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| == एकादशोऽध्यायः ==
| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C11_S11]] |
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| | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– बद्धो मुक्त इति ह्याख्या गुणतो मे न वस्तुतः । गुणस्य मायामूलत्वान्न मे बन्धो न मोक्षणम् ॥ १ ॥
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| मे गुणतः । मद्वशसत्वादेः ।
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| 'अमायत्वान्निर्गुणोऽहं बन्धमोक्षौ न चापि मे ।
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| मदधीनस्य जीवस्य बन्धमोक्षौ मदेव तु''॥ इति स्वाभाव्ये ॥ १ ॥
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| | verse_line1 = शोकमोहौ सुखं दुःखं देहापत्तिश्च मायया ।
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| | verse_line2 = स्वप्ने यथाऽऽत्मनः ख्यातिः संसृतिर्नतु वास्तवी ॥ २ ॥
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| 'स्वप्नोऽयमित्यविज्ञानात्स्वप्ने दुःखमुपाश्नुते ।
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| निजस्वरूपानुभवराहित्यात्तद्वदेव तु ॥
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| जाग््राद्दुःखमपि प्रोक्तं विष्णुतत्त्वं न पश्यतः ।
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| तस्मात्तदस्वभावत्वात्सदप्येतदवास्तवम्''॥ इति लोकसंहितायाम् ॥ २ ॥
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| | verse_line1 = विद्याविद्ये मम तनू विद्ध्युद्धव शरीरिणाम् ।
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| | verse_line2 = मोक्षबन्धकरी आद्ये मायया मे विनिर्मिते ॥ ३ ॥
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| | text =
| |
| 'विद्याऽविद्ये मम तनू प्रतिमावत्सदोदिते ।
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| सदा तद्व्यतिरिक्तस्य नित्यज्ञानसुखात्मनः ॥
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| मदिच्छावशगे नित्यमविद्यानिर्मिता गुणाः ।
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| सत्वाद्या मदधीनत्वादविद्याया न मे गुणाः ॥
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| अविद्या चैव विद्या च गुणाः सत्वादिका अपि ।
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| देहोत्पत्तिः सुखं दुःखं सर्वमेतन्मदिच्छया ॥
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| अतोऽहं बन्धमोक्षाभ्यां रहितो नित्यमेव तु ।
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| मुक्तशब्दोदितो बन्धराहित्यान्न विमोक्षतः''इति कालसंहितायाम् ।
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| 'श्रीस्तु विद्या समुद्दिष्टा दुर्गाऽविद्या प्रकीर्तिता ।
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| ते त्वनादी हरेरिच्छानियते सर्वदैव तु''॥ इति मायावैभवे ॥ ३ ॥
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| | verse_line1 = एकस्यैव ममांशस्य जीवस्यैवं महामते ।
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| | verse_line2 = बन्धोऽस्याविद्ययाऽनादिर्विद्यया च तथेतरः ॥ ४ ॥
| |
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| | text =
| |
| 'भिन्नांशस्यैव जीवस्य बन्धमोक्षौ न मे क्वचित् ।
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| अभिन्नांशास्तु मत्स्याद्यास्तेजसः कालवह्निवत् ॥
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| जीवा भिन्नांशकास्तत्र तेजसः प्रतिबिम्बवत्''॥ इति वैलक्षण्ये ॥
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| 'मुक्तस्य तु न मे मोक्षो बन्धाभावात्कथञ्चन ।
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| मुक्त इत्यपि नामैतद्दीप्यतेऽसौ दिवाकरः ॥
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| इतिवद्बन्धराहित्यान्न तु वृक्षादिदीप्तिवत् ।
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| कादाचित्कतया वाच्यं बन्धाभावादमोक्षतः ॥
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| जीवस्य बन्धमोक्षस्तु मत्प्रसादात्कदाचन''॥ इति तत्त्वोदये ॥ ४ ॥
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| | verse_line1 = अथ बद्धस्य मुक्तस्य वैलक्षण्यं वदामि ते ।
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| | verse_line2 = विरुद्धधर्मिणोस्तात स्थितयोरेकधर्मिणि ॥ ५ ॥
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| | text =
| |
| मुक्तस्य विष्णोः ।
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| 'नित्यशुद्धबुद्धमुक्तसत्यसुखाद्वयप्रत्यगेक पूर्ण इत्यतः पदान्वयात्''इत्यादिवचनात् ।
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| बद्धो जीवः ।
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| 'बद्धा जीवा इमे सर्वे पूर्वबन्धसमन्वयात् ।
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| नित्यमुक्तत्वतो विष्णुर्मुक्तनामा सदोदितः ॥
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| अबद्धत्वादमोक्षोऽपि दीप्यतेऽसौ रविर्यथा''॥ इति ब््राह्मसंहितायाम् ॥ ५ ॥
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| | verse_line1 = सुपर्णावेतौ सदृशौ सखायौ यदृच्छया कृतनीडौ च वृक्षे । एकस्तयोः खादति पिप्पलान्न- मन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान् ॥ ६ ॥
| |
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| | text =
| |
| 'अनत्तृत्वं हरेर्दुःखानत्तृत्वादुच्यते सदा ।
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| विषयान्विनापि पूर्णत्वात्स्वरूपानन्दभोगिनः ॥
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| शुभमत्त्येव हि सदा सर्वत्रापि स्थितं विभुः ।
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| स्वादोरदनवद्ध्यत्ति जीवोऽस्वाद्वपि यत्सदा ॥
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| अनारतं पारवश्यात्स्वाद्वत्तीति ततः श्रुतिः''॥ इति भोगनिर्णये ॥
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| 'अस्वादु स्वादुवद्ध्यत्ति जीवो नैव जनार्दनः ।
| |
| अतो नात्तीतिवचनमश्नतोऽपि सुखं सदा''॥ इति परभोगे ।
| |
| 'साशनानशनत्वेन नरदेवौ यथोदितौ ।
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| अत्तिं विनाऽप्यदौर्बल्यात्तथानत्तिर्हरेर्भुजः''॥ इति स्वाभाव्ये ।
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| तदेव प्रोक्तं निरन्नोऽपि बलेन भूयानिति । स्वयं त्वत्त्येव तथापि नादननिबन्धनं तस्य बलमित्यर्थः ।
| |
| 'यत्रा सुपर्णा अमृतस्य भागमनिमेषं विदथाऽभिस्वरन्ति ।
| |
| इनो विश्वस्य भुवनस्य गोपाः स मा धीरः पाकमत्रा विवेश ।
| |
| यस्मिन्वृक्षे मध्वदः सुपर्णा निविशन्ते सुवते चाधि विश्वे ।
| |
| तस्येदाहुः पिप्पलं स्वाद्वग््रो तन्नोन्नशद्यः पितरं न वेद''॥ इत्यादिवाक्यशेषात् ।
| |
| वृक्षे स्थित्वा मध्वदः सुपर्णाः यस्मिन्नश्नन्ति निविशन्ते, तदाधारत्वेन सुवते च, तस्यैव सुपर्णस्य स्वादु पिप्पलम् । अन्यस्तु स्वादुवदश्नाति, न स्वादु । यावत्पितरं परमात्मानं न वेदेत्यर्थः ।
| |
| 'सुपर्णौ द्वौ शरीरस्थौ जीवश्च परमस्तथा ।
| |
| पारवश्यादनाज्जीवस्तत्रात्तीति श्रुतौ श्रुतः ॥
| |
| स्ववशेनादनाद्विष्णुर्नात्तीत्यत्तापि सन् श्रुतः ।
| |
| स एव हि शुभस्यात्ता जीवोऽत्तास्यैव वेदनात्''॥ इति कूर्मसंहितायाम् ॥
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| 'सर्वं वा अत्तीति तददितेरदितित्वम्''।
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| 'यस्य ब््राह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः''।
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| 'अत्ता चराचरग््राहणात्''।
| |
| 'अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च''॥ इत्यादेश्च ॥ ६ ॥
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| | verse_line1 = आत्मानमन्यं च स वेद विद्वा- नपिप्पलादो न तु पिप्पलादः । योऽविद्ययाऽन्धः स तु नित्यबद्धो विद्यामयो यः स तु नित्यमुक्तः ॥ ७ ॥
| |
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| | text =
| |
| 'जीवो मुक्तोऽपि नो जीवान् परमात्मानमेव च ।
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| वेत्ति सर्वात्मना विष्णुर्वेत्त्येकः पुरुषोत्तमः ॥
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| तस्य प्रसादतः किञ्चिद्ब्रह्माद्या अपि जानते ।
| |
| अन्यजीवानपेक्ष्यैको जानाति च चतुर्मुखः ॥
| |
| सामस्त्येन तदन्ये तु लेशज्ञानाः क्रमात्स्मृताः''॥ इति विनिर्णये ॥
| |
| 'तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप''॥ इत्यादि च ।
| |
| 'अज्ञा जीवास्तु कथ्यन्ते मुक्ता अप्यल्पवेदनात् ।
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| ज्ञ इत्येवोच्यते नित्यं सर्ववेत्तृत्वतो हरिः''॥ इति वैशेष्ये ॥
| |
| 'अनाद्यविद्ययाऽन्धत्वं जीवस्य यदि योग्यता ।
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| प्रयत्नश्चानुकूलः स्यादन्तवद्भवति ध््राुवम् ॥
| |
| नित्यमेवान्यथाऽन्धत्वमयोग्या मानुषादयः ।
| |
| बद्धत्वं सर्वजीवानां नियमान्नित्यमेव तु ॥
| |
| बद्धत्वं विष्ण्वधीनत्वमन्धत्वं तददर्शनम् ।
| |
| अतः क्वचिदनित्यत्वमन्धताया भविष्यति ॥
| |
| मुक्तस्यापि तु बद्धत्वमस्ति यत्स हरेर्वशः ।
| |
| मुक्ताख्या दुःखमोक्षात्स्याद्बद्धाख्या हर्यधीनतः ॥
| |
| नित्यबद्धा अपि ततो मुक्ता दुःखविमोक्षतः ।
| |
| नित्यमुक्तस्त्वेक एव हरिर्नारायणः प्रभुः ॥
| |
| स्वतन्त्रत्वात्स्वतन्त्रत्वं तस्यैकस्य न चापरे''इति मुक्तविवेके ॥
| |
| 'शतं सहस्राणि चतुर्दशेह परा गतिर्जीवगणस्य दैत्य ।
| |
| आरोहणं तत्कृतमेव विद्धि स्थानं तथा निःसरणं च तेषाम्''॥
| |
| 'कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः''।
| |
| 'मुक्तानां परमा गतिः''॥ इति भारते ॥
| |
| 'कलाः पञ्चदश त्यक्तवा श्वेतद्वीपनिवासिनाम् ।
| |
| मुक्ताख्या विष्ण्वधीनास्ते स्वाधिकानां वशे स्थिताः ॥
| |
| न चास्मादधिकं किञ्चित्सुखमस्ति हरेर्विना ।
| |
| नित्यमुक्तः स एवैकः स्वतन्त्रः स यतः सदा''॥ इति माहात्म्ये ॥ ७ ॥
| |
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| | verse_line1 = देहस्थोऽपि न देहस्थो विद्वान् स्वप्नाद् यथोत्थितः ।
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| | verse_line2 = ओहस्थोऽपि देहस्थः कुमतिः स्वप्नदृग् यथा ॥ ८ ॥
| |
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| |
| 'शरीरस्थोऽपि विद्वत्त्वान्न विष्णुर्बध्यते क्वचित् ।
| |
| अविद्वत्त्वात्तु तत्रैव देहे जीवस्तु बध्यते ॥
| |
| स्वप्नदृग्वदिमे जीवा हरिः स्वप्नोत्थितो यथा ।
| |
| सदा तमोविहीनोऽपि ज्ञापनार्थमुदीर्यते''॥ इति विवेके ॥ ८ ॥
| |
| }}
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| | verse_line1 = इन्द्रियैरिन्द्रियार्थेषु गुणैरपि गुणेषु च ।
| |
| | verse_line2 = गृह्यमाणेष्वहंकुर्यान्न विद्वान् यस्त्वविक्रियः ॥ ९ ॥
| |
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| | text =
| |
| गुणैरपि गुणेषु अप्रधानैर्जीवैरप्रधानेषु विषयेषु ।
| |
| 'आत्मनो वशगैर्जीवैरात्मनो वशगेषु च ।
| |
| दुःखेषु गृह्यमाणेषु मनआदिभिरिन्द्रियैः ॥
| |
| अहं दुःखीति नैवेशस्त्वहङ्कुर्यात्परः पुमान् ।
| |
| जीवगं त्वेव तद्दुःखं विष्णुः पश्यति सर्वदा ॥
| |
| अतो न दुःखभाग्विष्णुः स्वातन्त्रत्पुरुषोत्तमः ।
| |
| पारतन्त्र्यादहं दुःखीत्येवं जीवः प्रपश्यति ॥
| |
| तस्मात्स दुःखभागुक्तो यावदीशः प्रसीदति''॥ इति स्वातन्त्र्ये ॥९॥
| |
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| |
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| | verse_line1 = दैवाधीने शरीरेऽस्मिन् गुणभाव्येन कर्मणा ।
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| | verse_line2 = वर्तमानोऽबुधस्तत्र कर्ताऽस्मीति निबध्यते ॥ १० ॥
| |
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| |
| गुणभाव्येन कर्मणा गुणभूतः अस्वतन्त्रोऽहमस्मिन्कर्मणीति भावनीयेन ।
| |
| 'अस्वतन्त्रः स्वतन्त्रोऽस्मीत्येवं जीवः प्रभावयन् ।
| |
| बध्यते हीशकोपेन राजभावेन भृत्यवत्''॥ इति च ॥ १० ॥
| |
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| | verse_line1 = एवं विरक्तः शयन आसनाटनमज्जने ।
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| | verse_line2 = दर्शनस्पर्शनघ््र•णभोजनश्रवणादिषु ॥ ११ ॥
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| | verse_line1 = न तथा बध्यते विद्वान् तत्र तत्राददन् गुणान् ।
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| | text =
| |
| एवं विरक्तः शयने । एवमस्वातन्त्र्ेण नित्यबद्धोऽपि । एवमात्मनोः स्वातन्त्र्यपारतन्त्र्ययोर्विद्वान् जीवोऽप्यविद्वज्जीववन्न बध्यते । एवं विद्वानित्यन्वयः ।
| |
| 'नित्यबद्धोऽपि जीवो य आत्मनो नित्यबद्धताम् ।
| |
| विष्णुना नित्यमुक्तत्वं तस्य वेत्ति स मुच्यते ॥
| |
| तदधीनत्वबन्धे तु विद्यमानेऽप्यदुःखभाक् ।
| |
| देहस्थोऽपि न दुःखी स्यादन्यवत्किमु मुक्तिगः''॥ इति प्राथम्ये ॥ ११,१२ ॥
| |
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| | verse_line1 = वैशारद्येक्षयाऽसङ्गशितया च्छिन्नसंशयः ।
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| | verse_line2 = प्रतिबुद्ध इव स्वप्नान्नानात्वाद् विनिवर्तते ॥ १३ ॥
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| |
| 'नानात्वमिति वै मिथ्याज्ञानं कुत्रचिदुच्यते ।
| |
| वस्तुयाथात्म्यतोऽन्यत्वाज्ज्ञानस्योज्झो विवक्षितः''॥ इति वाल्लभ्ये ॥ १३ ॥
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| | verse_line1 = न स्तुवीत न निन्देत कुर्वतः साध्वसाधु वा ।
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| | verse_line2 = वदतो गुणदोषाभ्यां वर्जितः समदृङ्मुनिः ॥ १६ ॥
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| | verse_line1 = न कुर्यान्न वदेत् किञ्चिन्न ध्यायेत् साध्वसाधु वा । आत्मारामोऽनया वृत्त्या विचरेज्जडवन्मुनिः ॥ १७ ॥
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| |
| 'दोषश्चैव गुणश्चोभावीशतन्त्रौ न मे वशौ ।
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| इति जानन्न दोषी स्याद्वर्जितोऽल्पगुणेन च''॥ इति प्राथम्ये ॥ १६,१७ ॥
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| | verse_line1 = शब्दब््राह्मणि निष्णातो न निष्णायात् परे यदि ।
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| | verse_line2 = श्रमस्तत्र भ््रामफलो ह्यधेनुमिव रक्षतः ॥ १८ ॥
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| 'स्थितिशब्देन नियमः क्वचिज्जीवनमुच्यते ।
| |
| उत्थितत्वं क्वचिच्चैव क्वचिद्गतिविरोधिता''॥ इति शब्दनिर्णये ॥१८॥
| |
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| | verse_line1 = गां दुग्धदोहामसतीं च भार्यां देहं पराधीनमसत्प्रजां च । वित्तं त्वतीर्थीकृतमङ्ग वाचं हीनां मया रक्षति दुःखदुःखी ॥ १९ ॥
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| | verse_line1 = यस्यां न मे पावनमङ्ग कर्म स्थित्युद्भवत्राणनिरोधमस्य । लीलावतारेहितकर्म वा स्याद् वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीरः ॥ २० ॥
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| 'दुग्धदोहां तु गां रक्षेत् क्षीरमात्रप्रयोजनः ।
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| यथा तद्वद्धरेरन्यवाचोधारणमिष्यते''॥ इति हरिवंशेषु ॥ १९,२० ॥
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| | verse_line1 = एवं जिज्ञासयाऽपोह्य नानात्वभ््राममात्मनि ।
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| | verse_line2 = उपारमेत विरजं मनो मय्यर्प्य सर्वगे ॥ २१ ॥
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| अर्थादन्यथात्वेन मनसः परिवर्तनं नानात्वभ््रामः ।
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| 'जीवस्येशत्वविज्ञानं जीवानामेकता तथा ॥
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| ईशस्य बहुता ज्ञानमीशस्यानीशता तथा ।
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| जगतोऽसत्यताज्ञानं नानात्वभ््राम उच्यते''॥ इति विवेके ॥ २१ ॥
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| | verse_line1 = त्वं ब््राह्म परमं व्योम पुरुषः प्रकृतेः परः ।
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| | verse_line2 = अवतीर्णोऽसि भगवन् स्वेच्छोपात्तपृथग्वपुः ॥ २८ ॥
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| स्वेच्छोपात्तपृथग्वपुः वसुदेवादिशरीरं स्वेच्छया येन स्वीकृतमिति ।
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| 'नित्यानन्दशरीरोऽपि वसुदेवादिदेहगः ।
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| प्रदर्शयेज्जनिं स्वस्य नित्यं देहविवर्जितः ॥
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| वसुदेवादिदेहेषु प्रवेशस्तस्य भण्यते ।
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| देहोपादानमिति तु न ह्यन्यो देह इष्यते ॥
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| अन्याभिमतदेहेषु प्रविष्टः सर्वदा हरिः ।
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| नान्यानभिमतो देहो विष्णोरस्ति कदाचन ॥
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| अतोऽशरीरो भगवान् पुत्रताभिमतिस्तु या ।
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| वसुदेवादिकानां तु सैव मिथ्यामतिर्भवेत् ॥
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| अन्याहंभावयुग्देह एवासौ हरिरास्थितः ।
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| न तदन्येषु देहेषु क्वचित्तस्य प्रवेशनम् ॥
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| मम पुत्रस्त्वयमिति भ्रामणाय यदा हरेः ।
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| वसुदेवादिदेहेषु तनूपात्तिस्तु सा गतिः ॥
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| अनुपात्तशरीरस्य तनूपात्तिरितीष्यते ।
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| तद्देहं पितृदेहत्वे उपादत्ते यतो हरिः''॥ इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ २८ ॥
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| | verse_line1 = ज्ञात्वा ज्ञात्वाऽथ ये वै मां यावान् यश्चास्मि यादृशः ।
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| | verse_line2 = भजन्त्यनन्यभावेन ते मे भक्ततमा मताः ॥ ३३ ॥
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| ज्ञात्वाज्ञात्वेति वीप्सा ।
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| 'ज्ञात्वाऽपि मम माहात्म्यं तत्रोत्सुकतया पुनः ।
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| विशेषाच्च विशेषेण ज्ञात्वा मामश्नुतेऽधिकम्''॥ इति विज्ञाने ॥ ३३ ॥
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| | verse_line1 = वैष्णवे बन्धुसत्कृत्या हृदि खे ध्याननिष्ठया ।
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| | verse_line2 = वायौ मुख्यधिया तोये द्रव्यैस्तोयपुरस्कृतैः ॥ ४४ ॥
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| 'सर्वदेवोत्तमो वायुरिति ज्ञानान्न चापरम् ।
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| प््रिायमस्ति हरेः किञ्चित्तथा वायोर्हरेर्विदः ॥
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| भारतीवायुलक्ष्मीणामात्मनश्च यथाक्रमम् ।
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| आधिक्यज्ञानतो विष्णुः सर्वतः सम्प्रसीदति''॥ इति माहात्म्ये ॥
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| 'वायुर्भीमो भीमनादो महौजाः सर्वेषां च प्राणिनां प्राणभूतः ।
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| अनावृत्तिर्देहिनां देहपाते तस्माद्वायुर्देवदेवो विशिष्टः''॥ इति मोक्षधर्मेषु ॥
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| 'तस्माद्वायुरेव व्यष्टिर्वायुः समष्टिरप पुनर्मृत्युं जयति य एवं वेद''॥ इति च ।
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| 'पञ्चभूतमनोबुद्धिरुद्राणां प्रतिदेहकम् ।
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| बाह्यतश्चापि नेतृत्वाद्वायुर्व्यष्टिः समष्टिकः''॥ इति प्रभञ्जने ॥४४॥
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| | verse_line1 = स्थण्डिले मन्त्रहृदयैर्भोगैरात्मानमात्मनि ।
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| | verse_line2 = क्षेत्रज्ञं सर्वभूतेषु समत्वेन यजेत माम् ॥ ४५ ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे एकादशोऽध्यायः ॥
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| 'स्वात्मनिस्थो हरिः पूज्य आत्मनामाऽशनादिकैः ।
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| तत्सम्बन्धादात्मशब्दो जीवे स्यादुपचारतः''॥ इत्यात्मसंहितायाम् ॥ ४५ ॥
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| [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | |