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| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C11_S03]] |
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| | title = तृतीयोऽध्यायः
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| | verse_line1 = अन्तरिक्ष उवाच– एभिर्भूतानि भूतात्मा महाभूतैर्महाभुज । ससर्जोच्चावचान्यादौ स्वयमात्मप्रसिद्धये ॥ ३ ॥
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| आत्मप्रसिद्धये भूतानां भगवज्ज्ञानार्थम् ॥ ३ ॥
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| | verse_line1 = एवं सृष्ट्वा स भूतानि स्थविष्ठैः पञ्चधातुभिः ।
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| | verse_line2 = एकधा दशधाऽऽत्मानं विभजन् जुषते गुणान् ॥ ४ ॥
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| | verse_line1 = गुणैर्गुणान् स भुञ्जान आत्मप्रद्योतितैः प्रभुः ।
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| | verse_line2 = मन्यमान इदं सृष्टमात्मानमिह सज्जते ॥ ५ ॥
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| | verse_line1 = कर्माणि कर्मभिः कुर्वन् सनिमित्तानि देहभृत् ।
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| | verse_line2 = तत्तत्कर्मफलं गृह्णन् भ््रामतीह सुखेतरम् ॥ ६ ॥
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| | text =
| |
| एवं गुणान्भुञ्जानो भगवान् । तं सृष्टं मन्यमानो जीव इह सज्जते ।
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| 'शरीरे दोषहानेन गुणभोक्तारमीश्वरम् ।
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| शरीरस्थतया जीवं मन्यमानः पतत्यधः ।
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| तत्सृष्टा हि सदा जीवा देहादेर्जनिमत्त्वतः ।
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| नित्यानन्दैकदेहोऽसौ विष्णुस्तत्क्वैकताऽनयोः''॥ इति च ॥ ४-६ ॥
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| | verse_line1 = इत्थं कर्मगतीर्गच्छन् बह्वभद्रावहः पुमान् ।
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| | verse_line2 = आभूतसंप्लवात् स्वर्गप्रलयावश्नुतेऽवशः ॥ ७॥
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| | verse_line1 = धातूपप्लव आसन्ने व्यक्तं द्रव्यगुणात्मकम् ।
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| | verse_line2 = अनादिनिधनः कालो ह्यव्यक्ताय विकर्षति ॥ ८ ॥
| |
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| | text =
| |
| 'आभूतसम्प्लवाज्जन्म जीवेशत्वं विजानतः ।
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| ततः पतत्यधो यस्मादुत्थानं नैव तु क्वचित्''॥ इति च ।
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| 'कालाख्यः कलनाद्विष्णुर्व्यक्तमव्यक्तगं नयन्''। इति च ॥ ८ ॥
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| | verse_line1 = ततो विराजमुत्सृज्य वैराजः पुरुषो नृप ।
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| | verse_line2 = अव्यक्तं विशते सूक्ष्मं निरिन्धन इवानलः ॥ १२ ॥
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| | verse_line1 = वारिणा हृतगन्धा भूः सलिलत्वाय कल्पते ।
| |
| | verse_line2 = सलिलं तद् हृतरसं ज्योतिष्ट्वायोपकल्पते ॥ १३ ॥
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| | verse_line1 = हृतरूपं तु तमसा वायौ ज्योतिः प्रलीयते । हृतस्पर्शोऽवकाशेन वायुर्नभसि लीयते ॥ १४ ॥
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| | text =
| |
| अव्यक्तं विशतीत्युक्तवा तस्य विस्तारो वारिणा हृतगन्धेत्यादि ।
| |
| 'सङ्क्षेपविस्तराभ्यां तु कथयन्ति मनीषिणः ।
| |
| बहुवारस्मृतेस्तस्य फलबाहुल्यकारणात्''॥ इति शब्दनिर्णये ॥
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| | verse_line1 = कालात्मना हृतगुणं नभ आत्मनि लीयते ।
| |
| | verse_line2 = इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सह वैकारिकैर्नृप ॥ १५ ॥
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| | verse_line1 = प्रविशन्ति ह्यहंकारं स्वगुणैरहमात्मनि ॥ १६ ॥
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| | text =
| |
| नभ आत्मनि लीयत इत्युक्त्वेन्द्रियाणीत्याद्यपि विस्ताराय ॥ आत्मनि बुद्धौ ॥ १५,१६ ॥
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| | verse_line1 = एषा माया भगवतः सर्गस्थित्यन्तकारिणी ।
| |
| | verse_line2 = त्रिवर्णा वर्णिताऽस्माभिः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ १७ ॥
| |
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| | verse_line1 = राजोवाच– यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभिः । तरन्त्यञ्जः स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम् ॥ १८॥
| |
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| | text =
| |
| 'त्रिवर्णा वरणादुक्ता त्रिगुणानां हरेर्मतिः ।
| |
| गुणात्मकत्वात्प्रकृतिस्त्रिवर्णेति प्रकीर्त्यते ।
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| तत्र तु प्रकृतिस्तार्या तारिका तु हरेर्मतिः ।
| |
| उभयं विष्णुमायोक्तं ज्ञातव्यमुभयं तथा''॥ इति च ॥
| |
| 'बहूनां सहनिर्देश एकयाऽभिधयैव तु ।
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| तयैवाभिधया तेषां परामृश्यैकमुच्यते ।
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| तामेतामान्तरीं रीतिं विदुः शब्दविदो जनाः''॥
| |
| इति च ॥ १७,१८ ॥
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| | verse_line1 = प्रबुद्ध उवाच– कर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च । पश्येत् पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम् ॥ १९ ॥
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| | verse_line1 = नित्यार्तिदेन वित्तेन दुर्लभेनात्ममृत्युना ।
| |
| | verse_line2 = गृहापत्याप्तपशुभिः का प्रीतिः साधितैश्चलैः ॥ २० ॥
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| | verse_line1 = एवं लोकं परं विद्यान्नश्वरं कर्मनिर्मितम् ।
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| | verse_line2 = अतुल्यातिशयध्वंसाद् यथा मण्डलवर्तिनाम् ॥ २१ ॥
| |
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| | verse_line1 = तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् ।
| |
| | verse_line2 = शाब्दे परे च निष्णातं ब््राह्मण्युपशमाश्रयम् ॥ २२ ॥
| |
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| | verse_line1 = तत्र भागवतान् धर्मान् शिक्षेद् गुर्वात्मदैवतः ।
| |
| | verse_line2 = अमाययाऽनुवृत्त्या च तुष्येदात्माऽऽत्मदो हरिः ॥ २३ ॥
| |
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| | text =
| |
| मण्डलवर्तिनः युद्धरङ्गस्थाः ॥
| |
| 'देवाः सजाया मुच्यन्ते मानुषा उभयात्मकाः ।
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| विजाया एव योगेशास्तेषां या यैव योग्यता ।
| |
| तथा तथैव मुच्यन्ते नान्यथा तु कथञ्चन''॥ इति संदृश्ये ॥१९-२३॥
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| | verse_line1 = सर्वतो मनसोऽसङ्गमादौ सङ्गं च साधुषु ।
| |
| | verse_line2 = दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भूतेष्वद्धा यथोचितम् ॥ २४ ॥
| |
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| |
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| | text =
| |
| 'सन्तस्तु त्रिविधाः प्रोक्ता उत्तमा मध्यमाधमाः ।
| |
| उत्तमा देवतास्तत्र ऋष्याद्या मध्यमा मताः ॥
| |
| अधमा मानुषोत्कृष्टास्ते चापि त्रिविधा मताः ।
| |
| तत्राधमेषु येषां तु सङ्गो विघ्नाय वै भवेत् ॥
| |
| तेषामुत्तमसङ्गस्य तेषां सङ्गं परित्यजेत् ।
| |
| आदौ तु तेषामपि च सङ्ग उत्तमसङ्गतेः ॥
| |
| साधनत्वान्नतु त्याज्यो यदि त्यक्तुं न शक्यते ।
| |
| तदा तेऽपि तथा नेया यथा विघ्नो न वै भवेत् ॥
| |
| तदुच्चसङ्गतेः क्वापि तदा दोषो न जायते ।
| |
| प्रयोजनाय तेषां तु सङ्गः सर्वात्मनेष्यते ॥
| |
| सर्वथा चैव देवेषु सङ्गो मुनिगणेषु च ।
| |
| भाव्यो हि तं विना नैव पुरुषार्थः क्वचिद्भवेत् ॥
| |
| विशेषतः स्वोत्तमेषु विना सङ्गं न मुच्यते ।
| |
| स्वनीचेषु तु देवेषु विना सङ्गं न पूर्यते ॥
| |
| तस्मात्सत्सूत्तमेष्वेषु सङ्गः कार्यो विशेषतः ।
| |
| अनाद्यनन्तकालेषु न च हाप्यः कथञ्चन ॥
| |
| सतां तदुत्तमेशेशे किमु विष्णौ परात्परे''॥ इति गारुडे ॥
| |
| 'बह्वपेक्षो हि जिज्ञासुरतो देहादिवृत्तये ।
| |
| किञ्चित्सत्स्वपि सङ्गी स्यादशक्ये सति वर्तने ॥
| |
| कृतकृत्यस्त्यजेत्सङ्गं सदा गुरुसुरादिषु ।
| |
| सङ्गी स्यान्न हि तत्सङ्गं विना तु सुखभाग्भवेत् ॥
| |
| तस्मादनाद्यनन्तैव सक्तिर्गुरुसुरादिषु ।
| |
| अन्यत्र कृत्यापेक्षा स्यादिति सङ्गविनिर्णयः''॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ २४ ॥
| |
| }}
| |
| | |
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| | verse_id = BTN_C11_S03_V27
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| | chapter_id = BTN_C11
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| | verse_type = shloka
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| | verse_line1 = श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापि हि ।
| |
| | verse_line2 = मनोवाक्कायदण्डं च सत्यं शमदमावपि ॥ २७ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
| |
| }}
| |
| | |
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| | verse_id = BTN_C11_S03_V27
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| | id = BTN_C11_S03_V27_B1
| |
| | text =
| |
| 'श्रद्धा भागवते तन्त्रे वेदे भारतपञ्चमे ।
| |
| विष्णोरव्यवधानेन वक्तृत्वात्सर्वथा भवेत् ॥
| |
| कलाविद्यास्वनिन्दा च व्यवधानेन केशवे ।
| |
| प्रवेशाद्यतिभिः कार्या ह्यन्यथा नरकं व््राजेत् ॥
| |
| श्रन्नामास्तिक्यबुद्धिः स्यात्सा चैव द्विविधा मता ।
| |
| अत्रोक्तमस्तीत्येकाऽत्र ममात्रास्ति प्रयोजनम् ॥
| |
| इत्यन्या तत्र पूर्वा तु यतेः कार्या कलास्वपि ।
| |
| द्वितीया न तु कर्तव्या पञ्चरात्रविरोधिषु ॥
| |
| सदैव निन्दा सर्वैश्च ब््राह्मादिस्थावरान्तकैः ।
| |
| सम्यक्वार्या तद्विना च तमो यान्ति विनिश्चयात् ॥
| |
| कुर्वन्त्येव सुरास्तत्र तदन्येषां तमो भवेत् ।
| |
| पञ्चरात्रं च वेदाश्च मूलरामायणं तथा ॥
| |
| पुराणं भागवतं चैव भारतं च न भिद्यते ।
| |
| एतेष्वपि यथा विष्णोराधिक्यप्रतिपादनम् ॥
| |
| तद्भक्तानां च क्रमशः स एवार्थो न चापरः ।
| |
| अन्यथा दृश्यमानं तु मोहायैव विनिर्दिशेत् ॥
| |
| तस्मात्सर्वेषु शास्त्रेषु विष्णोराधिक्यमेव तु ।
| |
| क्रमेण च तदीयानां प्रतिपाद्यं न चापरम्''॥ इति ब््राह्माण्डे ।
| |
| 'अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।
| |
| ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया रताः''॥ इति च ।
| |
| 'गृहिणोऽप्यल्पबोधस्य न कलासु प्रयोजनम् ।
| |
| आवर्तयेद्वेदतन्त्रं मुख्योक्तो हरिरत्र हि''॥ इति हरिवंशेषु ॥ २७ ॥
| |
| }}
| |
| | |
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| |
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| |
| | verse_line1 = एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहृदम् ।
| |
| | verse_line2 = परिचर्यां चोभयत्र महत्सु नृषु साधुषु ॥ ३० ॥
| |
| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
| |
| }}
| |
| | |
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| | text =
| |
| कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येष्वपि सौहृदं किमु देवेषु महत्सु देवादिषु ॥ ३० ॥
| |
| }}
| |
| | |
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| |
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| | verse_type = shloka
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| | verse_line1 = पिप्पलायन उवाच– स्थित्युद्भवप्रलयहेतुरहेतुरस्य यः स्वप्नजागरसुषुप्तिषु सन् बहिश्च । देहेन्द्रियासुहृदयानि चरन्ति येन सञ्जीवितानि तदवैहि परं नरेन्द्र ॥ ३६ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
| |
| }}
| |
| | |
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| |
| ओतुः स्वस्य हेतुरन्यो नास्ति । बहिः प्रलये मुक्तौ च ॥ ३६ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_id = BTN_C11_S03_V37
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| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = नैनं मनो विशति वागुत चक्षुरात्मा प्राणेन्द्रियाणि च यथाऽनलमर्चिषः स्वाः । शब्दोऽप्यबोधकनिषेधतयाऽऽत्ममूल- मर्थोक्तमाह यदृते न निषेध्यसिद्धिः ॥ ३७ ॥
| |
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| |
| }}
| |
| | |
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| |
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| | id = BTN_C11_S03_V37_B1
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| | text =
| |
| 'ब््राह्माद्या यं न जानन्ति करणाद्यभिमानिनः ।
| |
| जानन्त्यनुग््राहाच्चास्य प्रधानाग्निं यथाऽर्चिषः ॥
| |
| अग्निपुत्रा नमस्तस्मै यमाह श्रीश्च न स्फुटम् ।
| |
| वेदरूपा परं देवं वैलक्षण्यात्समस्तशः ॥
| |
| आनन्दो नेदृशानन्द इत्युक्ते लोकतः परम् ।
| |
| प्रतिभाति न चाऽभाति यथावद्दर्शनं विना''॥ इति ब््राह्मतर्के ।
| |
| बोधकः परमेश्वरः । ईदृशानन्दो न भवतीति निषेधवचनार्थ एव न सिध्यति विलक्षणानन्दाभाव इत्यर्थतः सिद्धिः ॥ ३७ ॥
| |
| }}
| |
| | |
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| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौ सूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम् । ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्ति ब््राह्मैव भाति सदसच्च तयोः परं यत् ॥ ३८ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BTN_C11_S03_V38
| |
| | id = BTN_C11_S03_V38_B1
| |
| | text =
| |
| 'त्रिगुणात्मकं प्रधानं च रजः सत्वं तमस्तथा ।
| |
| प्राणो महानहङ्कारो जीवास्तदभिमानिनः ॥
| |
| ज्ञानात्मकानीन्द्रियाणि तथा कर्मात्मकानि च ।
| |
| शब्दाद्यर्थाः सुखं दुःखमिति प्रोक्तं द्विधा फलम् ॥
| |
| एतत्सर्वं हरे रूपमित्याहुर्ज्ञानदुर्बलाः ।
| |
| स एव बहुशक्तित्वाद्भाति चैषां तथा तथा ॥
| |
| एवं कारणकार्याख्यं समस्तं हरिमेव तु ।
| |
| केचित्पश्यन्ति च व्यस्तं केचिदाहुरपण्डिताः ॥
| |
| एवं कारणकार्येभ्यः परमानन्दरूपिणम् ।
| |
| अज्ञानाद्बहुधा प्राहुरेकं सन्तं सुदुर्जनाः ॥
| |
| रूप्यत्वात्तद्वशत्वाच्च तद्रूपं चैतदीर्यते ।
| |
| न तु तस्य स्वरूपत्वान्निर्दोषानन्दरूपिणः ॥
| |
| कथं जडाजडैक्यं स्यात्कुतः पूर्णाल्पमोदयोः ।
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| पूर्णाल्पज्ञानयोश्चैव पूर्णशक्त्यल्पशक्तयोः ॥
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| निर्दुःखदुःखान्वितयोः स्वतन्त्रपरतन्त्रयोः ।
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| अतः सर्वगुणैर्युक्तं सर्वदोषविवर्जितम् ॥
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| अन्याभेदेन विज्ञाय तम एव प्रपद्यते ।
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| निष्कृष्टं सर्वतो विष्णुं सर्वतश्च विलक्षणम् ॥
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| ज्ञात्वा पूर्णगुणं यान्ति मुक्तिं नास्त्यत्र संशयः''॥ इति तन्त्रभागवते ॥
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| 'अहं हि जीवसञ्ज्ञो वै मयि जीवः सनातनः ।
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| मैवं त्वयाऽनुमन्तव्यं दृष्टो जीवो मयेति ह ।
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| अहं श्रेयो विधास्यामि यथाधीकारमीश्वरः''इति मोक्षधर्मेषु ॥३८॥
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| | verse_line1 = नासौ जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ न क्षीयते स च न विध्यति चारिणा हि । सर्वत्र शश्वदनपाय्युपलब्धिमात्रं प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत् ॥ ३९ ॥
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| 'यथेन्द्रियगतः प्राणस्तेषां शक्त्या विकल्प्यते ।
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| दृष्टिदः श्रुतिदश्चेति मतिदो ज्ञानदस्तथा ॥
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| इत्यादिभेदतो वाच्य एक एव महाबलः ।
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| दृष्ट्यादिशक्तिस्तस्यैव ततो नान्यस्य कस्यचित् ॥
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| एवं सद्रूपकं ब््राह्म तत्तच्छक्त्या विकल्प्यते ।
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| एकमेव महाशक्ति प्राणस्यापि बलप्रदम्''॥ इति हरिवंशेषु ॥ ३९ ॥
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| | verse_line1 = अण्डेषु पेशिषु तरुष्ववनिस्थितेषु प्राणेन जीव उपधावति तत्र तत्र । छन्ने मतीन्द्रियगुणेऽहमि च प्रसुप्ते कूटस्थ आस यमृते तदनुस्मृतिर्न ॥ ४० ॥
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| 'पेशो जरायुरुद्दिष्टः सुवर्णं पेश उच्यते ।
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| मृदुपिण्डश्च पेशं स्यात्क्वचिद्भद्रमपीष्यते''॥ इत्यभिधानम् ।
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| अवनिस्थितेषु स्वेदजेषु । भूस्वेदेन हि प्रायो जायन्ते । तदा कूटस्थे परमात्मन्यास जीवः । यं परमात्मानमृते सुप्त्यनुस्मृतिरेव न ।
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| 'देहाद्देहान्तरगतौ प्रविशेत्प्राणमेव तु ।
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| जीवः प्राणः परात्मानमेवं सुप्तावपि स्फुटम् ॥
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| तदन्या देवताः सर्वाः प्राणस्यैव वशे स्थिताः ।
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| ईषच्च सुप्तवद्यान्ति नैव मानुषजीववत् ॥
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| स्वर्गस्थानां न तु स्वापः प्रायो देहेऽपि नाज्ञता ।
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| मृतिसुप्तिप्रबोधादेर्नियन्ता हरिरेकराट् ॥
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| तमृते नैव चावस्था नावस्थावान्न च स्मृतिः ।
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| ततस्तु देवदेवेशः प्राणः प्राणेश्वरो हरिः ॥
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| न हरेरीशिता त्वन्यः स हि सर्वाधिको मतः''॥ इति हरिवंशेषु ॥ ४० ॥
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| | verse_line1 = राजोवाच– एवं प्रश्नमृषीन् पूर्वमपृच्छं पितुरन्तिके । नाब्रुवन् ब्रह्मणः पुत्रास्तत्र कारणमुच्यताम् ॥ ४३ ॥॥
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| | verse_line1 = आविर्होत्र उवाच– कर्माकर्मविकर्मेति वेदवादो न लौकिकः । वेदस्य चेश्वरात्मत्वात् तत्र मुह्यन्ति सूरयः ॥ ४४ ॥
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| 'जानन्तोऽपि हि दुर्ज्ञेयः प्रश्नोऽयं ज्ञानिनामपि ।
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| इति वेदयितुं ब््राह्मपुत्रा नोचुर्निमेः पुरा''॥ इति तन्त्रभागवते ॥
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| ईश्वरात्मत्वात् ईश्वरविषयत्वात् ॥ ४४ ॥
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| अज्ञः सन्नाचरन् ना । विकर्मणा मृत्योर्मृत्युमुपैति । स एवेश्वरार्पितं कुर्वाणः सिद्धिं लभते ।
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| 'अज्ञात्वा कुर्वतः कर्म स्खलनात्पापकारणम् ।
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| तदेवार्पयतो विष्णोर्नैव पापाय तद्भवेत् ॥
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| मनोदोषविहीनस्य न तु दोषवतः क्वचित् ।
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| सत्सु केशवपूर्वेषु क्रमशो भक्तिहीनता ॥
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| असद्भक्तिस्तथा स्नेहो बहुमानमथापि वा ।
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| स्वोत्तमानां प््रिायत्यागादात्मप््रिायचिकीर्षया ॥
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| अधिकेष्वेव नीचोच्चभक्तिव्यत्यास एव वा ।
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| स्वोत्तमस्यात्मनश्चैव समस्नेहोऽथवा भवेत् ॥
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| कार्येषु बहुमाने वा स्वात्मनः समतापि वा ।
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| आधिक्ये किमु वक्तव्यमात्मनः शक्तिहापनम् । ।
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| शक्तस्याशक्तवत्कर्म मनोदोषा इतीरिताः''॥ इति कर्मतन्त्रे ॥४६॥
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| अव्यग््रात्वेनाचार्यं लब्ध्वा ।
| |
| 'परीक्ष्यैव गुरुः शिष्यं शिष्योऽपि गुरुमाव््राजेत् ।
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| अन्यथा नरकायैव प्रायश्चित्तं गुरोस्तथेऽति च ॥ ४९ ॥
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| 'द्रव्यलिङ्गं शिलाद्यं स्यादात्मलिङ्गं मनोमयम् ।
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| अथवा स्थण्डिलं चैव विष्णोर्लिङ्गं प्रकीर्तितम्''॥ इति च ॥ ५१ ॥
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| तन्मयं तत्प्रधानम् ।
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| 'विष्णोर्भृत्योऽहमित्येव सदा स्याद्भगवन्मयः ।
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| नैवाहं विष्णुरस्मीति विष्णुः सर्वेश्वरो ह्यजः''इति च ॥ ५५ ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे तृतीयोऽध्यायः ॥
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| 'स्वादानात्स्वात्मनो व्याप्त्या विष्णुः स्वात्मेति कथ्यते ।
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| न तु जीवस्वरूपत्वात्स हि जीवेश्वरः प्रभुः''॥ इति शब्दनिर्णये ॥ ५६ ॥
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