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| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C10_S05]] |
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| | title = पञ्चमोऽध्यायः
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| == पञ्चमोऽध्यायः ==
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| | verse_line1 = मा शोचेथां महाभागावात्मजान् स्वकृतं भुजः ।
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| | verse_line2 = जन्तवो न सदैकत्र दैवाधीनाः सहासते ॥ १८ ॥
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| पूतनाकंसनरकशिशुपालादिषु द्विधा ।जीवाः सन्तस्त्वसन्तश्च तत्र बन्ध्वादिरूपिणः ॥विष्णोः सन्त इति ज्ञेया असन्तः शत्रुरूपिणः ।शुभजीवप्रकाशेन कदाचिच्छुभबुद्धयः ॥विपर्ययेऽन्यथा च स्युः शुभास्तत्र हरिं ययुः ।असुराश्च तमो घोरं यदि तत्रैव मध्यमाः । ।मध्यमां गतिमेवापुरेकदेहगता अपि ॥ इति गारुडे ॥ १८ ॥
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| | verse_line1 = भुवि भौमानि भूतानि यथाऽऽयान्त्यपयान्ति च ।
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| | verse_line2 = नायमात्मा तथैतेषु विपर्येति यथैव भूः ॥ १९ ॥
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| | verse_line1 = यतोऽनेकविधोऽभेदो यत आत्मविपर्ययः । देहयोगवियोगश्च संसृतिर्न निवर्तते ॥ २० ॥
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| | verse_line1 = तस्माद् भद्रे स्वतनयान् मया व्यापादितानपि । माऽनुशोच यतः सर्वः स्वकृतं विन्दतेऽवशः ॥ २१ ॥
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| अयमात्मा परमात्मा ॥यतः परमात्मनो नैकविधमैक्यं, विपरीतज्ञानेन यतश्च संसृतिर्न निवर्तते । स एव न विपर्येति । पुत्रादिकं तु विपर्येति ॥ तस्मात्तस्मिन्नेव स्थितिं कृत्वा माऽनुशोच ॥'अहं ब्रह्मास्मि देवोऽस्मि नास्मि केवलमानुषः ।जातोऽस्मि वर्धे धनवान्म्रिय इत्यादिका सदा ॥देहादिषु च देवेषु परे ब्रह्मणि चाभिदा ।मोहाद्यन्मायया नित्यं दृश्यतेऽधममध्यमे ॥स ईशो न विपर्येति सर्वेशत्वात्कदाचन ।पुत्रादिकं विपर्येति पित्रादिश्च यतो भवेत्''॥ इति ब्राह्मे ॥'तल्लक्षणैर्विहीनः सन्ब्रह्मदेवोऽस्मि चेति तु ।असुराः प्रतिपद्यन्ते जन्मादीन्मानुषा जनाः''॥ इति च ॥'परं ब्रह्मण एकस्य ब्रह्मास्मीति विचिन्तनम् ।परब्रह्मेति रामादिलक्षणैरवधारयेत् ॥देवोऽस्मीति च देवानां तच्च ज्ञेयं स्वलक्षणैः ।मर्त्यानां मानुषोऽस्मीति प्रतिपत्तिर्विधीयते ॥अन्यथाप्रतिपत्त्या तु तमो यान्ति विनिश्चयात् ।अन्यथा प्रतिपद्यन्ते आसुरा नियतं जनाः ॥घोरं तमश्च ते यान्ति तथा ज्ञानात्परं सुराः''॥ इति च ॥१९-२१॥
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| | verse_line1 = एवमेतन्महाराज यथा वदसि देहिनाम् ।
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| | verse_line2 = अज्ञानप्रभवा हन्ति स्वपरेति भिदा यतः ॥ २६ ॥
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| देहिनामज्ञानप्रभवा यातनाः स्वपरेति भिदा हन्ति ।'देवोऽहं मानुषो वेति विशेषं तत्र चापि तु ।तथैव परमात्मानं विशेषं ब्रह्मजीवयोः ॥सम्यग्भेदेन यः पश्येत्स हन्त्यज्ञानसम्भवाः ।यातनाः परमात्मानं तत्प्रसादाच्च गच्छति''॥ इति ब्रह्माण्डे ॥ २६ ॥
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| | verse_line1 = शोकहर्षभयद्वेषलोभमोहमदान्विताः ।
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| | verse_line2 = मिथो घ्नन्तो न पश्यन्ति भावैर्भावान् पृथग्दृशः ॥ २७ ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये दशमस्कन्धे पञ्चमोऽध्यायः ॥
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| 'भगवद्दर्शनाद्यस्य विरोधाद्दर्शनं पृथक् ।पृथग्दृष्टिः स विज्ञेयो न तु सद्भेददर्शनः''॥ इति च भविष्यत्पुराणे ॥'स्वरूपभेदो हि परजीवयोर्जीवगो मिथः ।परस्परेण वस्तूनां विशेषः शास्त्रदर्शितः ॥सद्भेदोऽयं समुद्दिष्टस्त्वसद्भेदं च मे शृृणु ।स्वरूपाणां गुणानां च विष्णोर्भेदः परस्परात् ॥सर्वस्याविष्णुतन्त्रत्वं शत्रुमित्रादिभेदिता ।यच्चान्यच्छास्त्रविद्विष्टमसद्भेदः स ईरितः ॥सद्भेददर्शनान्मोक्षस्त्वसद्भेदात्तमो व्रजेत् ।सद्भेदादर्शनाच्चैव तमो मोक्षस्तथेतरात्''॥ इति च ॥ २७ ॥
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| [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | |