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| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C11_S09]] |
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| | title = नवमोऽध्यायः
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| | verse_line1 = वासो बहूनां कलहो भवेद् वार्ता द्वयोरपि ।
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| | verse_line2 = एक एव चरेत् तस्मात् कुमार्या इव कङ्कणः ॥ १० ॥
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| 'असज्जनैस्तु संवासो न कर्तव्यः कथञ्चन ।
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| यावद्यावच्च बहुभिः सज्जनैः स तु मुक्तिदः''॥ इति षाड्गुण्ये ॥ १० ॥
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| | verse_line1 = यस्मिन् मनो लब्धपदं यदेत- च्छनैः शनैर्मुञ्चति कर्मरेणून् । सत्वेन वृद्धेन रजस्तमश्च विधूय निर्वाणमुपैत्यनिन्धनम् ॥ १२ ॥
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| | verse_line1 = तदेवमात्मन्यवरुद्धचित्तो न वेद किञ्चिद् बहिरन्तरं वा । यथेषुकारो नृपतिं व््राजन्त- मिषौ गतात्मा न ददर्श पार्श्वे ॥ १३ ॥
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| | text =
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| 'बाह्यं मनो विलीनं स्यान्मुक्तौ चिन्मात्रकं मनः ।
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| तेनैवानुभवेत्सर्वं स्वात्माभिन्नेन मुक्तिगः''॥ इति मुक्तितत्त्वे ॥ १२,१३ ॥
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| | verse_line1 = एको नारायणो देवः पूर्वसृष्टं स्वमायया ।
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| | verse_line2 = संहृत्य कालकलया कल्पान्त इदमीश्वरः ॥ १६ ॥
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| | verse_line1 = एक एवाद्वितीयोऽभूदात्माधारोऽखिलाश्रयः ।
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| | verse_line2 = कालेनात्मानुभावेन साम्यं नीतासु शक्तिषु ॥ १७ ॥
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| | verse_line1 = सत्वादिष्वादिपुरुषः प्रधानपुरुषेश्वरः ।
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| | verse_line2 = परावराणां परम आस्ते कैवल्यसंज्ञितः ॥ १८ ॥
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| | text =
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| 'कालप्रकृतिजीवादौ लयेऽसत्यप्रवर्तनात् ।
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| तन्निमित्तस्य कार्यस्य विष्णुरेक इतीर्यते ॥
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| स हि कालादिकं सर्वं वर्तयत्यमितद्युतिः''॥ इति तत्त्वलये ॥
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| 'प्रकृतिश्च गुणाश्चैव शक्यत्वाच्छक्तयः स्मृताः ।
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| विष्णोः स्वरूपभूता तु शकनाच्छक्तिरुच्यते''॥ इति शक्तिविवेके ॥ १६-१८ ॥
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| | verse_line1 = यत्र यत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया ।
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| | verse_line2 = स्नेहाद् द्वेषाद् भयाद् वापि याति तत्तत्सरूपताम् ॥ २२ ॥
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| | verse_line1 = कीटः पेशस्कृतं ध्यायन् कुड्यां तेन प्रवेशितः ।
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| | verse_line2 = याति तत्साम्यतां राजन् पूर्वरूपमसंत्यजन् ॥ २३ ॥
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| | text =
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| 'भयादपि हरिं भक्तया चिन्तयंस्तत्स्वरूपताम् ।
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| पेशस्कारिवदायाति द्विषन् द्वेषसरूपताम् ॥
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| सुखरूपस्य हि द्वेषो दुःखरूप इतीर्यते ।
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| तस्माद्दुःखं सदा याति द्वेषवान्पुरुषोत्तमे ॥
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| नृसिंहद्वेषतो दुःखं रक्षोरूपेण रावणः ।
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| अगाच्च रामविद्वेषाच्छिशुपालस्तथैव च ॥
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| ततो भक्त्या परं यातो द्वेषरूपस्त्वधोगतिम् ।
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| तस्मात्सर्वगुणोद्रेकिविद्वेषात्सर्वदोषवान् ॥
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| भवेदिति सरूपत्वं द्वेषादेः पुरुषस्य हि''॥ इति भागवततन्त्रे ॥
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| 'तं यथा यथोपासते तदेव भवति''।
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| 'तं भूतिरिति देवा उपासाञ्चक्रिरे ते बभूवुस्तस्माद्धाप्येतर्हि सुप्तो भूर्भूरित्येव प्रश्वसित्यभूरित्यसुरास्ते ह पराबभूवुः''॥ इत्यादि च ॥
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| 'सत्यप्यत्यल्पविद्वेषे भोजनं दास्यतीति तु ।
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| स्नेहबाहुल्यतः कीटः पेशस्कारिसमो भवेत् ॥
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| द्वेषे सर्वात्मना नष्टे स्नेहे चैव विवर्धति ।
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| सरूपता तदैव स्यात्कीटस्यैवं हरेरपि ॥
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| अत्यल्पोऽपि हरेर्द्वेषः स्नेहस्यानुदयङ्करः ।
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| सोऽयं विशेषो नान्यस्य फलदाता च केशवः ॥
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| न हि पेशस्कृतः किञ्चित्फलदातृत्वमिष्यते ।
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| स्वातन्त्र्याद्विद्विषां चैव केशवो न सुखप्रदः''॥ इति स्वातन्त्र्यविवेके ॥ २२,२३ ॥
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| | verse_line1 = देहो गुरुर्मम विरक्तिविवेकहेतु- र्बिभ््रात् स्म सत्वनिधनं सततात्युदर्कम् । तत्वान्यनेन विमृशामि यथा तथापि पारक्यमित्यवसितो विचराम्यसङ्गः ॥ २५ ॥
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| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
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| | text =
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| सत्त्वनिधनः सत्वं निधीयतेऽस्मिन्परमेश्वर इति । 'सततमतिशये-नोच्चैरर्करूपः''इति सततात्युदर्को भगवान् ॥ २५ ॥
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| | verse_line1 = जायात्मजार्थपशुभृत्यगृहाप्तवर्गान् पुष्णाति यत्प्रियचिकीर्षया वितन्वन् । सोऽन्ते सुकृच्छ्रमवरुद्धमनाः स्वदेहं सृष्ट्वा स्वबीजमवसीदति वृक्षधर्मा ॥ २६ ॥
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| बीजार्थमारोपहणादिकं कुर्वन्निति ॥ २६ ॥
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| | verse_line1 = न ह्येकस्माद् गुरोर्ज्ञानं सुस्थिरं स्यात् सुपुष्कलम् ।
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| | verse_line2 = ब््राह्मैतदद्वितीयं वै गीयते बहुधर्षिभिः ॥ ३१ ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे नवमोऽध्यायः ॥
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| | verse_id = BTN_C11_S09_V31
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| | text =
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| 'एकस्मात्तु गुरोर्ज्ञानं जायते नैव कस्यचित् ।
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| एकस्मादेव जायेत योग्याद्ब्रह्मपदस्य तु ॥
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| स्वयं चोपदिशेज्ज्ञानं वैरिञ्चिपदयोगिनि ।
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| अनुग््राहात्तेन चापि ज्ञानं दत्वा विमुक्तिदः ॥
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| ज्ञानं प्राप्य बहुभ्योऽपि नर्ते मुक्तिश्चतुर्मुखात् ।
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| ज्ञानमप्राप्य तेषां तु ज्ञानदो विष्णुरेव हि''॥ इति गुरुविवेके ॥३१॥
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| [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | |