोऽध्यायः
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| | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– न रोधयति मां योगो न साङ्ख्यं धर्म एव च । न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्ते न दक्षिणाः ॥ १ ॥
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| | verse_line1 = व््रातानि यज्ञाश्छन्दांसि तीर्थानि नियमा यमाः ।
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| | verse_line2 = यथाऽवरुन्धेन्मत्सङ्गः सर्वदुःखापहो हि माम् ॥ २ ॥
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| | name = Bhashyam
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| | text =
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| 'सङ्गस्तु गुणसम्प्रीतिर्गुणवत्त्वेऽतिनिश्चयात् ।
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| स चेद्धरौ भवेत्तेन मुच्यते नात्र संशयः ॥
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| अपरोक्षदृशेर्हेतुर्भवेत्स स्याद्यदि क्षमः ।
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| अन्यथा सुखभागेन यद्दृशिर्मोक्षकारणम्''॥ इति दर्शने ॥ १-२ ॥
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| | verse_line1 = मत्सङ्गेन तु दैतेया यातुधाना मृगाः खगाः ।
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| | verse_line2 = गन्धर्वाप्सरसो नागाः सिद्धाश्चारणगुह्यकाः ॥ ३ ॥
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| }}
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| |
| | verse_line1 = विद्याधरा मनुष्येषु वैश्याः शूद्राः स्त्रियोऽन्त्यजाः ।
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| | verse_line2 = रजस्तमःप्रकृतयस्तस्मिंस्तस्मिन् युगेऽनघ ॥ ४ ॥
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| }}
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| | name = Bhashyam
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| | text =
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| 'ज्ञात्वाऽपि हरिविद्वेषी तमो याति न संशयः ।
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| विशेषरूपस्याज्ञोऽपि गुणवत्त्वेऽतिनिश्चितः ॥
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| गुणसम्प्रीतिमान्नित्यं तं दृष्ट्वा मुक्तिमेष्यति ।
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| अथवा सुखभागेव स्याद्यावद्दर्शनोपगः''॥ इति व्यक्ते ॥
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| 'हरिसङ्गविहीनस्तु हरेर्दर्शनवानपि ।
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| न मुच्यतेऽखिलज्ञोऽपि तमो याति च निश्चयात् ॥
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| गुणैरन्यैर्विहीनोऽपि तद्भक्तेष्वपि च क्रमात् ।
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| सङ्गवान्सुखभागेव स्याद्गुणैर्मुक्तिमेति वा ॥
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| स्वभक्तसङ्गहीनस्य व्युत्क्रमात्सङ्गिनोऽपि वा ।
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| स्वसङ्गविघ्नकृद्विष्णुस्तत्सज्जेतैषु तत्र च''॥ इति सत्सङ्गे ॥ ३-४ ॥
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| |
| | verse_line1 = ते नाधीतश्रुतिगणा नोपासितमहत्तमाः ।
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| | verse_line2 = अव्रतातप्ततपसो मत्सङ्गान्मामुपागताः ॥ ७॥
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| }}
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| |
| | verse_line1 = केवलेन हि भावेन गोप्यो गावः खगा मृगाः ।
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| | verse_line2 = येऽन्ये मूढधियो नागाः सिद्धा मामीयुरञ्जसा ॥ ८ ॥
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| }}
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| | verse_type = shloka
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| | verse_line1 = यं न योगेन सांख्येन दानव्रततपोऽध्वरैः ।
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| | verse_line2 = व्याख्यास्वाध्यायसंन्यासैः प्राप्नुयाद् यत्नवानपि ॥ ९ ॥
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| |
| | verse_line1 = मत्कामा रमणं जारं मत्स्वरूपाविदोऽबलाः ।
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| | verse_line2 = ब््राह्म मां परमं प्रापुः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १३ ॥
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| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
| |
| }}
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| | name = Bhashyam
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| | text =
| |
| 'गोपिकाद्या दिवं गत्वा हरिं ज्ञात्वा यथातथम् ।
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| परं पदं ययुः पूर्वसङ्गादेव शुभोचिताः''॥ इति च ॥ ७-९,१३ ॥
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| }}
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| | verse_line1 = तस्मात् त्वमुद्धवोत्सृज्य चोदितां प्रतिचोदनाम् ।
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| | verse_line2 = प्रवृत्तं च निवृत्तं च श्रोतव्यं श्रुतमेव च ॥ १४ ॥
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| }}
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| | verse_line1 = मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम् ।
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| | verse_line2 = याहि सर्वात्मभावेन यस्मिन्नस्त्यकुतोभयम् ॥ १५ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
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| }}
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| | id = BTN_C11_S12_V15_B1
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| | name = Bhashyam
| |
| | text =
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| 'श्रोतव्यं च श्रुतं चैव वक्तव्यं कार्यमेव च ।
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| निवर्त्यं च हरेः पूजेत्येवं कुर्यान्न चाक्रमात् ॥
| |
| एवं कर्ता तु संन्यासी सर्वोत्सर्गाद्धरौ स्मृतः ।
| |
| अन्यथा नैव संन्यासी निष्क्रियोऽपि शिला यथा''॥ इति कर्मविवेके ॥
| |
| 'नाहं कर्ता तु सर्वस्य कर्तैको विष्णुरव्ययः ।
| |
| इति वित्त्वा तु सन्यासी नान्यथा तु कथञ्चन''॥ इति निवृत्ते ॥
| |
| 'मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।
| |
| निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः''॥ इति च ॥१४-१५॥
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| }}
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| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = उद्धव उवाच– संशयः शृण्वतो वाचं तव योगेश्वरेश्वर । न निवर्तत आत्मस्थो येन भ््र•म्यति मे मनः ॥ १६ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
| |
| }}
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| | id = BTN_C11_S12_V16_B1
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| | name = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| वायौ मुख्यधियेत्युक्तवा विशेषतो गोपिकाप्रशंसनात्संशयः शृृण्वत इति चोदयति ॥ १६ ॥
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| }}
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| | |
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| | verse_id = BTN_C11_S12_V17
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| | document_id = BTN
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| | chapter_id = BTN_C11
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| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– य एष जीवो विवरप्रसूतिः प्राणेन घोषेण गुहां प्रविष्टः । मनोमयं सूक्ष्ममुपैति रूपं मात्रा स्वरो वर्ण इति स्थविष्ठम् ॥ १७ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
| |
| }}
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| | |
| {{Commentary
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| | id = BTN_C11_S12_V17_B1
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| | name = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| गोपिका अपि मामापुः किमु वाय्वाद्या इति दर्शयितुं गोपिकाप्रशंसनम् । सर्वैर्गुणैः सर्वोत्तमस्तु वायुरेव । स एव च हिरण्यगर्भ इति दर्शयितुमाह । य एष जीवो विवरप्रसूतिरित्यादि । विशेषेण वराणामहङ्कारादीनामपि प्रसूतिकर्ता । प्राणेन विष्णुना घोषेण वेदात्मिकया प्रकृत्या मनोमात्रा-दयश्च हिरण्यगर्भस्य देव्याः परमात्मनश्च व्यक्तिस्थानानीत्युक्तम् ।
| |
| 'प्राणेन घोषेण च सह विवरप्रसूतिर्मनोमयं रूपमुपैति''॥ इत्यादिना ॥ १७ ॥
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| }}
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| | verse_line1 = यथाऽनलः स्वेऽनिलबन्धुरूष्मा बलेन दारुण्यधिमथ्यमानः । अणुः प्रजातो हविषा समिद्ध्यते तथैव मे व्यक्तिरियं हि वाणी ॥ १८ ॥
| |
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| | verse_line1 = एवं गतिः कर्म रतिर्विसर्गो घ्राणो रसो दृक् स्पर्शः श्रुतिश्च । सङ्कल्पविज्ञानमथाभिमानः सूत्रं रजः सत्वतमोविकारः ॥ १९ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
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| |
| तत्रापि विशेषतो भगवत एव व्यक्तिस्थानमित्याह । यथाऽनल इत्यादिना ॥ १८,१९ ॥
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| |
| | verse_line1 = अयं हि जीवस्त्रिवृदब्जयोनि- रव्यक्त एको जगतां यथाऽऽद्यः । विश्लिष्टशक्तिर्बहुधैव भाति बीजानि योनिं प्रतिपद्य यद्वत् ॥ २० ॥
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| }}
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| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = यस्मिन्निदं प्रोतमशेषमोतं पटे यथा तन्तुवितानसंस्था । य एष संसारतरुः पुराणः कर्मात्मकः पुष्पफले प्रसूते ॥ २१ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
| |
| }}
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| | verse_id = BTN_C11_S12_V21
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| | id = BTN_C11_S12_V21_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| विशेषेण श्लिष्टशक्तिः । अनपगतसामर्थ्यः । यथैकं कलमादिबीजं भूमावुप्तं बह्वङ्कुरं भवति एवं परमात्मानुगृहीतो ब््राह्माऽहङ्कारादिषु बहुधा व्यक्तीभवति ॥
| |
| 'सुपर्णशेषरुद्रादिप्रसूतिश्च चतुर्मुखः ।
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| सर्वजीवोत्तमो जीवो गुणैर्ज्ञानसुखादिभिः ॥
| |
| विष्णुभक्त्यादिभिः सर्वैर्नियमात्सार्वकालिकम् ।
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| मुक्तावपि न सन्देहः स हि देवेन विष्णुना ॥
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| प्राणप्राणेन जगतामीशेन रमया तथा ।
| |
| वेदात्मिक्या च सहितः सूक्ष्मः सन्मनसि स्थितः ॥
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| वीन्द्रादीनां तु सर्वेषां मात्रावर्णस्वरेषु च ।
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| स्थूलरूपी सदा तिष्ठन्नेवं श्रोत्रादिखेषु च ॥
| |
| सर्वेषां प््रोरको ह्येको ज्ञानानन्दबलैस्त्रिवृत् ।
| |
| नित्यशक्तिः सर्वगः सन्बहुधैव प्रतीयते ॥
| |
| तस्मिन्नोतमिदं सर्वं पटे लक्षणतन्तुवत् ।
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| स एव वायुरुद्दिष्टो वायुर्हि ब््राह्मतामगात् ॥
| |
| विशेषतो हरेर्व्यक्तिस्थानान्येतानि सर्वशः ।
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| मन आदीन्यहङ्कारो ब््राह्मा वेदात्मिका रमा ॥
| |
| त्रिगुणात्मिका च सैव श्रीः सैवोक्ता संविदात्मिका ।
| |
| तस्या अपि नियन्तैको विष्णुः सर्वेश्वरेश्वरः ॥
| |
| यथा दारुषु सूक्ष्मः सन्मथितोऽग्निः समिध्यते ।
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| तथा वेदादिषु हरिर्मथितः सम्प्रदृश्यते ॥
| |
| व्यक्तिस्थानान्यथैतानि वेदादीनि हरेर्विदुः''॥ इति तन्त्रभागवते ॥
| |
| 'मनसि व्यक्ततां यामि तस्माद्व्यक्तिर्हि मे मनः''॥ इति भारते ॥
| |
| 'यथैव वस्त्रे दीर्घं च तिर्यक्चापि सुसंस्थिता ।
| |
| तन्तुभिः क्रियमाणैव पद्माद्याकारसंस्थितिः ॥
| |
| यथा जीर्णानि वस्त्राणि तन्त्वाधाराणि वा पुनः ।
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| कन्थावयवभूतानि तद्वदेतच्चतुर्मुखे ॥
| |
| सोऽपि तद्वद्धरौ नित्यं संस्थितः श्रीरपि स्फुटम्''॥ इति प्रातिस्विके ॥ २०,२१ ॥
| |
| }}
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| | |
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| |
| | verse_id = BTN_C11_S12_V22
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| | document_id = BTN
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| | chapter_id = BTN_C11
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| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = द्वे अस्य बीजे शतमूलस्त्रिनालः पञ्चस्कन्धः पञ्चरसप्रसूतिः । दशैकशाखो द्विसुपर्णनीड- स्त्रिवल्कलो द्विफलः खं प्रविष्टः ॥ २२ ॥
| |
| }}
| |
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| |
| | verse_id = BTN_C11_S12_V23
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| |
| | verse_line1 = अदन्ति चैकं फलमस्य गृध््र• ग््र•मेचरा एकमरण्यवासाः । हंसा य एवं बहुरूपमिष्टं मायामयं वेद स वेद वेदम् ॥ २३ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_id = BTN_C11_S12_V24
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| | document_id = BTN
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| | chapter_id = BTN_C11
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| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = एवं गुरूपासनयैकभक्त्या विद्याकुठारेण शितेन धीरः । विवृश्च्य जीवाशयमप्रमत्तः सम्पद्य चात्मानमथ त्यजास्त्रम् ॥ २४ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C11_S12_V24
| |
| | id = BTN_C11_S12_V24_author-note
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे द्वादशोऽध्यायः ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C11_S12_V24
| |
| | id = BTN_C11_S12_V24_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| 'जगद्वृक्षस्य बीजे द्वे ब््राह्मा चैव सरस्वती ।
| |
| मूलभूतानि कर्माणि मनो बुद्धिरहङ्कृतिः ॥
| |
| नालत्वेन समुद्दिष्टाः खमाद्याः स्कन्धसंज्ञिताः ।
| |
| एकादशेन्द्रियाण्येव शाखास्तु त्रिगुणास्त्वचः ॥
| |
| प्रवृत्तं च निवृत्तं च फले अस्य प्रकीर्तिते ।
| |
| पुष्पमैहिकमुद्दिष्टं रसाः शब्दादयस्तयोः ॥
| |
| प्रवृत्ताश्च निवृत्ताश्च पक्षिणस्तत्र संस्थिताः ।
| |
| वृक्षस्य पृथिवीवच्छ्रीर्विष्णुराकाशवायुवत् ॥
| |
| तस्या अपि सदाधार एवं ज्ञात्वा विमुच्यते''॥ इति निवृत्ते ॥
| |
| 'प्राकृतान्तःकरणजं ज्ञानमस्त्रं सृतिच्छिदम् ।
| |
| तदेव तेन संछेद्यं चित्तं प्रकृतिसम्भवम् ॥
| |
| तेनैव सह संत्याज्यं नैव पूर्वं कथञ्चन ।
| |
| ज्ञानं प्रकृतिजं चापि मूलनाशे विनश्यति ॥
| |
| ततः परं स्वरूपेण ज्ञानेनैव जनार्दनम् ।
| |
| वेत्ति मुक्तस्तस्थाऽऽत्मानं जीवानन्यांश्च सर्वशः''॥ इति माहात्म्ये ॥
| |
| 'बीजभूतावपि ह्यस्य ब््राह्मा चैव सरस्वती ।
| |
| न रिष्यतो जगत्सृष्टौ वटवृक्षादिबीजवत् ॥
| |
| स्वकार्यतो महान्तौ च गुणतो रूपतस्तथा ।
| |
| पृथिव्युदकवत्तस्माद्बीजत्वं न तु बीजवत् ॥
| |
| व्यञ्जकत्वान्न चाल्पत्वान्महाक्ष्मावद्रमा स्मृता ।
| |
| अण्डो महाक्ष्मा सम्प्रोक्तस्ततः पृथ्व्युदकं तथा ॥
| |
| जायते नित्यशस्तस्माद्भुक्तं भुक्तं न हीयते ।
| |
| तत्राप्युदकवद्ब्रह्मा मृद्वच्चापि सरस्वती ॥
| |
| जलाधारा यतो मृच्च सर्वत्रापि व्यवस्थिता ।
| |
| अन्यथा तु रजोभूता नीयते वायुनाऽखिला ॥
| |
| अथवा सर्वनाशः स्याज्जलाधारा ततः स्मृता ।
| |
| वटादिबीजवत्तस्य पुण्यापुण्यमुदीरितम् ॥
| |
| बाह्योदवच्चाग्निवच्च विष्णुरेव प्रकीर्तितः''॥ इति सत्यसंहितायाम् ॥
| |
| श्रियादेरप्याप्यायकत्वाद्बाह्योदवत् । ब््राह्मादेरपि लयकर्तृत्वादग्निवत् । आधारत्वात्सुखदत्वाच्च वायुवत् । अवकाशप्रदत्वाद्व्योमवद्विष्णुः ।
| |
| 'व््राीह्यादिवत्तु मूलत्वं कर्मणां जगतः स्मृतम् ।
| |
| उदवत्पृथिवीवच्च ब््राह्मणो वाच एव च ॥
| |
| मूलभूवच्छ्रियश्चैव मूलभूरण्डमुच्यते ।
| |
| बाह्योदाग्नीरखंवत्तु विष्णोर्बीजत्वमिष्यते''॥ इति विश्वसंहितायाम् ॥
| |
| देहेन्द्रियमनोवाक्षु स्थितो भक्त्यादिसाधकः ।
| |
| सुपर्णशेषरुद्रादेरपि ब््राह्मा चतुर्मुखः ॥
| |
| अतो भक्त्यादिकाः सर्वे गुणास्तस्यैव सर्वगाः ।
| |
| अतिरिक्ताश्च सम्पूर्णाः सुपर्णादेः शताधिकाः ॥
| |
| सुपर्णादिभिरज्ञातास्तदभीमानवर्जिताः ।
| |
| ब््राह्मणस्तु पुनः सन्ति तेषां कर्ता जनार्दनः ॥
| |
| तस्मात्सर्वाधिको ब््राह्मा गुणैः सर्वैर्न संशयः ।
| |
| वर्णस्थो वर्णनामाऽसौ स्वरस्थः स्वरनामकः ॥
| |
| मनःस्थश्च मनोनामा तन्नामा चक्षुरादिगः ।
| |
| तस्य सर्वाणि नामानि मुख्यतः कवयो विदुः ॥
| |
| तत्स्थानत्वादिन्द्रियादेर्वर्णादेश्चोपचारतः ।
| |
| एवमस्योपचारेण विष्णोः साक्षात्तु मुख्यतः''॥ इति शब्दनिर्णये ॥
| |
| 'कृष्णप््रिायाभ्यो गोपीभ्यो भक्तितो द्विगुणाधिकाः ।
| |
| महिष्योऽष्टौ विना यास्ताः कथिताः कृष्णवल्लभाः ॥
| |
| ताभ्यः सहस्रसमिता यशोदा नन्दगेहिनी ।
| |
| ततोऽप्यभ्यधिका देवी देवकी भक्तितस्ततः ॥
| |
| वसुदेवस्ततो जिष्णुस्ततो रामो महाबलः ।
| |
| न ततोऽभ्यधिकः कश्चिद्भक्त्यादौ पुरुषोत्तमे ॥
| |
| विना ब््राह्माणमीशेशं स हि सर्वाधिकः स्मृतः'' इत्यन्तर्यामिसंहितायाम् ॥
| |
| 'पापद्वेषादिका दोषा अवराणां न संशयः ।
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| भक्त्यादिगुणपूगस्तु पराणामा विरिञ्चतः ॥
| |
| स्वातन्त्र्यात्सर्वदेहेषु स्थितानामपि सर्वशः ।
| |
| स्पृश्यन्ते नैव दोषैस्ते गुणादानैकतत्पराः''इति विवेके ॥
| |
| 'यदु किञ्चेमाः प्रजाः । शोचन्त्यमैवासां तद्भवति । पुण्यमेवामुं गच्छति । न ह वै देवान्पापं गच्छति''इति च ॥ २२-२४ ॥
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| }}
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| [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | |