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| == द्व्यशीतितमोऽध्यायः ==
| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C10_S82]] |
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| | title = द्व्यशीतितमोऽध्यायः
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| | verse_line1 = श्रुत्वाऽजितं जरासन्धं नृपतेर्ध्यायतो हरिः ।
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| | verse_line2 = आहोपायं तमेवाद्य उद्धवो यमुवाच ह ॥ १५ ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये दशमस्कन्धे द्व्यशीतितमोऽध्यायः ॥
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| अजितं जरासन्धं भगवत एव श्रुत्वा । तथा हि सभापर्वणि पश्चा-द्दिग्विजयोक्तेः ।
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| 'पूर्वाः कथाः परं ब्रूयुः पराः पूर्वं तथैैव च ॥
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| मोहनार्थाय दुष्टानां सर्वं व्यत्यासयिष्यते ।
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| विस्तारे तु यदुक्तं स्यात्तद्ग्राह्यमविरोधतः ।
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| संक्षेपोक्तविरोधे तु गुणोक्तिश्च सतां यथा''॥ इति शब्दनिर्णये ॥
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| 'जरासन्धं निहत्यैव पाण्डवैस्तु दिशो जिताः ।
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| प्रसादाद्वासुदेवस्य राजसूयः क्रतुः कृतः''॥ इति मात्स्ये ॥ १५ ॥
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| [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | |