|
|
| (One intermediate revision by the same user not shown) |
| Line 1: |
Line 1: |
| __TOC__
| | #REDIRECT [[Bhagavadgitabhashya#BGB_C05]] |
| <div class="gr-page-nav">[[Bhagavadgitabhashya|श्रीमद्भगवद्गीताप्रस्थानम्]] · [[Bhagavadgitabhashya/Toc|अनुक्रमणिका]]</div>
| |
| {{Adhyaya
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_num = 5
| |
| | title = पञ्चमोऽध्यायः
| |
| }}
| |
| तृतीयाध्यायोक्तमेव कर्मयोगं प्रपञ्चयत्यनेनाध्यायेन -‘यदृच्छालाभसन्तुष्टः’(४.२२) इत्यादि संन्यासम् , ‘कुरु कर्मैव’(४.१५) इत्यादि कर्मयोगं च।
| |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V01
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
| |
| | verse_line2 = यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥१ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V01
| |
| | id = BGB_C05_V01_uvaaca
| |
| | text =
| |
| अर्जुन उवाच
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V01
| |
| | id = BGB_C05_V01_B01
| |
| | text =
| |
| नियमनादिना सकललोककर्षणात् कृष्णः ।तच्चोक्तम्-
| |
| ‘यतः कर्षसि देवेश नियम्य सकलं जगत् ।अतो वदन्ति मुनयः कृष्णं त्वां ब्रह्मवादिनः ॥’ इति महाकौर्मे । संन्यासशब्दार्थं भगवानेव वक्ष्यति । अयं प्रश्नाभिप्रायः(शयः) - ‘यदि संन्यासः श्रेयः अधिकः स्यात्, तर्हि संन्यासस्येेषद्(स्यैतद्)विरोधि युद्धम्’ इति ॥१ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V02
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
| |
| | verse_line2 = तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥२ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V02
| |
| | id = BGB_C05_V02_uvaaca
| |
| | text =
| |
| श्री भगवानुवाच
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V02
| |
| | id = BGB_C05_V02_B01
| |
| | text =
| |
| नायं संन्यासो यत्याश्रमः । ‘द्वन्द्वत्यागात्तु संन्यासान्मत्पूजैव गरीयसी ॥’ इति वचनात् ।‘तानि वा एतान्यवराणि तपांसि न्यास एवात्यरेचयत्’(म.ना.उ.१६.१२) । इति च ।
| |
| ‘संन्यासस्तु तुरीयो यो निष्क्रियाख्यः सधर्मकः ।न तस्मादुत्तमो धर्मो लोके कश्चन विद्यते ॥तद्भक्तोऽपि हि यद् गच्छेत् तद्गृहस्थो न धार्मिकः ।मद्भक्तिश्च विरक्तिस्तदधिकारो निगद्यते ।यदाऽधिकारो भवति ब्रह्मचार्यपि प्रव्रजेत् ॥’ इति नारदीये ।
| |
| ‘ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत्’ । ‘यदहरेव विरजेत्’(जा.उ.४.१) इति च ।
| |
| ‘संन्यासे तु तुरीये वै प्रीतिर्मम गरीयसी (महीयसी) ।येषामत्राधिकारो न, तेषां कर्मेति निश्चयः ॥’इत्यादेश्च ब्राह्मे ।अतो नात्राऽश्रमः संन्यास उक्तः ॥२ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V03
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
| |
| | verse_line2 = निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥३ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V03
| |
| | id = BGB_C05_V03_B01
| |
| | text =
| |
| संन्यासशब्दार्थमाह - ज्ञेय इति ॥ संन्यासस्य निःश्रेयसकरत्वं ज्ञापयितुं तच्छब्दार्थं स्मारयति - ज्ञेय इति ॥ ३ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V04
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
| |
| | verse_line2 = एकमप्यास्थितः सम्यग् उभयोर्विन्दते फलम्॥४ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V04
| |
| | id = BGB_C05_V04_B01
| |
| | text =
| |
| संन्यासो हि ज्ञानान्तरङ्गत्वेनोक्तः- ‘न तस्य तत्त्वग्रहणाय’(भाग.५.११.३) इत्यादौ । अतः कथं सोऽवमः? इत्यत आह - साङ्ख्ययोगाविति ॥ उभयोरप्यन्तरङ्गत्वेनाविरोधः । ‘अग्निमुग्धो हवै धूमतान्तः स्वं लोकं न प्रतिजानाति’(तै.), ‘मा वः पदव्यः पितरस्मदाश्रिता या यज्ञशालासनधूमवर्त्मनाम्’(भाग.४.४.२१) इत्यादि काम्यकर्मविषयमिति भावः । ये त्वन्यथा वदन्ति ते बालाः ॥ ४ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V05
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = यत् साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद् योगैरपि गम्यते ।
| |
| | verse_line2 = एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥५ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V05
| |
| | id = BGB_C05_V05_B01
| |
| | text =
| |
| ‘एकमपि’(५.४) इत्यस्याभिप्रायमाह - यत् साङ्ख्यैरिति ॥ योगिभिरपि ज्ञानद्वारा ज्ञानफलं प्राप्यत इत्यर्थः ॥ ५ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V06
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
| |
| | verse_line2 = योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति॥६ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V06
| |
| | id = BGB_C05_V06_B01
| |
| | text =
| |
| इतश्च संन्यासाद् योगो वर इत्याह - संन्यासस्त्विति ॥ योगाभावे मोक्षादिफलं न भवति । अतः कामजयादिदुःखमेव तस्य । मोक्षाद्येव हि फलम् । अन्यत् फलम् अल्पत्वाद् अफलमेवेत्याशयः । तच्चोक्तम्- ‘विना मोक्षफलं यत्तु न तत्फलमुदीर्यते’ । इति पाद्मे । यत्तु महत्फलयोग्यं तस्याल्पं फलमेव न भवति । यथा पद्मरागस्य तण्डुलमुष्टिः । महाफलश्च योगयुक्तश्चेत् संन्यास इत्याह - योगयुक्त इति ॥ मुनिः संन्यासी । तथाचोक्तम्- ‘स हि लोके मुनिर्नाम यः कामक्रोधवर्जितः।’ इति ॥ ६ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V07
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
| |
| | verse_line2 = सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V07
| |
| | id = BGB_C05_V07_B01
| |
| | text =
| |
| एतदेव प्रपञ्चयति - योगयुक्त इति ॥ सर्वभूतात्मभूतः परमेश्वरः । ‘यच्चाऽप्नोति’(म.भा) इत्यादेः । स आत्मभूतः स्वसमीपं प्रति आदानादिकर्ता यस्य सः सर्वभूतात्मभूतात्मा ॥ ७ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V08
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
| |
| | verse_line2 = पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन् अश्नन् गच्छन् स्वपन् श्वसन् ॥८ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V08
| |
| | id = BGB_C05_V09_B01
| |
| | text =
| |
| संन्यासं स्पष्टयति पुनः श्लोकद्वयेन ॥ ८, ९ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V09
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = प्रलपन् विसृजन् गृह्णन् उन्मिषन् निमिषन्नपि ।
| |
| | verse_line2 = इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥९ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V10
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
| |
| | verse_line2 = लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥१० ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V10
| |
| | id = BGB_C05_V10_B01
| |
| | text =
| |
| संन्यासयोगयुक्त एव च कर्मणा न लिप्यत इत्याह- ब्रह्मणीति ॥ साधननियमोपचारत्वनिवृत्त्यर्थं पुनःपुनः फलकथनम् ॥ १० ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V11
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।
| |
| | verse_line2 = योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये॥११ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V11
| |
| | id = BGB_C05_V11_B01
| |
| | text =
| |
| एवं चाऽचार इत्याह - कायेनेति ॥ ११ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V12
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
| |
| | verse_line2 = अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥१२ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V12
| |
| | id = BGB_C05_V12_B01
| |
| | text =
| |
| पुनर्युक्त्यादिनियमनार्थं युक्तायुक्तफलमाह - युक्त इति ॥ युक्तो योगयुक्तः॥ १२ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V13
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्याऽस्ते सुखं वशी ।
| |
| | verse_line2 = नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥१३ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V13
| |
| | id = BGB_C05_V13_B01
| |
| | text =
| |
| पुनः संन्यासशब्दार्थं स्पष्टयति - सर्वकर्माणीति ॥ ‘मनसा’ इति विशेषणाद् अभिमानत्यागः ॥ १३ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V14
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
| |
| | verse_line2 = न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥१४ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V15
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = नाऽदत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
| |
| | verse_line2 = अज्ञानेनाऽवृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥१५ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V15
| |
| | id = BGB_C05_V15_B01
| |
| | text =
| |
| न च करोति वस्तुत इत्याह - न कर्तृत्वमिति ॥ प्रभुर्हि जीवो जडमपेक्ष्य ॥ १४, १५ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V16
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
| |
| | verse_line2 = तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥१६ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V16
| |
| | id = BGB_C05_V16_B01
| |
| | text =
| |
| ज्ञानमेवाज्ञाननाशकमित्याह - ज्ञानेनेति ॥ प्रथमज्ञानं परोक्षम् ॥ १६ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V17
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = तद्बुद्धयस्तदात्मानः तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
| |
| | verse_line2 = गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥१७ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V17
| |
| | id = BGB_C05_V17_B01
| |
| | text =
| |
| अपरोक्षज्ञानाव्यवहितसाधनमाह - तद्बुद्धय इति ॥ १७ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V18
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
| |
| | verse_line2 = शुनि चैव श्वपाके च पण्डितास्समदर्शिनः॥१८ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V18
| |
| | id = BGB_C05_V18_B01
| |
| | text =
| |
| परमेश्वरस्वरूपाणां सर्वत्र साम्यदर्शनं चापरोक्षज्ञानसाधनमित्याशयवानाह - विद्येति ॥ १८ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V19
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = इहैव तैर्जितस्सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
| |
| | verse_line2 = निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः॥१९ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V19
| |
| | id = BGB_C05_V20_B01
| |
| | text =
| |
| तदेव स्तौति - इहैवेति ॥ १९ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V20
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
| |
| | verse_line2 = स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः॥२० ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V20
| |
| | id = BGB_C05_V20_B01
| |
| | text =
| |
| संन्यासयोगज्ञानानि मिलित्वा प्रपञ्चयत्यध्यायशेषेण- ॥ २० ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V21
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।
| |
| | verse_line2 = स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥२१ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V21
| |
| | id = BGB_C05_V21_B01
| |
| | text =
| |
| पुनर्योगस्याऽधिक्यं स्पष्टयति - बाह्यस्पर्शेष्विति ॥ कामरहित आत्मनि यत् सुखं विन्दति स एव ब्रह्मयोगयुक्तात्मा चेत् तदेव अक्षयं सुखं विन्दति। ब्रह्मविषयो योगो= ब्रह्मयोगः । ध्यानादियुक्तस्यैव आत्मसुखमक्षयम् । अन्यथा नेत्यर्थः ॥ २१ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V22
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
| |
| | verse_line2 = आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥२२ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V22
| |
| | id = BGB_C05_V22_B01
| |
| | text =
| |
| संन्यासार्थं कामभोगं निन्दयति - ये हीति ॥ २२ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V23
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
| |
| | verse_line2 = कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥२३ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V23
| |
| | id = BGB_C05_V23_B01
| |
| | text =
| |
| तत्परित्यागं प्रशंसयति - शक्नोतीति ॥ कामक्रोधोद्भवं वेगं सोढुं शक्नोति, शरीरविमोक्षणात् प्राक्, यथा मनुष्यशरीरे सोढुं सुकरं तथा नान्यत्रेति भावः । ब्रह्मलोकादिस्तु जितकामानामेव भवति ॥ २३ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V24
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = योऽन्तः सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
| |
| | verse_line2 = स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥२४ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V24
| |
| | id = BGB_C05_V24_B01
| |
| | text =
| |
| ज्ञानिलक्षणं प्रपञ्चयत्युत्तरश्लोकैः-
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V24
| |
| | id = BGB_C05_V24_B02
| |
| | text =
| |
| आरामः परदर्शनादिनिमित्तं सुखम् । अत्र तु परमात्मदर्शनादिनिमित्तं तत् । सुखं तूपद्रवक्षये व्यक्तम् । अत्र तु कामादिक्षये व्यक्तमात्मनः सुखम् । स्वयञ्ज्योतिष्ट्वाद् भगवतः। तद्व्यक्तेरन्तर्ज्योतिः । सर्वेषामन्तर्ज्योतिष्ट्वेऽपि व्यक्तेर्विशेषः । असम्प्रज्ञातसमाधीनां बाह्यादर्शनात् । दर्शनेऽप्यकिञ्चित्करादेवशब्दः । उक्तं चैतत्- ‘दर्शनस्पर्शसम्भाषाद् यत् सुखं जायते नृणाम् ।आरामः स तु विज्ञेयः सुखं कामक्षयोदितम् ॥’इति नारदीये ।‘स्वज्योतिष्ट्वान्महाविष्णोरन्तर्ज्योतिस्तु तत्स्थितः’ । इति च ।अन्तःसुखत्वादेः कारणमाह - ब्रह्मणि भूत इति ॥ २४ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V25
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = लभन्ते ब्रह्मनिर्बा(वा)णम् ऋषयः क्षीणकल्मषाः ।
| |
| | verse_line2 = छिन्नद्वैधाऽऽयतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥२५ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V25
| |
| | id = BGB_C05_V25_B01
| |
| | text =
| |
| पापक्षयाच्चैतद् भवतीत्याह - लभन्त इति ॥ क्षीणकल्मषा भूत्वा छिन्नद्वैधाऽऽयतात्मानः । द्वेधा भावो = द्वैधम् । संशयो विपर्ययो वा तच्चोक्तम्- ‘विपर्ययः संशयो वा यद् द्वैधं त्वकृतात्मनाम् । ज्ञानासिना तु तच्छित्त्वा मुक्तसङ्गः परं व्रजेत् ॥’इति च। छिन्नद्वैधास्त एवायतात्मानः = दीर्घमनसः सर्वज्ञा इत्यर्थः । तत एव छिन्नद्वैधाः । तच्चोक्तम्- ‘क्षीणपापा माहाज्ञाना (महद् ज्ञात्वा) जायन्ते गतसंशयाः’ । इति । छिन्नद्वैधाः, यतात्मान इति वा ॥२५ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V26
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
| |
| | verse_line2 = अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥२६ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V26
| |
| | id = BGB_C05_V26_B01
| |
| | text =
| |
| सुलभं च तेषां ब्रह्मेत्याह - कामक्रोधेति ॥ अभितः सर्वतः ॥ २६ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V27
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
| |
| | verse_line2 = प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥२७ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V28
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = यतेन्द्रियमनोबुद्धिः मुनिर्मोक्षपरायणः ।
| |
| | verse_line2 = विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥२८ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V28
| |
| | id = BGB_C05_V28_B01
| |
| | text =
| |
| ध्यानप्रकारमाह - स्पर्शानित्यादिना ॥ बाह्यान् स्पर्शान् बहिः कृत्वा = श्रोत्रादीनि योगेन नियम्येत्यर्थः । चक्षुः भ्रुवोरन्तरे कृत्वा = भ्रुवोर्मध्यमवलोकयन् इत्यर्थः । उक्तं च -‘नासाग्रे वा भ्रुवोर्मध्ये DfyanI (ज्ञानी) चक्षुर्निधापयेत्’। इति । प्राणापानौ समौ कृत्वा कुम्भके स्थित्वेत्यर्थः ॥ २७, २८ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BGB_C05_V29
| |
| | document_id = BGB
| |
| | chapter_id = BGB_C05
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
| |
| | verse_line2 = सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥२९ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V29
| |
| | id = BGB_C05_V29_author-note
| |
| | text =
| |
| ॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसन्न्यासयोगो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05_V29
| |
| | id = BGB_C05_V29_B01
| |
| | text =
| |
| ध्येयमाह - भोक्तारमिति ॥ २९ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C05
| |
| | id = BGB_C05_author-note
| |
| | text =
| |
| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥
| |
| }}
| |
| | |
| [[Category:Bhagavadgitabhashya]]
| |