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| __TOC__
| | #REDIRECT [[Anuvyakyanam#AV_C04_S04]] |
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| {{Adhyaya
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| | document_id = AV
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| | chapter_num = 4
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| | title = चतुर्थः पादः
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| }}अतिक्रमोक्तिः कृतिरर्थलाभः परागतिः पारगतिस्तदोकः ॥1॥
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| समस्तकार्यं वशिता च विश्वसम्भावना युक्तयस्त्वन्यपक्षके ।सामान्यरूपं प्रतिभानमुक्तिराश्चर्यता कृत्रिमतास्तदोषः ॥2॥
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| विशेषक्लृतिः कृतनिश्चयश्च माहात्म्यमित्येव सुनिर्णयार्थाः ।
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| === अनन्याधिपत्त्यधिकरणम् ===
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| | verse_id = AV_C04_S04_V01
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| | chapter_id = AV_C04
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| | verse_type = sutra
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| | verse_line1 = अनन्यभृत्यत्वमिहोदितेभ्यस्त्वन्यस्य भृत्यत्वनिवारणाय ॥3॥
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| }}
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| {{Bhashyam
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| | verse_id = AV_C04_S04
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| | id = AV_C04_S04_author-note
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| इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने चतुर्थाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥
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| }}
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| [[Category:Anuvyakyanam]]
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