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| {{Adhyaya
| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C10_S86]] |
| | document_id = BTN
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| | chapter_name = दशमस्कन्धः
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| | title = षडशीतितमोऽध्यायः
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| }}
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| == षडशीतितमोऽध्यायः ==
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| | verse_id = BTN_C10_S86_V38
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| | verse_type = shloka
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| | verse_line1 = ततो मुहूर्तात् प्रकृतावुपस्थित- स्तत्रानुतिष्ठत् स्वजनानुसङ्गतः । महानुभावस्तदबुद्ध्यतासुरीं मायां स साल्वप्रकृतां मयोदिताम् ॥ ३८ ॥
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| {{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये दशमस्कन्धे षडशीतितमोऽध्यायः ॥}}
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| {{Commentary
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| | verse_id = BTN_C10_S86_V38
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| | name = Bhashyam
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| | label = Bhashyam
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| | text =
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| 'जानन् साल्वकृतां मायामजानन्निव केशवः ।अन्ववर्तत किञ्चित्तु ततस्तामहरद्विभुः ॥एवमेव तु सर्वत्र परमात्मा सनातनः ।विद्धश्च रुधिरस्रावी कथञ्चिदजयत्परम् ॥इत्यादि दर्शयेद्विष्णुर्मोहयन्मायया जगत् ।चिदानन्दघनस्यास्य कुतो वेधादि सद्गतेः''॥ इति ब्रह्माण्डे ॥'यदचरस्तन्वा वावृधानो बलानीन्द्र प्रब्रुवाणो जनेषु ।मायेत्साते यानि युद्धान्याहुर्नाद्य शत्रंु ननु पुरा विवित्से''॥इत्याद्या च श्रुतिः ॥ ३८ ॥
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| }}
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| [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | |