|
|
| (6 intermediate revisions by the same user not shown) |
| Line 1: |
Line 1: |
| {{Adhyaya
| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C11_S02]] |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C11
| |
| | chapter_num = 11
| |
| | chapter_name = एकादशस्कन्धः
| |
| | section_id = BTN_C11_S02
| |
| | section_num = 2
| |
| | title = द्वितीयोऽध्यायः
| |
| }}
| |
| == द्वितीयोऽध्यायः ==
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C11_S02_V05
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C11
| |
| | section_id = BTN_C11_S02
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = भूतानां देवचरितं दुःखाय च सुखाय च ।
| |
| | verse_line2 = सुखायैव हि साधूनां त्वादृशामच्युतात्मनाम् ॥ ५ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C11_S02_V06
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C11
| |
| | section_id = BTN_C11_S02
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = वसुदेव उवाच– भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तथैव तान् । छायेव कर्मसचिवाः साधवो दीनवत्सलाः ॥ ६ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C11_S02_V06
| |
| | id = BTN_C11_S02_V06_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | label = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| 'आत्मनो भजने बुद्धिमुत्पाद्य फलदाः सुराः ।उत्तमानां जनानां तु निकृष्टानां विपर्ययः ॥शुभाशुभफलानां तु कर्मणां विबुधाः सदा ।प्रवर्तका यथायोग्यमृषयः करुणाः सदा ॥सुखमिच्छन्ति भूतानां प्रायो दुःखासहा नृणाम् ।तथापि तेभ्यः प्रवरा देवा एव हरेः प््रिायाः''इत्युद्दामसंहितायाम् ॥ ५-६ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C11_S02_V38
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C11
| |
| | section_id = BTN_C11_S02
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = अविद्यमानोऽप्यवभाति हि द्वयो ध्यातुर्धिया स्वप्नमनोरथो यथा । तत्कर्म सङ्कल्पविकल्पकं मनो बुधो निदध्यादभयं ततः स्यात् ॥ ३८ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C11_S02_V38
| |
| | id = BTN_C11_S02_V38_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | label = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| 'आत्मनो देहगेहादि द्वयशब्देन भण्यते ।अविद्यमानं जीवस्य प्रतिभाति तदीयवत् ॥जाग््राद्वत्तु यथा स्वप्नः प्रतिभाति मनोरथः ।विद्यमानवदेवैतद्देहादीशवशे स्थितम् ॥विभाति स्ववशत्वेन सैषा संसृतिरुच्यते ।तस्मात्तद्विषयं त्यक्तवा मनो विष्णौ निवेशयेत्''॥इति हरिवंशेषु ॥ ३८ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C11_S02_V40
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C11
| |
| | section_id = BTN_C11_S02
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = एवंव््रातश्च प््रिायनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः । हसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ॥ ४० ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C11_S02_V41
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C11
| |
| | section_id = BTN_C11_S02
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्वानि दिशो द्रुमादीन् । सरित् समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत् किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यम् ॥ ४१ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C11_S02_V41
| |
| | id = BTN_C11_S02_V41_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | label = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| 'केचिदुन्मादवद्भक्ता बाह्यलिङ्गप्रदर्शकाः ।केचिदान्तरभक्ताः स्युः केचिच्चैवोभयात्मकाः ॥मुखप्रसादाद्दार्ढ्याच्च भक्तिर्ज्ञेया न चान्यतः''॥ इति वाराहे ॥'सर्वं हरेर्वशत्वेन शरीरं तस्य भण्यते ।अनन्याधिपतित्वाच्च तदनन्यमुदीर्यते ॥न चाप्यभेदो जगता विष्णोः पूर्णगुणस्य तु''॥ इति हरिवंशेषु ॥ ४०,४१ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C11_S02_V45
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C11
| |
| | section_id = BTN_C11_S02
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = हरिरुवाच– सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः । भूतानि भगवत्यात्मन्नेष भागवतोत्तमः ॥ ४५ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C11_S02_V46
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C11
| |
| | section_id = BTN_C11_S02
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च । प््रोममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥ ४६ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C11_S02_V47
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C11
| |
| | section_id = BTN_C11_S02
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते । न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥ ४७ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C11_S02_V47
| |
| | id = BTN_C11_S02_V47_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | label = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| 'पूर्णत्वादात्मशब्दोक्तः कश्चित्सर्वनरोत्तमः ।स च नारायणो नान्यः स च सर्वेषु संस्थितः ॥तद्वशा इतरे सर्वे श्रीब््राह्मेशपुरःसराः ।स एव तु स्वभक्तेषु स्थित्वाऽनुग््राहकारकः ॥अज्ञेष्वज्ञानयन्ता च द्विषत्सु द्वेषकारकः ।तत्प््रोरितास्तदन्ये तु प््रिायद्वेषादिकारिणः ॥अतस्तत्प््रोरणादेव प््रोमाद्या मम जज्ञिरे ।इति पश्यति यो बुध्द्या स तु भागवतोत्तमः ॥सर्वाधिकं पृथग्विष्णुं क्षीरसागरवासिनम् ।ज्ञात्वा तत्र प््रोमयुक्तस्तद्भक्तेषु च मैत्रयुक् ॥कृपावांश्च तदज्ञेषु तद्द्वेषीणामुपेक्षकः ।तद्वशत्वं न जानाति सर्वस्य जगतोऽपि तु ॥तमाहुर्मध्यमं भक्तमर्चायामेव संस्थितम् ।विष्णुं ज्ञात्वा तदन्यत्र नैव जानाति यः पुमान् ॥तारतम्यं च तद्भक्तेर्न जानाति कथञ्चन ।अवजानंश्च तद्भक्तानात्मनो भक्तिदर्पितः ॥उपेक्षकोऽपि वा तेषु न स्मरेदथवापि तान् ।मानुषेषु यथा कश्चित्किञ्चिदुच्चः प्रदृश्यते ॥एवमेवोच्चतां विष्णोरल्पां पश्यति चान्यतः ।ते तु भक्ताधमाः प्रोक्ताः स्वर्गादिफलभागिनः ॥तैर्विघि्नता अधो यान्ति तद्भक्तानामुपेक्षकाः ।कुर्युर्विष्णावपि द्वेषं देवा देवावमानिनः ॥पूजिता विष्णुभक्तिं च नावज्ञेयास्ततः सुराः ।उपेक्षकेषु देवानां भक्तिनाशं स्वयं हरिः ॥करोति तेन विभ््राष्टाः संसरन्ति पुनःपुनः ।अधो वा यान्ति विद्वेषात्पूज्या देवास्ततः सदा ॥यस्तान्द्वेष्टि स तं द्वेष्टि यस्ताननु स चानु तम् ।ऐकात्म्यमागतं विद्धि देवैस्तद्भक्तिपूरितैः ॥उपेक्षकस्तु देवानां यदैव निरयोपगः ।तदा तु किमु वक्तव्यमुपेक्षायां जनार्दने ॥विष्णोरुपेक्षकं सर्वे विद्विषन्त्यधिकं सुराः ।पतत्यवश्यं तमसि हरिणा तैश्च पातितः ॥भुङ्क्त्े स्वर्गफलं नित्यं निरयं नैव गच्छति ।विष्णोस्तु मध्यमो भक्तो जायते मानुषेषु च ॥अस्मरन्देवता यस्तु भजते पुरुषोत्तमम् ।योग्यः संस्मरते देवानयोग्यो द्वेष्टि केशवम् ॥यस्तूत्तमो भागवतः स मुक्तिं परमां व््राजेत् ।विष्णुना सर्वदेवैश्च मोदते स ह नित्यदा''। इति च ॥ ४५-४७ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C11_S02_V48
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C11
| |
| | section_id = BTN_C11_S02
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = गृहीत्वापीन्द्रियैरर्थान् यो न द्वेष्टि न हृष्यति ।
| |
| | verse_line2 = विष्णोर्मायामिमां पश्यन् स वै भागवतोत्तमः ॥ ४८ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C11_S02_V48
| |
| | id = BTN_C11_S02_V48_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | label = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| विष्णोर्मायां विष्ण्विच्छाधीनाम् ।'विष्णोरिच्छानुसार्यैतज्ज्ञात्वा योग्यान्न चाधिकम् ।हृष्यति द्वेष्टि वा यस्तु स वै भागवतोत्तमः''॥ इति ॥'सतां वृद्धिकरो धर्मस्त्वसतां ह्रासकारकः ।अयं तु निश्चितो धर्मो ह्यधर्मोऽन्यो विनिश्चितः ॥हर्षः सत्सु तथाऽसत्सु धर्मो धर्मविपर्ययः ।तेषां वृद्धौ तथा हानौ सर्वं ज्ञेयमशेषतः ॥एतदर्थं च धर्माणां मर्यादा वैदिकादिका ।मूलधर्मविरुद्धा तु सा न ग््र•ह्या कथञ्चन''॥ इति च ॥ ४८ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C11_S02_V49
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C11
| |
| | section_id = BTN_C11_S02
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = देहेन्द्रियप्राणमनोधियां यो जन्माप्ययक्षुद्भयतर्षकृच्छ्रैः ।
| |
| | verse_line2 = संसारधर्मैरविमुह्यमानः स्मृत्या हरेर्भागवतप्रधानः ॥ ४९ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C11_S02_V49
| |
| | id = BTN_C11_S02_V49_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | label = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| 'देहेन्द्रियप्राणधियां त्रिधैव त्वभिमानिनः ।तत्रोत्तमा देवतास्ताः सर्वदोषविवर्जिताः ॥गुणैः सर्वैः सुसम्पन्ना विरिञ्चादोत्तरोत्तरम् ।मध्यमा गुणदोषेता असुरा अवमा मताः ॥ते सर्वे दोषसंयुक्ता आचित्तादुत्तरोत्तरम् ।तेभ्योऽन्यो मानुषो जीवस्ताभ्यां देवासुरावपि ॥जीवाभिमानिनश्चैव त्रिविधाः सम्प्रकीर्तिताः ।जीवमान्युत्तमो ब््राह्मा मध्यमः स्वयमेव तु ॥अधमः कलिरुद्दिष्टस्तत्र मध्यमनीचयोः ।मृतिजन्मक्षुधादुःखप्रभृत्यखिलमेव तु ॥नोत्तमस्य तु जीवस्य देहादेश्च कथञ्चन ।जन्मादिकृतदुःखं तु देहमान्यसुरस्य ह ॥सुप्त्याद्यप्ययजं दुःखमसुरेन्द्रियमानिनः ।क्षुन्निमित्तं तु यद्दुःखं प्राणमान्यसुरस्य तत् ॥भयतर्षादिजं दुःखं मनोमान्यसुरस्य च ।केवलं त्वान्तरं दुःखं बुद्धिमान्यसुरस्य तत् ॥नीचोऽस्मीति तु यद्दुःखमहंमान्यसुरस्य तत् ।अतीतादिस्मृतेर्दुःखं चित्तमान्यसुरस्य च ॥जीवमान्यसुरस्य स्यात्सर्वं तत्समुदायतः ।एवमेव सुखं देवेषूभयं मध्यमेषु च ॥असुराणामधर्मस्य वृध्या सुखमपीष्यते ।देवानां नैव केनापि दुःखं प्रीतिस्तु धर्मतः ॥अधर्मोऽपि प्रीतये स्यादसुराणामधोगतेः ।देवानां पुण्यपापाभ्यां सुखमेवोत्तरोत्तरम् ॥तेषां दुःखादिकं किञ्चिदसुरावेशतो भवेत् ।प्राणस्य नासुरावेश आखणाश्मसमो हि सः ॥सम्पूर्णानुग््राहाद्विष्णोः प्राणः पूर्णगुणो मतः ।असुराणां सुखाद्याश्च देवावेशादुदीरिताः ॥स्वतस्तु निर्गुणाः सर्वे सर्वदोषात्मका मताः ।विविच्यैवं जगत्सर्वं स्वात्मानं च पृथक्स्थितम् ॥सर्वतश्च पृथक्सन्तं विष्णुं सर्वोत्तमोत्तमम् ।जानन्ति ये भागवतास्त उक्ता उत्तमा इति''॥ इति ब््राह्मतर्के ॥देहेन्द्रिययोर्जन्माप्ययौ ॥ ४९ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C11_S02_V52
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C11
| |
| | section_id = BTN_C11_S02
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = न यस्य स्वः पर इति चित्ते स्वात्मनि वाऽभिदा ।
| |
| | verse_line2 = सर्वभूतसमः शान्तः स वै भागवतोत्तमः ॥ ५२ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे द्वितीयोऽध्यायः ॥}}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C11_S02_V52
| |
| | id = BTN_C11_S02_V52_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | label = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| चित्ते विद्यमाने । स्वात्मनि केवलात्मभावे मोक्षे च । यस्य जीवपरयोर-भेदो नास्ति ।'न क्वापि जीवं विष्णुत्वे संसृतौ मोक्ष एव च ।यः पश्यति सुरादींश्च यथोत्कर्षं प्रपश्यति ।स सर्वभूतसमदृग्विष्णुं सर्वोत्तमं स्मरन्''॥ इति हरिवंशेषु ॥'नैवं त्वयाऽनुमन्तव्यं दृष्टो जीवो मयेति ह ।सर्वभूतगुणैर्युक्तं देवं त्वं ज्ञातुमर्हसि''॥ इति च मोक्षधर्मेषु ॥'नैवं त्वयाऽनुमन्तव्यं जीवात्माहमिति क्वचित् ।सर्वैर्गुणैः सुसम्पन्नं दैवं मां ज्ञातुमर्हसि''॥ इति च वाराहे ॥ ५२ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| | |
| [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | |